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Sunday, February 13, 2022

'देखो! प्रेम मरा नहीं है'(चर्चा अंक-4340)

सादर अभिवादन। 

रविवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है

शीर्षक व काव्यांश आदरणीय देवेंद्र पांडेय जी की कविता 'प्रेम'से -

मुग्ध हो

खोया रहा 

रात भर

हाय!

मुँह से

बोल ही नहीं फूटे।

चाहता था, चीखना...
देखो!
प्रेम मरा नहीं है,
अँधेरे में
जुगनुओं की तरह
आज भी
टिमटिमा रहा है।

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

दोहे "कुटिल नहीं होते कभी, जीवन में सन्तुष्ट" 

परमेश्वर के नाम पर, होते वाद-विवाद।
लेकिन संकट के समय, ईश्वर आता याद।।
--
दम्भ और अभिमान में, मनवा रहता चूर।
लेकिन पग-पग पर मनुज, है कितना मजबूर।।
चाहता था, चीखना...
देखो!
प्रेम मरा नहीं है,
अँधेरे में
जुगनुओं की तरह
आज भी
टिमटिमा रहा है।
उसे विशेषज्ञ कहते हैं।
तुम्हारे हिज़्र का ग़म कैसे मैं भूलूँ
कि दिल मे ज़ब्त नश्तर हो गया हूँ।

लिया था  सर्द रातों  ने  जो बाहों में
तेरे बोसे की गर्मी पे निछावर हो गया हूँ।
--
तारकों के भूषणों से
रात ने आँचल सँवारा
रौम्य तारों की कढ़ाई
रूप दिखता है कँवारा
कौन बैठा ओढ़नी में
रत्न अनुपम पो रहा है।
उदधि की उत्ताल तरंगें,
भर रही हैं नव उमंगें।
लहरें देती हैं निमंत्रण,
बढ़ो नाविक ले नया प्रण।
पवन हो   प्रतिकूल,
पर नाविक कब है हारा।
तस्दीक यही हैं मेरी खुद से रुस्वाई का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll

हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll
--
वे राजा को प्रसन्न करना चाहते हैंस्वयं को आधुनिक सिद्ध करना चाहते हैं और इसलिये “हिन्दू” शब्द से जुड़ी किसी भी बात के पचड़े में नहीं पड़ना चाहते । हिन्दू शब्द से जुड़ी हर बात को पचड़ा मानने वाला यह वर्ग स्वयं को प्रगतिवादी सिद्ध करने के लिये आयातित धर्मों और उनकी परम्पराओं की प्रशंसा करते नहीं थकता । धर्मों में केवल हिन्दू धर्म को ही “धर्म” की श्रेणी से बाहर मान लिया गया है इसलिये उसकी दुर्दशा पर सोचना भी उनके लिये एक वर्ज्य विषय है । साहित्य के ये मठाधीश हिन्दू धर्मभारतीय संस्कृति और भारत के प्राचीन गौरव पर कविता लिखने वालों का कठोरतापूर्वक बहिष्कार कर दिया करते हैं । भारत के इस वर्तमान परिदृश्य में एक और अफ़्रीका की आहट स्पष्ट सुनायी दे रही हैक्या आप उस आहट को सुन पा रहे हैं ?
बाहर- लंबूतरे उदास चेहरे वाला अफसर जयपाल प्लेन के लंबे कॉरीडोर में तेजी से कदम उठाता हुआ दूसरे सिरे पर पहुँचा जहाँ तीन अफसर बैठे ऊँघ रहे थे। "काम के वक्त सो रहे हो?" जयपाल ने एक अफसर से कहा और दरवाजे खोलकर ऑफिस में आ गया, वहाँ उसने मेज पर से कुछ रिपोर्ट उठाई और फिर बाहर आ गया। "फ्रेंड्स, यह एडवांस टीम रिपोर्टें हैं जो मुंबई से आई हैं। जरा इन्हें पढ़ लें।" उसने रिपोर्टों की एक-एक कॉपी उन तीनों में बाँटी और आगे बढ़ गया। वे तीनों रिपोर्ट पढ़ने लगे। अचानक जयपाल मुड़ा, उसके हाथ में काले रंग का लंबी नाल वाला रिवॉल्वर चमक रहा था। 
--

आज का सफ़र यहीं तक 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

9 comments:

  1. चर्चा में शामिल करने के लिए आभार। 🙏

    ReplyDelete
  2. बहुत बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति|
    आपका आभार अनीता सैनी 'दीप्ति' जी|

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर सूत्रों का चयन । बेहतरीन प्रस्तुति ।

    ReplyDelete
  4. आदरणीया अनिता जी, आज की चयनित रचनाएँ अच्छी रहीं। इस चर्चा अंक के आयोजन के लिए आपको और सभी सहभागियों को साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ

    ReplyDelete
  5. चर्चा में शामिल करने के लिए आभार। 🙏

    ReplyDelete
  6. आज की चर्चा बेहतरीन रही।
    शीर्षक पंक्तियाँ गहन, सार्थक।
    सभी रचनाएं बहुत आकर्षक पठनीय।
    सभी रचनाकारों को बधाई
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

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  7. शानदार चर्चा संकलन

    ReplyDelete
  8. रोचक लिंक से सुसज्जित चर्चा। मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार।

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