समर्थक

Sunday, October 22, 2017

"एक दिया लड़ता रहा" (चर्चा अंक 2765)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--

दिया और हवाएं 

इस बार की दिवाली कुछ अलग थी, 
बस थोड़े से चिराग़ जल रहे थे, 
अचानक तेज़ हवाएं चलीं, 
एक-एक कर बुझ गए दिए सारे, 
पर एक दिया जलता रहा, 
लड़ता रहा तब तक, 
जब तक थक-हारकर चुप नहीं बैठ गईं हवाएं... 
कविताएँ पर Onkar 
--

मुक्त-ग़ज़ल : 242 -  

महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥ 

गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥ 
पिन नहीं पैना छुरा हूँ... 
--
--

वर्तमान परिवेश में हमारे पर्व  

दिवाली के अवसर पर हिन्दुओं के पंचपर्व की श्रंखला में आज अंतिम पर्व है , भैया दूज। यह महज़ एक संयोग हो सकता है कि हिन्दुओं के सभी त्यौहार तीज के बाद आरम्भ होकर मार्च में होली पर जाकर समाप्त होते हैं। फिर ५ महीने के अंतराल के बाद पुन: तीज पर आरम्भ होते हैं। निश्चित ही इसके सामाजिक , आर्थिक , भूगोलिक और मौसमी कारण भी हो सकते हैं... 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल 
--

ये दिये रात की ज़रूरत थे.... 

बशीर बद्र 

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal  
--

पल दो पल 

पल दो पल सकून से जी लेने दे ए जिंदगी
कुछ और नहीं
बस अपने आप से गुफ्तगूँ कर लेने दे ए जिंदगी
साँसों के अहसानों की रजामंदी में
ग़लतफ़हमी से खुशफ़हमी कर लेने दे ये जिंदगी... 

RAAGDEVRAN पर 
MANOJ KAYAL  
--
--

गीत  

"भइया दूज का तिलक"  

7 comments:

  1. शुभ प्रभात भाई
    आभार
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर सूत्र आज की चर्चा में ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी !

    ReplyDelete
  3. चर्चा मंच के निरंतर निःस्वार्थ श्रम को प्रणाम!
    सुन्दर चर्चा!
    आभार!

    ReplyDelete
  4. सुन्दर लिंक्स. मेरी कविता शामिल की. आभार.

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिये बहुत बहुत धन्यबाद।

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin