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Sunday, February 27, 2022

"एहसास के गुँचे'"( चर्चा अंक 4354)

 सादर अभिवादन

आज की विशेष प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज की युवा पीढ़ी की लड़कियों को अपनी प्रतिभा को प्रमाणित करने के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ता लेकिन आज से 25 साल पहले हम स्त्रियों को खुद के वजुद के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ा है, अपनी इच्छाओं को मारना पड़ा है अपनी काबिलियत को भी दफनाना पड़ा है। ऐसी स्थिति में यदि हम कुछ कर पाए हैं तो ये हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। मेरा मानना है कि प्रत्येक स्त्री के भीतर एक कावित्री छिपी होती है बस उन्हें एक अवसर चाहिए होता है और इस ब्लॉग जगत ने हमें वो अवसर प्रदान किया है । जहां हम अपनी जिम्मेदारियों का भलीभांति निबाह करते हुए भी अपनी रचनात्मक को भी संवार पाए है। ऐसी ही एक प्रतिभाशाली रचनाकार हैं हम सभी की प्रिय आदरणीया अनीता सैनी जी जो इस मंच की उन्दा चर्चाकारा भी है।

अनीता जी ने अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों को बाखुबी निभाते हुए साहित्य जगत में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है।

आज का ये विषेश अंक उन्ही को समर्पित है।

******शुरुआत करते हैं एक हृदयस्पर्शी प्रार्थना के साथ...प्रार्थना

दैहिक दर्द बढ़े पल-पल 
 किंचित मुझ में क्षोभ न हो। 
 रोम-रोम पीड़ा से भर दो 
 यद्धपि मन में मेरे विक्षोभ न हो। 
 हतभाग्य विचार न छूए मन को 
हे!प्रभु ऐसी शुभ अभिव्यक्ति दो। 
 कर्म-कष्ट सहूँ आजीवन बस 
मुझ में इतनी शक्ति दो। 

*******

 वीर जवानों की प्रशस्ति में जो लिखा जाए थोड़ा है माटी के लाल को श्रद्धासुमन अर्पित करती हुई उनकी लाजवाब सृजन

माटी के लाल

सैनिकों की प्रीत को परिमाण में न तोलना 
वे प्राणरुपी पुष्प देश को हैं सौंपतें।
स्वप्न नहीं देखतीं उनकी कोमल आँखें 
नींद की आहूति जीवन अग्नि में हैं झोंकते।

ऐंठन की शोथ सताती,चेतना गति करती।
ख़तरे के शंख उनके कानों में भी हैं बजते।
फिर भी दहलीज़ की पुकार अनसुनी कर 

दुराशा मिटाने को दर्द भरी घुटन हैं पीते।

*******
नारी के आंतरिक खामोशी की व्यथा को शब्दों में पिरोना आसान नहीं.... स्त्री के मासुमियत को उसकी कमजोरी समझने वाले इस समाज के संकीर्ण मानसिकता के विरुद्ध खुद को  साबित करना भी आसान नहीं.. आपकी लेखनी ने इस रचना में स्त्री के व्यथा कथा को हृदय स्पर्शी शब्दों में पिरोया है

वह देह से एक औरत थी

उसने कहा पत्नी है मेरी 
वह बच्चे-सी मासूम थी 
उसने कहा बेअक्ल है यह
अब वह स्वयं को तरासने लगी
उसने उसे रिश्तों से ठग लिया 
वह मेहनत की भट्टी में तपने लगी 
उसने कर्म की आँच लगाई 
 वह कुंदन-सी निखरने लगी 
******

"मां"सृष्टि की एक ऐसी सृजन...जिसके लिए जितना लिखो कम है.... माँ...कभी धूप कभी छांव

माँ...
 उजली धूप बनी जीवन में,
कभी बनी शीतल छांव, 
पथिक की मंज़िल बनी,
कभी पैरों की बनी ठांव 
माँ... 
भूखे की रोटी बन सहलाती,
 बेघर को मिला गंतव्य गांव, 
माँ तुम हृदय में रहती हो मेरे,
हो प्रेरक प्रेरणा की ठंडी छांव
माँ... 

*******
सन 2000 से पहले का परिवेश.. जहां सुख समृद्धि तो कम थी मगर खुशी और शांति भरपूर... समाज में सद्बुद्धि और संस्कार कुछ हद तक व्याप्त था... लेकिन 2019 आते-आते...? 

