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Saturday, April 07, 2012

गुनगुनाते रहो, पास आते रहो : चर्चा मंच 842

गुरुवर के आदेश से , मंच रहा मैं साज ।
निपटाने दिल्ली गये,  एक जरुरी  काज । 
एक जरुरी  काज, बधाई अग्रिम सादर ।
मिले सफलता आज, सुनाएँ जल्दी आकर ।
रविकर रहा पुकार, कृपा कर बंदापरवर ।
अर्जी तेरे द्वार,  सफल हों मेरे गुरुवर ।।

भारत सरकार में राज्यमन्त्री
मा. हरीश रावत जी से
उनके सरकारी आवास
तीन मूर्ति लेन, नईदिल्ली में 
मेरी भेंट-वार्ता हुई!

रावत जी से भेंट की, निबटे सारे काज।
दिल्ली से मैं लौटकर, घर आया हूँ आज।१।

अच्छे से माहौल में, हुई हमारी बात।
अर्जी को स्वीकारना, ईश्वर के है हाथ।२।

मित्रों के आशीष से, पूरी होगी आस।
शासन में पद मिलेगा, ऐसा है आभास।३।

स्वप्न रहस्य -सतीश सक्सेना

*अली सर से आज फोन पर बात करते हुए उनके नए लेख की चर्चा हुई जिसमें उन्होंने किशोरावस्था में किसी विदेशी लड़की को स्वप्न में देखा था और उसका चेहरा मोहरा और आकृति आज भी उन्हें याद है !  

palash "पलाश"

क्या पता कल..............Who can see tomorrow


आज जो है संग तेरे, उनके साथ जी लो जिन्दगी,
क्या पता कल उनसे कभी, फिर मुलाकात हो कि ना हो....

राह में काँटें मिले तो भी रुको नही, बढते ही चलो,
क्या पता कल मंजिल को तेरा इन्तजार हो कि ना हो...
स्वातंत्र्य-वीरपिछले कई दिनों से राष्ट्रपिता चर्चा में हैं। आश्चर्य इस बात पर नहीं है कि राष्ट्रपिता चर्चा में हैं। आश्चर्य इस बात पर भी नहीं है कि इस प्रश्न से कई लोगों के दिल में राष्ट्रभक्ति की चिंगारी फिर से स्फुरित होने लगी है। सच पूछिये तो आश्चर्य है ही नहीं, हाँ दुःख अवश्य है। एक नन्हीं सी बच्ची को अपने राष्ट्र और राष्ट्रपिता के बारे में किये गये इस सामान्य से प्रश्न का जवाब न घर में मिला न विद्यालय में। शर्म की हद तब हो गयी जब सरकार के प्रतिनिधियों की ओर से भी इस सीधे से सवाल का सीधा जवाब नहीं मिला। पूरी कहानी तो शायद आप सबको पता ही होगी।

ब्लॉग जगत की बड़ी शख्सियत गुरदेव समीर लाल.....संजय भास्कर

आज कई दिनों बाद ब्लॉग पढने के लिए ओपन किया तो सबसे पहले समीर लाल जी की रचना ....बुरा हाल है ये मेरी जिन्दगी का...... उसे पढने के बाद अचनाक गुरदेव समीर जी की करीब दो साल पुरानी रचना | की कुछ लाइन याद आ गई जो आपको भी याद होगी शायद....... !!!! अर्थी उठी तो काँधे कम थे, मिले न साथ निभाने लोग बनी मज़ार, भीड़ को देखा, आ गये फूल चढ़ाने लोग... ! समीर लाल जी ब्‍लॉगजगत की ऐसी शख्सियत हैं जिनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है इनका लेखन जिस विषय पर भी हो प्रत्‍येक शब्‍द दिल को छूकर गुज़र जाता है चाहे किसी भी विषय पर लिखे शब्द अपने आप बनते चले जाते है जो उनकी ऊर्जावान जीवन शैली का प्रतीक है...

याद रखो न्याय की कश्ती रेत पे भी चल जाती है !! 

