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Monday, March 25, 2019

"सबके मन में भेद" (चर्चा अंक-3285)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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प्रेम के कल्पवृक्ष 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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काशी में मोक्ष 

देवेन्द्र पाण्डेय 
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"दीप "  

( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ) 

दीप नन्हा सा धरा पर जल रहा है 
 उजियार उसमें दो जहां का पल रहा है

 नेकिया सब काम आएंगी तुम्हारी
 बदकिस्मती का दौर देखो चल रहा है... 
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ख़ामोश फिर भी बहेंगे.....  

महेशचन्द्र गुप्त 'ख़लिश' 

नहीं ज़िक्र तेरा किसीसे करेंगे
मगर अश्क ख़ामोश फिर भी बहेंगे

मुहब्बत तेरी फ़क्त थी इक दिखावा
बहुत पाक थी तू, सभीसे कहेंगे... 
Digvijay Agrawal  
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2 comments:

  1. सुन्दर सोमवारीय चर्चा।

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  2. सार्थक दोहे से शुरू होने वाली चर्चा शानदार रही। बधाई।

    ReplyDelete

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