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Friday, April 06, 2012

दीदी दादी होय, दीखती दमकी दृष्टी : चर्चा मंच 841

  लखनऊ  - क्लास  VI स्टुडेंट  ऐश्वर्या  पराशर    Right to Information Act   के अंतर्गत  प्रधानमंत्री जी से यह प्रश्न पूछ । Ministry of Home Affairs (MHA) to the National Archives of India (NAI) किसी के पास यह जवाब नहीं है --                 

  ब्लॉग-जगत में दूसरी वर्षगांठ ....

जी हाँ आज मैंने ब्लोगिंग के दो वर्ष पूरे कर लिए ,यह दो वर्ष कैसे बीते इसका पता ही नहीं चला । लिखना, पढ़ना और टिपियाना यही क्रम चलता रहा । कभी कभी अच्छी पंक्तियाँ, सुंदर अभिव्यक्ति ,बहुत खूब, मजेदार जैसी टिपण्णी करते करते ऊब जाता था मगर ब्लोगिंग की यह आवश्यकता हैं । इसी बीच बहुत से ब्लोगर से बातचीत भी हुई जैसे जाकिर अली रजनीश ,कुंवर कुसुमेश , विजय कुमार सपत्ति , चंद्रमौलेश्वर प्रशाद, शिखा दीपक सुमन लता पाटिल , रश्मि प्रभा और देवेन्द्र पाण्डेय इन दो वर्षों में मेरी प्रोग्रेस कैसी रही यह आप रिपोर्ट कार्ड देख कर बताएं । कुल पोस्ट १५१ ( एक सौ इक्यावन) ( किसी तरह .

ख़त

venus****"ज़ोया" at चाँद की सहेली**** 


सौदागर भेजा करे, नियमित लम्बी किश्त ।
कश्ती जीवन की चले, चले जीविका वृत्त  ।
चले जीविका वृत्त, वाह जोया सन्जोया ।
सुलगे सीली राख, अश्रु  ने इन्हें भिगोया ।

उलाहना अंदाज, आपका है आकर्षक ।
देने पूर्ण हिसाब, सत्य पहुंचेगा भरसक  ।।



बचपन में पी जा रही सोफ्ट ड्रिंक्स के तार जुड़े हैं दिल की बीमारियों से

 साफ्ट ड्रिंक मीठा जहर, घुटे घोंटते घूट ।
लगता अमृत तुल्य यह, पी लो खुल्ली छूट ।
पी लो खुल्ली छूट , लूटता जा बंजारे ।
दुग्धपान के बाद, मिले ये  नए सहारे ।
अगला लौकिक पान, मगर ना कर पायेगा ।
होता दिल बीमार, दाब ना सह पायेगा ।।   



मां बाप का आदर करना सीखिए Manu means Adam

DR. ANWER JAMAL at Blog News

पुरखों के सम्मान से, जुडी हुई हर चीज ।
अति-पावन है पूज्य है, मानवता का बीज ।

मानवता का बीज, उड़ाना हँसी ना पगले ।
करे अगर यह कर्म, हँसेंगे मानव अगले ।  

पढो लिखो इतिहास, पाँच शतकों के पहले ।
आदम-मनु हैं एक, बाप अपना भी कह ले ।।


चटकनी

 


देहली सजनी से मिलन, करता कष्ट कपाट ।
लौह-हृदय कब्जे लगे,  देते अन्तर पाट ।

 देते अन्तर पाट , दुष्ट गिट्टक इ'स्टापर ।
खलनायक बन टांग, अड़ा देते नित-वासर ।

रविकर बड़ी महान, हमारी छोट सिटकिनी ।  
है सुधीर आभार, मिलाती देहली सजनी ।।    
    


माधवी शर्मा गुलेरी at उसने कहा था...  
मन के भी*तर** **की** **यात्रा** **अनवरत** **है।** **कहना** **कठिन **है** ** कि** **यह** **अंतर्यात्रा** **कब** **और** **कैसे** **शुरू** **होती** **है पर **बाहर** **की** **यात्रा** **एक** **छोटे**-से** **क़दम** **से** **शुरू** **हो** जा**ती** **है।** **कभी, **किसी** **अनजान** **जगह** **पर **निरुद्देश्य ** **भटकने से हम वो पा जाते हैं जो दस किताबें पढ़कर नहीं पाते।  

जाट-देवता द्वारा प्रेषित दो लिंक 

Ghrishneshwar Jyotirling / घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग: आस्था का सैलाब

जय घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मेरी पिछली पोस्ट में मैंने आपको अवगत कराया था औरंगाबाद तथा आसपास के दर्शनीय स्थलों से, और आइये अब मैं आपको लिए चलता हूँ औरंगाबाद के ही समीप स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर तथा एलोरा की प्रसिद्द गुफाओं के दर्शन कराने के लिए. जय घृष्णेश्वर अगले दिन सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर हम निकल पड़े घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए. समय था सुबह के लगभग आठ बजे का, ठण्ड का मौसम था, और जनवरी माह की यह एक ठंडी सुबह थी. 