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"

  (गिरीश"मुकुल")  मिसफिट Misfit

चित्र साभार :एक-प्रयास
आज़ किसी ने शाम तुम्हारी
घुप्प अंधेरों से नहला दी
तुमने तो चेहरे पे अपने,
रंजिश की दुक़ान सजा   ली ?
मीत मेरे तुम नज़र बचाकर
छिप के क्यों कर दूर खड़े हो
संवादों की देहरी पर तुम
समझ गया  मज़बूर बड़े हो  ..!!
षड़यंत्रों का हिस्सा बनके
तुमको क्या मिल जाएगा
मेरे हिस्से मेरी सांसें..
किसका क्या लुट जायेगा …?
चलो देखते हैं ये अनबन
किधर किधर ले जाती है..?
याद रखो न्याय की कश्ती
रेत पे भी चल जाती है !!

याद आ गया कोई ....

मैं लगा रहा था उनको गले 
वो बना रहें थे ,मुझसे दुरी 
मेरी तो फ़ितरत ही ऐसी है 
होगी कुछ उनकी भी मज़बूरी |
 ----अशोक"अकेला"

रुनझुन

पहला ज्योतिर्लिंग दर्शन....

[bhilai+to+gandhidham+067.jpg]
     आज टी.वी. पर मैं एक कार्यक्रम देख रही थी- "देवों के देव महादेव" तो अचानक मुझे शंकर भगवान से जुड़ी एक कहानी याद आ गई... मैंने सोचा आप सब से ज़रूर शेयर करूँगी... पता है कौन सी कहानी....बताती हूँ....

बनता जाय लबार, गाँठ जिभ्या में बाँधों -

यात्रानामा: समय की धार में सब बह गया

satish sharma 'yashomad' at यात्रानामा -

फुर्सत जीवन में कहाँ, बहते रहे अबाध |
बहने से ज्यादा मिला,  ईश्वर भक्ति अगाध |
ईश्वर भक्ति अगाध, रास्ते ढेर दिखाते ।
उड़कर आऊं पास, छेकते रिश्ते नाते ।
स्वार्थ सिद्धि का योग, पूर कर उनकी हसरत ।
टिप्पण पाऊं ढेर, मिले न हमको फुर्सत ।।

सब्ज़ियों के प्रकार और पोषक तत्व

कुमार राधारमण at स्वास्थ्य-सबके लिए

सब्जी के संसार पर, डाली राधा दृष्टि ।
पौष्टिक व स्वादिस्ट है, चखते कृष्णा सृष्टि ।। 

भाई मेरे ! मरो नहीं !

Dr.J.P.Tiwari at pragyan-vigyan

मरने से ज्यादा कठिन, जीना इस संसार ।
करे पलायन लोक से, होगा न उद्धार ।  
होगा न उद्धार, जरा पर-हित तो साधो ।
 बनता जाय लबार, गाँठ जिभ्या में बाँधों ।
फैले सत्य "प्रकाश", स्वयं पर "जय" करने से । 
होय लोक-कल्याण, बुराई के मरने से ।   
परखनली में दीखता, तात्विक प्रेम प्रसाद ।
दहन-गहन लौ कीजिये, सरस द्रव्य के बाद ।
 सरस द्रव्य के बाद, देखते रहो रिएक्शन ।
धुवाँ जलाये आँख, दूर कर दीजै तत्क्षण ।
और अगर स्वादिष्ट, मिष्ट सी आये ख़ुश्बू ।
फील्ड वर्क प्रोजेक्ट, गाड़ दे तम्बू-बम्बू ।।
एक मनमोहक रपट 
जाट देवता द्वारा प्रेषित लिंक ।। 

और वह मरने कि हद तक जिन्दा रहा!!

PD at मेरी छोटी सी दुनिया

आय-हाय इस दर्द को, काहे रहे उभार ।
आशिक शायर बन गया, पड़ी वक्त की मार ।
पड़ी वक्त की मार, बदलता जीवन पाला ।
मरने की हद उफ्फ़, लगा किस्मत पर ताला ।
ढोता पल-पल स्वयं, आज तक लाश सर्द को ।
पट्टा कर दे बेंच,  दफ़न कर सकूँ दर्द को ।।
कुछ कुछ की कोशिश करें, कुछ न कुछ हो जाय ।
दुनिया कुछ समझे तभी, कुछ कर व्यक्ति दिखाय ।  


मनोज पटेल की एक जबरदस्त प्रस्तुति

वेरा पावलोवा की नोटबुक से

  पढ़ते-पढ़ते -

(१)
कविता होती तब शुरू, जब शंकित भवितव्य । 
पाठक कवि के बीच में,  सब कुछ हो शंकितव्य ।।
 (२)
चार लाख अंडाणु को, रखती इक नवजात ।
पहले से ही देह में, कविता आश्रय पात ।। 

क्या है ग्लाईकीमिक इंडेक्स ?

