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Sunday, October 04, 2020

"एहसास के गुँचे" (चर्चा अंक - 3844)

 मित्रों !

आज सबसे पहले... 

देश में हो रहे सिलसिलेवार न थमने वाली गैंगरेप की घटनाएं बहुत चिन्ताजनक हैं और इनकी जितनी निन्दा की जाये वो कम है। 

अभी हाल ही में जनपद हाथरस के बूलगढ़ी में हुई दलित नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप व दरिन्दगी एवं जान से मारने के प्रयास की घटना ने देशवासियों को झकझोर कर रख दिया है। देश-प्रदेश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है।  

प्रतिदिन देश के तमाम जनपदों से हत्या, रेप, गैंगरेप और जघन्य अपराधों की तमाम घटनाएं समाचारपत्रों की सुर्खियां बन रही हैं। लचर कानून व्यवस्था और दोषियों पर तत्काल ठोस कार्यवाही न किये जाने से देश में ऐसे अपराधों की बाढ़ सी आ गयी है। 

चर्चा मंच के माध्यम से सरकार से माँग की जाती है कि वो कठोर कानून बनाये। जिससे कि ऐसी दुर्दान्त घटनाओं पर लगाम लग सके।

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रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

अब चलते हैं कुछ अद्यतन लिंकों की ओर...! 

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एहसास के गुंचे' की समीक्षा- 

समीक्षा लेखन सचमुच एक कठिन कार्य है क्योंकि संपूर्ण पुस्तक के अध्ययन के उपरांत ही समीक्षक किसी निष्कर्ष पर पहुँचता / पहुँचती है और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए लेखनी चलती है।
आदरणीय डॉ. दिलबाग सर का तह-ए-दिल से शुक्रिया इतनी बेहतरीन समीक्षा के लिए।
लीजिए आप भी पढ़िए 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा-

पहली दस्तक से उम्मीद जगाता विविधता भरा कविता-संग्रह

कविता-संग्रह - एहसास के गुँचे
कवयित्री - अनीता सैनी

 "एहसास के गुँचे" अनीता सैनी का प्रथम संग्रह है। इस संग्रह में 128 कविताएँ हैं। पहली कविता गुरु वंदना के रूप में है, जिसमें 5 दोहे हैं। कवयित्री के अनुसार गुरु के ध्यान से ज्ञान की राह संभव होगी, उनके अनुसार गुरु महिमा का बखान संभव नहीं -
"गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान
जाकर के गुरुधाम में, मिलता हमको ज्ञान।" (पृ. - 19)
इसके बाद की 127 कविताओं को वर्ण्य-विषय के आधार पर 6 विषयों में विभक्त किया गया है।

अनीता सैनी, गूँगी गुड़िया  

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बालगीत  "राम सँवारे बिगड़े काम" हनुमानगढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित बालपत्रिका "टाबर टोली" में मेरा बालगीत

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एक पथिक 

हे क्लांत पथिक क्यूँ छाँव देख  
विश्राम नहीं करते है  ऐसा क्या वहां क्यूँ पहुँचाने की जल्दी है तुम्हें |  यह तक भूले हो कितने परेशान  इस विपरीत मौसम में... 

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खाली प्याला 

बैंक में नौकरी लगे मनोहर को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे. इम्तिहान देकर नौकरी लगी तो अपना गाँव कसेरू खेड़ा छोड़ कर कनॉट प्लेस पहुँच गए. कहाँ हरे भरे खेत और गाय भैंस का दूध और कहाँ ये कंक्रीट जंगल और चाय और कॉफ़ी. पर फिर भी कनॉट प्लेस की इमारतें, बड़े बड़े सुंदर शोरूम, रेस्तरां वगैरह में मनोहर उर्फ़ मन्नू भैया का दिल उलझ गया...

Harsh Wardhan Jog, Sketches from life  

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लघुकथा :  एक संवाद कुछ यूँ ही सा कुछ यूँ ही सा पार्क में चबूतरे पर खड़े - खड़े थक जाने पर गांधी जी ने सोचा कि किसी के भी सुबह की सैर पर आने से पहले थोड़ा टहल लिया जाये । अब इस उम्र में एक जगह पर खड़े - खड़े हाथ पैर भी तो अकड़ जाते हैं । लाठी पकड़े टहलने को उद्द्यत हुए ही थे कि किसी को आते देख ठिठक कर अपनी मूर्तिवाली पुरावस्था में पहुँचने ही वाले थे कि किलक पड़े ,"अरे शास्त्री तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? " शास्त्री जी ," क्या करूँ बापू मेरे लिये बहुत कम चबूतरे रखे सबने... 