इस दर्द को वया कर रही है कावित्री अपने शब्दों में

मैं 2019 का परिवेश हूँ

मैं  2019 का परिवेश हूँ,  

मेरी अति लालसाओं ने,  

मेरा बर्बर स्वभाव  किया, 

परिवर्तित होने की राहें, 

परिवर्तन की चाह में, 

इतिहास के अनसुलझे, 

 प्रश्नों को रुप साकार दिया |

*****
कभी कभी खुद का अक्स ही 
कई प्रश्न करने लगता है.. 
कभी कभी तो खुद से ही विद्रोह करने लगता है...
मन के कशमकश को व्यक्त करती 
बहुत ही सुन्दर रचना.
मैं और मेरा अक्स

अँजुरी से छिटके जज़्बात 

मासूम थे बहुत ही मासूम 

पलकों ने उठाया 

वे रात भर भीगते रहे 

ख़ामोशी में सिमटी

लाचारी ओढ़े निर्बल थी मैं। 

*****

कवि हृदय कोमल होता है 

वो अपनी लेखनी में प्रत्येक हृदय की पीड़ा को ही नहीं वरन समस्त सृष्टि की पीड़ा को 

समेट लेना चाहता है, 

ऐसा ही दर्द सिमटा है 

इस बेहतरीन सृजन में.. 

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं... नवगीत

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
पीर परायी धंरु हृदय पर,
छंद बहे रस की सरिता।

मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
पूछ पवन संदेश बहे।
प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
भानु-तपिश जो देख रहे,
जनमानस की हृदय वेदना,
अहं झूलती सृजन कहे।
प्रियतम की यादों में खोई... 
एक विरहन की पाती... 


पाखी मन व्याकुल है साथी 
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े 
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।

मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन 
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
******
प्रत्येक व्यक्ति को खुद से एक बार ये प्रश्न अवश्य पुछना चाहिए... सिर्फ आध्यात्म के दृष्टि से नहीं... स्वयं का आंकलन करने हेतु भी...कौन हूँ मैं ?
कौन हूँ मैं ?
पुकारने पर यही प्रश्न 
लौट आता है।
स्वयं को जैसे आज 
भूल चुकी हूँ।
ज़रुरत कहूँ कि ज़िम्मेदारी 
या  नियति का खेल।
कभी-कभी मैं एक 
पिता का लिबास पहनती हूँ 
कि अपने बच्चों की 
ज़रूरतों के लिए दौड़ सकूँ।
*****
कावयित्री के एहसासों ने बड़ी जतन से एक-एक फुल चुनने शुरू किए और एक दिन हम सभी के समक्ष एक गुलदस्ते के रूप में प्रस्तुत कियाउनकी लेखनी संग्रह "एहसास के गुँचे" पुुस्तक को  अपार सफलता मिली है।पुस्तक प्राप्त करने हेतु लिंक -Ehsas Ke Gunche by Anita Saini • indiBooks
"एहसास के गुँचे' 
एहसास के गुँचे' मेरा प्रथम काव्य-संग्रह छपकर मेरे हाथ में पुस्तक के रूप में आया तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा। यह ख़ुशी आपके साथ साझा करते हुए भावातिरेक से आल्हादित हूँ। *****"सच, अपनी प्रथम पुस्तक का हाथों में होना... बड़े सौभाग्य की बात होती है। वैसे,कवयित्री ने हिंदी के साथ साथ राजस्थानी लोक भाषा में भी महारत हासिल की है। राजस्थानी भाषा की कविताओं को मैंने नहीं जोड़ा क्योंकि इस भाषा का मुझे बिल्कुल ज्ञान नहीं है।मां सरस्वती आदरणीया अनीता सैनी जी की लेखनी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाएं रखें..यही प्रार्थना करती हूं********आज का सफर यही तक, अब आज्ञा देआप का दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा




23 comments:

  1. अनीता जी की रचनाओं को समर्पित आज का ये अंक प्रस्तुत करने के लिए बहुत आभार प्रिय कामिनी जी ।
    अनीता जी लेखनी से निकले शब्द मौलिकता और जीवंतता से ओतप्रोत होते हैं,जीवन संदर्भ का वर्णन भी उनकी लेखनी खूब अच्छी तरह उकेरती है,उनकी पुस्तक "एहसास के गुंचे" के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं और असंख्य बधाइयां 💐💐❤️❤️ पुस्तक का लिंक भी मंच पर डालें तो अच्छा रहेगा ।

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    1. जिज्ञासा जी हृदय से आभार आपका।
      मेरे मन के भावों को आपके द्वारा मिला स्नेह सच ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। आप बहनों का स्नेह अनमोल है।
      सादर स्नेह

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  2. चर्चा मंच का यह अंक बहुत महत्वपूर्ण है।
    अनीता जी को और कामिनी जी आपको भी
    बहुत-बहुत बधाई होे।

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    1. हृदय से आभार आदरणीय सर।
      सादर

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  3. स्वयं को जब आदरणीय कामिनी दी की दृष्टि से देखा तो हृदय सकूँ से भर गया। हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। समय उस बहाव में फिर बह गई जब यह रचना रची थी। जीवन के उतार चढ़ाव एक कोने में हिलोरे भरते भाव शब्द बन कुछ यों फूटे थे।
    इस अनमोल उपहार हेतु दिल से अनेकानेक आभार आदरणीय कामिनी दी जी।
    सादर स्नेह

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    1. भावविह्वल उद्गार हिलोरे मार रहा है। हार्दिक शुभकामनाएँ।

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    2. हृदय में उठते भावों के हिलोरे में हम यों ही खोजते रहे एक दूसरे को, गढ़ते रहे एक प्रेमल छवि। अनेकानेक आभार।
      सादर स्नेह