क्या है ग्लाईकीमिक इंडेक्स ?What is glycaemic index? (GI?). कार्बो -हाइड्रेट्स युक्त खाद्यों की एक रेंकिग(मूल्य भार ,मान ) का नाम है 'जी आई ' इस RENKING पर शुद्ध ग्लूकोज़ का मान है १०० .यानी ग्लूकोज़ का जी आई १०० है . कौन सा खाद्य ग्लूकोज़ के बरक्स कितना ब्लड सुगर बढाता है वह उसके 'जी. आई.' मान का द्योतक है . कम जी आई मान वाले खाद्य धीरे -धीरे पचते हैं और ज़ज्ब भी आहिस्ता आहिस्ता होतें हैं .तुरत फुरत नहीं .इसलिए ब्लड ग्लूकोज़ को यह कम असर ग्रस्त करते हैं . किसी खाद्य का 'जी. आई.' कई बातों पर निर्भर करता है . ब्रांड और खाद्य की किस्म वेरायटी के मुताबिक़ इसका मान बदल जाता है ..

लोफर..... लघु कथा ........डा श्याम गुप्त...

एक ब्लॉग सबका
       'एक ब्रेड देना ।'
       दूकान पर बैठे हुए  सुन्दर ने ब्रेड देते हुए कहा ,' पांच आने ।'
       'लो, तीन आने लुटाओ ।' अठन्नी देते हुए रूपल ने कहा ।
       लुटाओ या लौटाओ, सुन्दर ने उस के चहरे की तरफ घूर कर देखते हुए पैसे उसके हाथ पर रख दिए ।
         केपस्टन  की सिगरेट फूंकना, उजले कपडे पहनना, लड़के लड़कियां अंग्रेज़ी स्कूल में ही पढ़ते थे व अंग्रेज़ी में बोलने में ही शान समझते थे ।

मैं तो सपाट सीधी सी एक डाली थी

जो न झुकी, न टूटी थी कभी

उम्र भी न झुका सकी थी मुझे

आसमां को छूने की जिद्द में


''उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना'' [डॉ. पूर्णिमा शर्मा की पुस्तक]

''उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना'' [डॉ. पूर्णिमा शर्मा की पुस्तक] *पुस्तक - उपन्यास, भाषा और स्वातंत्र्य चेतना (2011)* *लेखिका - पूर्णिमा शर्मा * *प्रकाशक - लेखनी, नई दिल्ली - 110 059 (भारत )* *मूल्य - 650 रुपए* *आई एस बी एन - 978-81-920827-3-8* *कुल पृष्ठ - 284*  
 प्रस्तुति
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)
   उच्चारण 

इन्द्र बहादुर सेन, ‘कुँवर कान्त’ की एक रचना

♥♥ सौन्दर्य बोध ♥♥

शृंगार जितना भी
किया है तुमने...
वह तुम्हारी वास्तविक
सुन्दरता से 
बहुत कम है।
मैं जानता हूँ 
कि, तुम्हारा हृदय...
सागर से भी गहरा है।

क्या क्या खिलाती है?