निवेदिता श्रीवास्तव, झरोख़ा 

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पौधारोपण कर मनाई गई  गांधी एवं शास्त्री जयंती 

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बन्द बलबीर बहुत खुश था .आज पलभर में ही टेम्पो ठसाठस भर गया . और दिनों उसे इन्तजार करना पड़ता था . कई बार तो एक दो सवारियों को लेकर ही बाड़े तक चक्कर लगाना पड़ता है . कितने ही साथी टेम्पोवाले सवारियों को ले जाते हैं पर आज तो चार चक्कर ही उसे दिनभर की कमाई दे जाएंगे . मालिक को हिसाब देकर भी इतने रुपए बच जाएंगे कि आज राशन और बढ़िया मनपसन्द खरीद लेगा .सब्जी .बच्चों की पनीर की सब्जी खाने की बहुत दिनों की माँग भी पूरी कर दूँगा . पर जैसे ही टेम्पो स्टार्ट किया कि कुछ लोग नारे लगाते हुए आए और बलवीर को खींचकर सीट से उठाकर बाहर निकाला . “क्यों बे !देख नही रहा कि सड़क पर कोई टेम्पो ऑटो नहीं दिख... 

गिरिजा कुलश्रेष्ठ, Yeh Mera Jahaan 

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बदलो ये हवा! 

जब शब्दों की जगह आँसू  उभर आते हों तो कोई कविता या लेख लिखना मुश्किल हो जाता है।  कहने को बहुत कुछ है मगर सही शब्दों का चुनाव ही नहीं हो पा रहा है।  बलात्कार या फिर कहूं की बलात्कारों की न ख़त्म होने वाली दर्दनाक दास्तान बन गया है हिंदुस्तान! आप जितना चाहें योगी अजय बिष्ट को कलंक कहें, सच तो यह है की हम सब इस कलंक में भागीदारी हैं। हाथरस की मनीषा वाल्मीकि ना ही सिर्फ एक लड़की थी, वो एक दलित भी थी और इस देश में ना जाने कितनी अल्पसंख्यक लड़कियों ने मनीषा की सच्चाई को जिया है और आगे जिएँगी! जब-जब जिसका राजनीतिक  मतलब होगा, तब-तब वो लोग आवाज़ उठाएंगे! बहुत ही थोड़े लोग मनीषा और उसके परिवार के न्याय के लिए कैमरे जाने चले जाने के बाद भी डटे रहेंगे!  

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia),  

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वैदिक वांगमय और इतिहास बोध  (८) 

विश्वामित्र के बाद वशिष्ठ  राजा सुदास के पुरोहित बन गए थे। इस समय अभी राजा सुदास अपने विजय अभियान की मध्य अवस्था में ही थे। वशिष्ठ  के द्वारा रचित सातवें मंडल में पंजाब के पूर्वी क्षेत्र  की तीसरी और चौथी नदियों का ज़िक्र पहली बार आया है। ये नदियाँ 'परश्नि (आज की रावी)' और 'असिक्नी ( आज की चेनाब)' हैं। 'सतुद्री' और 'विपास' के बाद इनका विवरण आया है। 'परश्नि' और और 'असिक्नी' को छोड़कर सरस्वती के पश्चिम स्थित अन्य किसी भौगोलिक चरित्र का नाम इस मंडल में कहीं नहीं आया है। यह प्रसंग दसराज्ञ-युद्ध या दस राजाओं के युद्ध का है... 

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मुक्तक , बलात्कार आज समाज में फैली महामारी है 

 आथी रात को परिवार की मर्जी के बीना बेटी की लाश जलाने को लेकर पुलिस कि भुमिका संदेह के घेरे में है | मेरी यही मांग और प्रार्थना माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से है जिसे मैने इन चार लाइनों में लिखा है

हर पीडित बेटी के साथ इंसाफ होना चाहिए 

योगी तेरे राज से ये आगाज होना चाहिए 

बलात्कार आज समाज में फैली महामारी है  

इस महामारी का जड़ से इलाज होना चाहिए  

Harinarayan Tanha, साहित्यमठ  

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गाँव की लड़कियों में भी अजीब चलन का दौर है। 

सुनहरी यादें दिल में बसर कर जाती हैं, 
महबूब शायराना हो तो शायरी असर कर जाती है, 
गाँव की लड़कियों में अजीब चलन का दौर है, 
पानी भरने भी वो खूब  सँवर कर जाती हैं। 

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बापू हमारे  (बापू पर 10 हाइकु) 

1.

एक सिपाही   

अंग्रेजों पर भारी,   

मिला स्वराज।


2.

देश की शान   

जन-जन के प्यारे   

बापू हमारे।

डॉ. जेन्नी शबनम, लम्हों का सफ़र  

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अमृतसर की यात्रा - भाग 15 

दर्शन कौर धनोय, मेरे अरमान.. मेरे सपने.. 

