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Tuesday, February 23, 2021

'धारयति इति धर्मः'- (चर्चा अंक- 3986)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय यशवन्त माथुर जी की रचना से )

'धारयति इति धर्मः'- 

जिसे धारण किया जाए 

वही धर्म है 

अच्छे कर्म करना ही 

जीवन का मर्म है। 

धर्म के सही अर्थ को समझते हुए और उसे अपने जीवन में धारण करते हुए..... 

चलते हैं, आज की रचनाओं की ओर.....

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 गीत  

"सत्य-अहिंसा की मैं अलख जगाऊँगा" 

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

मैं कभी वक्र होकर घूमूँ,
हो जाऊँ सरल-सपाट कहीं।
मैं स्वतन्त्र हूँमैं स्वछन्द हूँ,
मैं कोई चारण भाट नहीं।
फरमाइश पर नहीं लिखूँगा,
गीत न जबरन गाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।। 
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पुनर्जीवन तभी होगा संभव
 जब प्रेम के जल में 
सच का कीटनाशक मिला कर 
हम शुरू कर देंगे सींचना 
अपने वर्तमान से 
भविष्य को।
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दैदिप्य 

व्याल के हर बंध में भी 

है महकता प्रज्ञ चंदन 

और घिसता पत्थरों पर 

भाल चढ़ता है निरंजन।

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जय-जय-जय चापलूस महाराज 
स्वाभिमान ना आता तुमको रास।
पिछल्ले बने घूमते तुम 
नहीं रुकता कभी 
तुम्हारा कोई काज ।
गुडबुक्स में ऊपर रहते तुम 
बॉस करता तुम पर नाज़ ।
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शायद ... प्रेम ! 
- जीवन से सारे संबंध धीरे-धीरे वि‍लग क्‍यों होते जाते हैं ? - अलग होने पर ही नए पत्‍ते आते हैं। शायद एक दि‍न मैं भी... - तुम पत्‍ता नहीं हो मेरे लि‍ए ! - तो क्‍या हूं ? - थोड़ी जड़, थोड़ी मि‍ट्टी, थोड़ा धूप, थोड़ा पानी-----------------------------५३६. मृत्य के बाद 

मैं चाहता हूँ 

कि मौत के बाद 

मैं सिर्फ़ हिन्दू न रहूँ,

मुस्लिम, ईसाई, पारसी 

जैन और सिख भी बन जाऊं.

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लॉकडाउन के पहले साधारणतः सबको पाँच दिन तो कार्यक्षेत्र जाना ही होता था, पर छठे दिन भी हर दिन की तरह ही हर बार जाना पड़ता था। हाँ, सातवें दिन की छुट्टी मिलती थी, किंतु सप्ताह में एक दिन के लिए बहुत से काम इकट्टे हो चुके रहते थे, इसलिए उसी में दिन कट जाता था। कभी किसी के घर कोई बैठक हुई तो वह दिन भी गया। इसलिए एक दिन भी घर के काम करने का मौका नहीं मिलता था। सोचते थे 
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  • दर्द सबका एक-सा 
  • मैंने ऊपर संदर्भित अपने आलेख में भी यही कहा था और यहाँ भी यही कहता हूँ कि इस समस्या तथा ऐसी अन्य कई समस्याओं का एकमात्र समाधान चरित्र-निर्माण तथा सुसंस्कारों का विकास ही है । देश के युवा भ्रष्टउद्दंड एवं चरित्रहीन बनेंगे तो ऐसी घटनाओं का होना किसी भी कानून से नहीं रोका जा सकेगा चाहे हम कितने ही दोषियों को सूली चढ़ा दें 
  • -----------------------------------
  • आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें। 
    आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें। 
    कामिनी सिन्हा 
    --

19 comments:

  1. उपयोगी और पठनीय लिंकों के साथ उत्तम चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीया कामिनी सिन्हा जी।

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति। आभार कामिनी जी।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति.आपका आभार.

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  4. उत्कृष्ट संकलन के लिए अभिनंदन कामिनी जी । साथ ही मेरे आलेख को स्थान देने के लिए आपका असीमित आभार

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  5. धारयति इति धर्मः'-

    जिसे धारण किया जाए

    वही धर्म है

    अच्छे कर्म करना ही

    जीवन का मर्म है।

    धर्म के सही अर्थ को समझते हुए और उसे अपने जीवन में धारण करते हुए.....

    चलते हैं, आज की रचनाओं की ओर.....

    चर्चा का शुभारंभ करने वाली पंक्तियां सब कुछ कह गईं. हृदयग्राही भूमिका.

    और हमेशा की तरह रंग-रंग की रचनाएं.

    धर्म और विद्या के बीच विभिन्न विचारों और भावों को समेटती चर्चा.
    सहभागी बनाने के लिए हृदयतल से आभार.नमस्कार.

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  6. बहुत अच्छी चर्चा... बधाई प्रिय कामिनी जी 🙏

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  7. अच्छी चर्चा... बधाई

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  8. 'जो मेरा मन कहे' को स्थान देने के लिए सादर धन्यवाद!

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  9. सुन्दर सराहनीय सूत्रों से सजी चर्चा प्रस्तुति में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हृदय से असीम आभार कामिनी जी !

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  10. बहुत सुन्दर संकलन |शुभ कामनाएं |

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  11. बहुत खूबसूरत चर्चा

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  12. बेहतरीन प्रस्तुति कामिनी जी, हार्दिक आभार , बहुत बहुत धन्यबाद भी आपका , आपकी मेहनत को सलाम,आपकी कोशिश कमाल की है, बधाई हो, सादर नमन

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  13. बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय कामिनी दी।
    सादर

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  14. प्रभावशाली भूमिका प्रभावशाली शीर्षक।
    बहुत सुंदर प्रस्तुति लाजवाब सामग्री उपलब्ध करवाई है आपने कामिनी जी ।
    सभी रचनाएं बेजोड़।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया।
    सस्नेह।

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  15. उत्कृष्ट एक से बढ़कर एक रचनाओं का संकलन। मेरी रचना को भी स्थान देने के लिए आभार कामिनी जी।
    सादर।

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  16. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  18. वाह सखी बहुत सुंदर चर्चा के साथ अनमोल रचनाएँ | शुभकामनाएं और आभार सखी |

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  19. आप सभी स्नेहीजनों का तहेदिल से शुक्रिया एवं सादर नमस्कार

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