क्या क्या खिलाती है? न पूछो आप हमसे औरतें क्या क्या खिलाती है ये खुद गुल है,मगर फिर भी,हजारों गुल खिलाती है हसीं हैं,चाँद सा चेहरा,ये मेक अप कर खिलाती है अदा से जब ये चलती है,कमर को बल खिलाती है ख़ुशी में,प्यार में,जब झूम के ये खिलखिलाती है चमक आँखों में आ जाती,हमारे दिल खिलाती है करो शादी अगर तो सात ये फेरे खिलाती है किसी वीरान घर को भी ,चमन सा ये खिलाती है पका कर दो वख्त ,ये मर्द को ,खाना खिलाती है जो बच्चे तंग करते,उनको ,रोज़ाना खिलाती है कभी गुस्सा खिलाती है,कभी धमकी खिलाती है जरा सी बात ना मानो,तो बेलन की खिलाती है कभी होली खिलाती है,कभी गोली खिलाती है ये कडवे डोज़ भी हमको,बनी भो..
मेरे हमसफ़र उदास न हो  
साहिर लुधियानवी

  Mukesh Bhalse - मेरे दिल की आवाज़



मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो

कदम कदम पे चट्टानें खडी रहें लेकिन
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र ......

घिर बदरा कारे...

Amrita Tanmay at Amrita Tanmay
गर्मी  का उत्ताप
धरा  करे विलाप
पड़   गयीं   दरारें
सूखे   ओंठ  सारे
उड़     रहीं   धूल
मूर्झा   गये  फूल

चांदनी शब् गुजार दी यूं ही जलकर हमने

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" at My Unveil Emotions -

हमको दुनिया में ग़मों की ही सौगात मिली
ख्वाइश-ए-गुल थी, खारों की बरसात मिली

चांदनी शब् गुजार दी यूं  ही जलकर हमने
अब्र में चाँद छुपा , तारों की बारात मिली

20 comments:

  1. तू यूं ही सजा चर्चा -ए -लिंक ,

    हम रातों को जागेंगे रोज़ रोज़ .

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  2. आज भी बहुआयामी चर्चा |
    आशा

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  3. बहुत बढिया! अच्छे लिंक, सुन्दर चर्चा, आभार!

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  4. फुलवारी है आज की न्यारी
    मधुमक्खियाँ और भवँर भी
    सज रही है एक एक क्यारी
    उल्लूक कौने में रहा सँवर भी।
    ़़़़़
    आभार ! निहारते रहेंगे दिन भर बार बार ।

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  5. some of the likns are intresting, some are informative and some are heart touching.. very balanced charchaa..
    also thanks for inluding me ....

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  6. दिन में कैसी है नजर, धूप में होगी चूक |
    गधा सम्भाले दिन सकल, मूक रहे उल्लूक |

    मूक रहे उल्लूक , रात में जागना भैया |
    दिन में आँखें मीच, रत भर जागें पढ़ैया |

    ही इ इ गदाप्रसाद, बोझ ढोने में माहिर |
    मिले आपका प्यार, करूँ मैं भी जग-जाहिर ||

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  7. मूक रहे उल्लूक , रात में जगना भैया |
    दिन में आँखें मीच, रात भर जगें पढ़ैया |

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  8. आज की चर्चा तो बहुत रोचक ढंग से की है!
    आभार!

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  9. aaj ki charcha bahut acchi hai. sabhi link shandar hai

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  10. सार्थक सुन्दर चर्चा, आभार रविकर भाई!!

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  11. बहुत ही बढिया लिंक्‍स का संयोजन किया है आपने ...आभार ।

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  12. बहुत अच्छे लिंक हैं, मुझे शामिल करने के लिए आभार

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  13. बहत सुन्दर लिंक्स ....रोचक चर्चा...

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  14. थैंक्यू रविकर अंकल मुझे इस चर्चा में शामिल करने के लिए....बाप रे!!! कितने सारे लिंक्स !!!... मैं तो सारे पढ़ भी नहीं पाऊँगी... और शायद ये सब मेरे समझ में भी न आयें लेकिन हां राजस्थान की सैर तो मैंने कर ली बहुत मज़ा आया... बहुत इंट्रेस्टिंग थी ये सैर... अभी देखती हूँ मुझे और क्या-क्या पसंद आयेगा.... एक बार फिर ढेर सारा थैंक्यू!!!

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  15. बहुत बढ़िया लिंक्स के साथ सार्थक चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  16. अच्छी वार्ता... बहुत अच्छे लिंक... हमारी रचना को स्थान देने के लिए आभार आपका...

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  17. रोचक चर्चा ..मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार आपका...

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  18. सुन्दर चर्चा.. आभार...

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