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  4. बहुत सुन्दर और श्रमसाध्य प्रस्तुति कामिनी जी ! आज की चर्चा में अनीता जी के कृतित्व की मनोहारी झलकियाँ संग्रहणीय हैं ।चर्चा का लिंक सहेज लिया है । अनीता जी की “अहसास के गुँचे” की तरह और भी पुस्तकें प्रकाशित हो और लोकप्रियता अर्जित करें ।

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    1. आदरणीय मीना दी जी आपके द्वारा मिला स्नेह गुड़ की मिठास से कम नहीं। मेरे भावों को आपके द्वारा मिला स्नेह सहेज लिया है दिल ने।
      बौछारों में यों ही भिगोते रहे।
      बहुत सारा स्नेह

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  5. अनमोल के लिए अनमोल उपहार।

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    1. सादर सस्नेह आभार अमृता जी!

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    2. अत्यंत हर्ष हुआ आपका भेजा उपहार मिला।
      हार्दिक आभार।
      सादर

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  6. बहुत बहुत बहुत ही उम्दा व शानदार प्रदर्शन प्रस्तुति हर एक रचना बहुत ही अद्भुत है हर रचना कुछ न कुछ कह रही है! जब शब्द दिल से निकलते हैं तो दिल को छू कर ही रहते हैं!
    वाकई अद्भुत प्रस्तुति💐
    आभार आपका इस खूबसूरत प्रस्तुति के लिए🙏🙏

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    1. हार्दिक आभार प्रिय मनीषा जी।
      सादर स्नेह

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  7. आज का चर्चा अंक कामिनी जी बहुत शानदार रहा, आपने आज का अंक अनिता सैनी जी के अमूल्य खजाने में से चुन-चुन कर प्रस्तुत किया आज की प्रस्तुति में अनिता जी की उत्कृष्ट कृतियों को पढ़वाने के लिए साधुवाद एवं हृदय से आभार आपका।
    अनिता सैनी नाम यूँ तो किसी भी परिचय का अपेक्षी नहीं है फिर भी कहूंगी कि एक उत्कृष्ट लेखनी की स्वामिनी अनिताजी, गीत, नवगीत, मुक्त छंद, छंद मुक्त, अतुकान्त, राजस्थानी लोक गीत, नवगीत एंव लघुकथा आदि अनेक विधाओं पर मुक्त प्रवाह से लिखती हैं।
    आप एक अच्छी चर्चाकार और विनम्र स्वाभ की स्वामिनी हैं ।
    आप में अच्छे साहित्यकार के गुण हैं।
    माँ शारदा आपकी लेखनी को नित्य नई ऊर्जा से सिंचित करें।
    आपकी पुस्तक अहसास के गुँचे मैंने पढ़ी है मोहक रचनाओं का सुंदर संग्रह। पुस्तक की सफलता के लिए हृदय से शुभकामनाएं।
    सस्नेह।

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    1. हृदय तृप्त हो गया,पोर पोर खिल उठा ये स्नेह के मोती सांसों ने धारण कर लिए और संवरकर खिलखिला रही हैं। ममत्व भाव लिए बिखरे पुष्प को हृदय के एक कोने में सजा लिया है आदरणीय कुसुम दी जी दिल से अनेकानेक आभार।
      स्नेह आशीर्वाद यों ही बना रहे।
      सादर स्नेह

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  8. हर रचना पर कामिनी जी के टीका ने रचना को और भी प्रगाढ़ गहनता प्रदान की है ।
    सादर सस्नेह।

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  9. बहुत खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

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    1. हृदय से आभार आपका का।
      सादर

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  10. वाह ! बहुत ही सुंदर अंक, दिल को छू लेने वाली रचनाओं से सजा चर्चा मंच !

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    1. हृदय से आभार आपका।
      सादर

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  11. आज से 25 साल पहले हम स्त्रियों को खुद के वजुद के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ा है, अपनी इच्छाओं को मारना पड़ा है अपनी काबिलियत को भी दफनाना पड़ा है। ऐसी स्थिति में यदि हम कुछ कर पाए हैं तो ये हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
    सही कहा कामिनी जी आपने और इस उपलब्धि को हासिल किया है प्रिय अनीता जी ने।
    अनीता जी की रचनाएं उनके स्वभाव के अनुरूप सहज सरल एवं बहुत ही प्रभावी हैं एवं अपने लेखन को "एहसास के गुंचे" पुस्तक रूप मे सहेज साहित्य को समर्पित कर अपना स्थान साहित्य जगत में निर्धारित किया है जो गर्व की बात है।
    भगवान उन्हें दिनोदिन उन्नति की राह पर अग्रसर रखे यही प्रार्थना है।

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    1. हृदय से आभार आदरणीय सुधा दी जी।
      आपकी कामना फले फुले और मैं बल्लरी सी हरी हो जाऊँ। स्नेह की नमी यों ही मिलती रहे।
      बहुत सारा स्नेह

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