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Saturday, March 09, 2019

"जूता चलता देखकर, जनसेवक लाचार" (चर्चा अंक-3268)

मित्रों!
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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दोहे  

"जूतों की बौछार"  

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कुछ और नहीं हमी की तरह है 

कुछ और नहीं हमी की तरह है  
ये जिंदगी जिंदगी की तरह है  
यों न झुका सर हर चौखटों पर  
ये आदत बंदगी की तरह है... 

sanjay kumar maurya 

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"रावण पुष्ट होकर पल रहा" 

देश में केवल हमारे, 
आज पुतला जल रहा, 
दुष्ट रावण तो दिलों में, 
पुष्ट होकर पल रहा, 
आओ सच्चा पथ दिखाएँ, 
स्वयं को परिवार को। 
बाँट दें सारे जगत में, 
सत्य के उपहार को।। 
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मुकुट रँग रँगीले 

parmeshwari choudhary 

चौराहों के बच्चे 

Sudhinama पर sadhana vaid  
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महिला दिवस 

Akanksha पर 
Asha Saxena  

लो फिर आ गया महिला दिवस 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 

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ग़ज़ल को उम्दा रखेंगे। 

Nitish Tiwary 

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जिन्हें चम्बल में रहना था  

वे अब संसद में रहते हैं 

किसी ने ठीक ही कहा है। हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे हैं। इन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद और विधानसभा में भेजा है। अब वक़्त आ गया है इन्हें जेल भेजा जाए। अपने-अपने कार्यों के अनुरूप... 

abhishek shukla 

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7 comments:

  1. जो जनता ने करना है वो खुद कर ले रहे हैं सेवक। सुन्दर जूता चर्चा। आभार आदरणीय 'उलूक' के छींकने को भी जगह देने के लिये।

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  2. बहुत सुंदर चर्चा। मेरी ग़ज़ल को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. बहुत बढ़िया सूत्र ! मेरी रचना को आज के मंच पर स्थान देने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  4. बेहतरीन
    आभार
    सादर

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  5. सुन्दर चर्चा

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  6. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति 👌
    मुझे स्थान देने के लिए तहे दिल से आभार आदरणीय
    सादर

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  7. बेहतरीन लिंक्स संयोजन के साथ उम्दा प्रस्तुति

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