एक और लिंक 

सफ़र है सुहाना 

 एक सुनहरा सफ़र मनाली का


द्वारा : रीतेश गुप्ता 





नाचो हे, नाचो, नटवर !

मनोज कुमार at राजभाषा हिंदी -  
  आप सब को अनामिका का सादर प्रणाम!

दिनकर जी को आवेश में आते देर नहीं लगती थी.
कोई आश्चर्य नहीं कि जीवन के उषःकाल में ही दिनकर जी जमीदारी प्रथा के विरूद्ध हो गए. जमींदारी प्रथा और जनतंत्र के खिलाफ इनकी कविताओं में जो कटुता व्यक्त हुई, उसके मूल में बहुत कुछ वैयक्तिक अनुभव ही हैं.
सन १९३३ ई. में इन्होने तांडव कविता लिखी, यह कविता इन्होने ख़ास तौर से वैद्यनाथ धाम (देवघर) जाकर, शंकर महादेव को सुनाई थी. परन्तु १९४९ में जब ये बाल-बच्चों को लेकर मंदिर में पहुंचे तो देखा कि वहां मिथिला की बहुत सी ग्रामीण स्त्रियाँ जल चढाने की प्रतीक्षा में खड़ी जाड़े से थर थर कांप रही थीं और पंडा उन्हें जल चढाने से रोके हुए था. पंडा अपने किसी सेठ यजमान की पूजा करवा रहा था और कहता था कि जब तक वह यजमान पूजा समाप्त नहीं कर लेता, मैं किसी को भी जल चढाने नहीं दूंगा. धर्म की छाती पर पूँजी का यह नंगा नाच था.


                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                       जो बोले सो कुंडी खोले  ...एक नाटिका ...डा श्याम गुप्त

                (  नगर की एक सामाजिक संस्था की शाखा सभा की एक साधारण बैठक ....)
                
                                                    दृश्य -एक
सत्येन्द्र जी ( फोन पर)--हेलो रमेश जी ! आज शाखा सभा की बैठक है , एन्ज. रवि जी के यहाँ , चलेंगे ?
रमेश जी -- हाँ ..हाँ ..चलेंगे, रमेश जी ने तो डिनर भी रखा है । जायेंगे...जायेंगे ..।

आजकल पता नहीं क्यों लिखने से
मन कतराता है...घबराता है
फिर उलझ-उलझ कर रह जाता है
समझ नहीं आता कि
क्या लिखूँ!
कहां से शुरू करूँ और कहां ख़त्म
विचारों का झंझावात जोशोख़रोश से
 

अति-जोखिम का काम, करे जो वही सयाना-

NAINITAL LAKE नैनीताल झील

   जाट देवता का सफ़र

मृगया करते फिर रहा, मृग नयनी के नैन ।
नैनी नोनी नयन ने, किया जाट बेचैन ।

किया जाट बेचैन, छलें अति-महंगे जामुन ।
नाविक पंडा सरिस, दिखाए अपने अवगुन ।

लेकर पैडल बोट, ताकिये नीले बादल ।
नीला हरित सफ़ेद, बदलता ऋतु से यह जल ।।

 

भूख

बबन-पाण्डेय  at मेरी बात

क्षुधा मिटे ते कामना, बढ़ें ह्रदय अभिलाख ।
बढे लालसा वासना, हो बकवादी भाख ।
हो बकवादी भाख, भाड़ में जाए इज्जत ।
समझाए धी लाख, चाबता पापड लिज्जत । 
मिटा सका जो भूख, आदमी भूखा तब भी ।
हो दानव या देव, झेल जाएगा रब भी ।

सफलता ही सब कुछ है....चाहे डर्टी बनें .. डा श्याम गुप्त...

डा. श्याम गुप्त / एक ब्लॉग सबका
करो परीक्षा पास तुम, नक़ल शकल दम घूस ।
खड़ी व्यवस्था राज की,  नक्सल बनकर चूस ।
नक्सल बनकर चूस, अधिकतर लोग उपेक्षित ।
किस्मत जो मनहूस, लूट लो चीजें इच्छित ।
चहकें झंडे गाड़, कैरिअर गुरु की दीक्षा ।
लाव सफलता पास, पास ना करो परीक्षा ।।

तब और अब ...कविता , कवि और नायक / महानायक की इच्छा.......डा श्याम गुप्त..

दन्त हीन जब हो गया, ख्वाहिश गन्ना खाय ।
जब तक नाडी दम रहे, तब तक नहीं बुझाय ।

तब तक नहीं बुझाय, कैरियर खूब बनाया ।
लम्बी रेखा खीँच, जया-विजया तब पाया ।

बड़ी प्रीमियर लीग, नहीं घाटे का सौदा ।
बनिया बच्चन रीझ, बनाने चला घरौंदा ।। 

कविताई

संगीता स्वरुप ( गीत ) at गीत.......मेरी अनुभूतियाँ
 किलकारी में हैं छुपे, जीवन के सब रंग ।
सबसे अच्छा समय वो, जो बच्चों के संग ।

जो बच्चों के संग, खिलाएं पोता पोती ।
दीपक प्रति अनुराग, प्यार से ताकें ज्योती ।

दीदी दादी होय, दीखती दमकी दृष्टी ।
ईश्वर का आभार, गोद में खेले सृष्टी ।  

माँ, जहां ख़त्म हो जाता है अल्फाजों का हर दायरा....

  विशाल चर्चित 

इक अति छोटे शब्द पर, बड़े बड़े विद्वान ।
युगों युगों से कर रहे, टीका व व्याख्यान ।

टीका व व्याख्यान,  सृष्टि को देती जीवन
न्योछावर मन प्राण, सँवारे जिसका बचपन ।
हो जाता वो दूर,  सभी सिक्के हों खोटे ।
कितनी वो मजबूर, कलेजा टोटे टोटे ।।

कुछ तो लिखो मेरे यार.....

  दीपक बाबा की बक बक 
गटको मयखाना सकल, अकल गुमे श्रीमान ।
सूफी की वह बेखुदी, मेटो गर्व गुमान ।
मेटो गर्व गुमान, बैठ-की-बोर्ड मरोड़ो ।
लिखना हो आसान, बोतलें ख़ाली फोड़ो ।
राम कृष्ण रहमान, मंथरा माया ममता ।
मुजरा, ड्रामा फिल्म, व्यंग बाबा पर जमता ।।

किन लोगों को नरक में जाना पड़ता है?

नरेश ठाकुर at Knowledge Is Power

प्रीति होय न भय बिना, दंड बिना ना नीति ।
शिक्षा मिले न गुरु बिना, सद्गुण बिना प्रतीति ।

सद्गुण बिना प्रतीति, दोस्त को धोखा देना ।
हो दबंग की जीत, स्वार्थ की नैया खेना ।
रविकर सबकुछ भूल, चलाता  चप्पू जाए ।
सबको रहा सता, नरक पूरा विसराये ।

"ग़ज़ल-आशा शैली हिमाचली" (प्रस्तोता-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

  उच्चारण



  आज लूँ संवार ♥

मितवा मुस्काए देखो बन्दन वार
सुधि की तितली आई है मन के द्वार

झाड़-पोंछ पफेंक आई जीवन की कुण्ठा
घर की हर एक दिशा आज लूँ संवार

बरखा की रिमझिम है बून्दों का शोर
आया मधुमासों पर मादक निखार

वृक्षों पर चहकी है मैना मतवाली
जंगल में मोरों के नृत्य की झंकार

 

15 comments:

  1. रविकर फैजाबादी नया नाम है आया
    चटकाने पर वापिस चर्चामंच पर ले आया
    कुछ अलग अलग चर्चा का पन्ना है बन आया
    सबसे पहले "उल्लूक" टिप्पणी छापने चला आया।

    आहा आहा !!

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  2. चिड़िया-घर का मैं दिखूं" "सब" का गधा प्रसाद |
    छुपा कर्म-गुण लिख दिया, रविकर फैजाबाद |

    रविकर फैजाबाद , गदा से भारी लगता |
    जुड़ा मूल से आज, कुशल व्यापारी लगता |

    अब आएँगी खूब, टिप्पणी भारी भारी |
    बाऊ-जी ही-इ-इ-इ, करी भैया तैयारी |

    सादर

    पहली टिप्पणी के लिए आभार ||

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति,..नये उपनाम की बधाई ..

    MY RECENT POST...फुहार....: दो क्षणिकाऐ,...

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  4. विस्तृत और सार्थक चर्चा ...आभार

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  5. सार्थक सटीक छर्चा |अच्छी लिंक्स |
    आशा

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  6. आजकल पता नहीं क्यों मन कुछ भी लिखने से कतराता है

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  7. चर्चा पे छाये रविकर ,

    ब्लोगियंन कु हर्षाये रविकर ,

    हरदम बांटे ज्ञान गधा खुद को बतलाये

    ग्यानी झांके बगलें कुछ भी बोल न पायें . ,

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  8. बढ़िया चर्चा .

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  9. उपयोगी लिंकों के साथ बहुत सुन्दर चर्चा!
    आभार!

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  10. आज लौटे हैं सफ़र से,
    लौटकर देखी आपकी फ़नकारी
    वाक़ई लाजवाब है आपकी पेशकश.
    शुक्रिया !

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