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मसीहा का पता 

शांतनु सान्याल, अग्निशिखा 

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धरती से क्या सीखते हैं पेड़ 

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नियम ढूँढना आपका काम है  

बेवफाई  तेरी  का  ये  अंजाम  है 
गूँजता महफ़िलों में, मेरा नाम है । 
क्या मिला पूछते हो, सुनो तुम जरा 
इश्क़ का अश्क़ औ' दर्द ईनाम है । 

दिलबागसिंह विर्क, Sahitya Surbhi  

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पागल कहते हैं लोग  

वो माँगता फिर रहा है 

औरों के लिए दुआ 

न जाने क्यों उसे 

पागल कहते हैं लोग। 

Ravindra Singh Yadav, हिन्दी-आभा*भारत 

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गलत को गलत कहने से पहले,  जात पात पर मरना छोड़ो_ 

लाशों पर राजनीति करने वालों,
 कुछ तो शर्म करना सीखो
किसी को भला बुरा कहने वालों,
मानवता निभाना सीखो।
मोमबत्तियां जलाने से पहले, 
भेदभाव जलाना सीखो।। 

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 हाथरस केस का वो 

”ग्रे” फैक्टर जो आधे अधूरे सच पर गढ़ा गया

समाज में कानून का राज होना चाह‍िए… मगर यहां कानून की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं…दल‍ितों को सताया जा रहा है… दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ गई हैं… बेट‍ियां सुरक्ष‍ित नहीं हैं… फलां नेता के शासन में ‘जंगल राज’ है…. फ‍िलहाल हाथरस मामले में ऐसा ही कुछ सुनने को मिल रहा है मगर कभी सोचा है क‍ि ऐसा क्यों है।
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क्या उस सनकी आदमी को सजा नहीं मिलनी चाहिए थी जिसने सिर्फ अपनी खब्त के कारण बेवजह लोगों को परेशान किया ? क्या कोर्ट में बेबुनियाद, काल्पनिक, सच्चाई से कोसों दूर के मामलों पर मुकदमा दायर किया जा सकता है ? क्या किसी भी मुकदमे को बिना देखे-सुने, जांचे-परखे, बिना उसकी अहमियत जाने दाखिल कर लिया जाता है 
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दरवाजे पर कुंडी लटकी
लगे दुकानों पर ताले।
काम छिना लाचार हुए सब
चले लिए पग में छाले।
मरें भूख से जीव तड़पते
एक शाप है निर्धनता।
पदचिह्न रक्त के राह बने
बढ़ी गली में निर्जनता।
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रात्रि के नौ बजने को हैं. जून होते तो कहते, अब दिन को विदा करो, लेट्स कॉल इट आ डे. वह पोर्ट ब्लेयर में हैं, रॉस आईलैंड देख लिया, सेलुलर जेल भी. कल कोलकाता आ जायेंगे और परसों घर. शाम को वह पुस्तकालय गयी और दो किताबें लायी, एक मध्यकालीन इतिहास पर और दूसरी जीन(डीएनए) पर. दोनों का कुछ अंश पढ़ा. वापसी में गुलाबी फूलों वाले पेड़ की तस्वीर खींची. जिसके यहाँ चम्पा का पेड़ है उस सखी के यहाँ भी गयी, उसने बताया, यहाँ जो सफाई करने आता है, उसे भूलने की बीमारी है, उसे अपना नाम भी याद नहीं है
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आज के लिए बस इतना ही....!

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11 comments:

  1. बहुत सुंदर चर्चा। मेरी रचना को स्थान देने के लिए धन्यवाद।

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  2. सुप्रभात
    आभार सहित धन्यवाद मेरी पोस्ट स्वीकार करने के लिए |

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  3. हमेशा की तरह साहित्य के विविध रंगों में रंगा हुआ चर्चा मंच मंत्रमुग्ध करता है, मेरी रचना को जगह देने हेतु हार्दिक आभार, सभी रचनाएं अपने आप में है बेमिशाल - - नमन सह।

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  4. 'खाली प्याला' शामिल करने के लिए धन्यवाद.

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  5. इस अंक की भूमिका बड़ी अच्छी लिखी है. सटीक.

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  6. सशक्त प्रभावी भूमिका के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति । अनुजा अनीता की पुस्तक "अहसास के गुंचे" की आ. दिलबाग सिंह जी बहुत सुन्दर समीक्षा ।

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  7. बहुत ही सुंदर भूमिका के साथ बेहतरीन संकलन।एहसास के गुँचे की समीक्षा को स्थान देने हेतु सादर आभार।

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  8. बहुत सुंदर प्रस्तुति,मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।

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  9. सार्थक भूमिका और पठनीय लिंक्स का चयन, आभार मुझे भी शामिल करने हेतु !

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  10. विद्वानों के बीच अपनी रचना देख कर बहुत ख़ुशी हुई। पूरे परिवार को नमन, श्रीराम रॉय

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  11. मनभावन पुष्पगुच्छ की तरह चर्चा प्रस्तुति

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