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Sunday, October 25, 2020

"विजयादशमी विजय का, है पावन त्यौहार" (चर्चा अंक- 3865)

विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। विजयादशमी पर्व है संकल्प का कि हम अपने अंतरतम में उपजी बुराइयों पर विजय प्राप्त कर सन्मार्ग पर अग्रसर हो सकें। 
देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी का पर्व अपनी-अपनी लोक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन रावण दहन भी किया जाता है, जो बुराई एवं अहंकार का प्रतीक है। विजयादशमी के दिन शस्त्रपूजा एवं शमी वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है। विजयादशमी के दिन देश के कुछ हिस्सों में अश्व-पूजन भी किया जाता है। 
विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष के समीप जाकर उसे प्रणाम करें। तत्पश्चात शमी वृक्ष की जड़ में गंगा जल/ नर्मदा जल/ शुद्ध जल का सिंचन करें। जल सिंचन के उपरांत शमी वृक्ष के सम्मुख दीपक प्रज्वलित करें। दीप प्रज्वलन के पश्चात शमी वृक्ष के नीचे कोई सांकेतिक शस्त्र रखें। तत्पश्चात शमी वृक्ष एवं शस्त्र का यथाशक्ति धूप, दीप, नैवेद्य, आरती से पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। पूजन के उपरांत हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करें-
'शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।'
-अर्थात हे शमी वृक्ष, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्रीराम को प्रिय हैं। जिस तरह श्रीराम ने आपकी पूजा की, हम भी करेंगे। हमारी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर करके उसे सुखमय बना दीजिए।
-प्रार्थना उपरांत यदि आपको शमी वृक्ष के समीप शमी वृक्ष की कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उन्हें आशीर्वादस्वरूप ग्रहण कर लाल वस्त्र में लपेटकर सदैव अपने पास रखें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपको शमी वृक्ष से स्वयमेव गिरी पत्तियां ही एकत्र करना है तथा शमी वृक्ष से पत्तियां तोड़नी नहीं हैं। इस प्रयोग से आप शत्रुबाधा से मुक्त एवं शत्रु पराभव करने में सफल होंगे।
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मित्रों! 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
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विजयादशमी,  "दोहे-गौरव का आभास"  
मन का रावण मारना, है उत्तम उपहार।
विजयादशमी विजय का, है पावन त्यौहार।१।
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जो दुष्टों के दलन का, करता काम तमाम।
उसका ही होता सदा, जग में ऊँचा नाम।२।
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मानवीयता का रखा, दुनिया में आधार।
इसीलिए तो राम की, होती जय-जयकार।३।
उच्चारण  
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बच न जाय रावण 
दूर मैदान में खड़ा 
अट्टहास कर रहा है रावण,
मुझे डर है 
कि इस बार दशहरे में 
कहीं वह बच न जाय. 
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दिलबागसिंह विर्क, Sahitya Surbhi  
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उदयभास्कर जी…  आंकड़े ज़मीनी हक़ीकत बयां नहीं करते 
आज के समाचार पत्र में ''सोसायटी फॉर पॉल‍िसी स्टडीज''  के न‍िदेशक 'सी. उदय भास्करका एक लेख पढ़ा, जो क‍ि दुष्कर्म और मह‍िलाओं की स्थ‍ित‍ि पर ' समाज की ज‍िम्मेदारी' पर ल‍िखा  गया था, उन्होंने हाथरस के ज‍िस केस से शुरुआत की, वह बेहद हवा हवाई था, क्योंक‍ि इस केस से संबंध‍ित जांच एंजेंस‍ियों की अभी तक की प्रगति, राजनीत‍िक कुप्रचार और ग्रामीणों के हवाले से जो बातें छन कर आ रही हैं, वे सभी  जानकारी पूरे मीड‍िया में उपस्थ‍ित है परंतु उदयभास्कर जी ने इसे भी रटे रटाये अंदाज़ में प‍िछले एक दशक के आंकड़े पेश करते हुए मात्र ''दल‍ित उत्पीड़न और मह‍िलाओं पर अत्याचार''  के संदर्भ में देखा । जबक‍ि आज के संदर्भ में  पूरा का पूरा केस ही एकदम अलग एंग‍िल लेकर सामने आ रहा है...तमाम संदेह और सुबूत इशारा करते हैं क‍ि केस जो प्रचार‍ित क‍िया गया... वैसा है नहीं और इसे मैं पहले भी ल‍िख चुकी हूं। 
Alaknanda Singh, अब छोड़ो भी  
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 नवरात्रि उत्सव के प्रथम तीन दिन मां दुर्गा को, मध्य के तीन दिवस माँ लक्ष्मी को तथा अंतिम तीन दिवस सरस्वती मां को समर्पित हैं. साधक को पहले शक्ति की आराधना द्वारा तन, मन व आत्मा में बल का संचय करना है, इसके लिए ही योग साधना व प्राणायाम द्वारा चक्र भेदन किया जाता है जिससे शक्ति प्राप्त हो
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व्यक्त वही अव्यक्त हो सके 

हे वाग्देवी ! जगत जननी  

वाणी में मधुरिम रस भर दो, 

जीवन की शुभ पावनता का 

शब्दों से भी परिचय कर दो !

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पुनर्संग्रह  
सभी चिल्लर ख़्वाब, सीने
के गुल्लक में, है बाक़ी
अभी तक अधूरी
प्यास, कुछ
उम्मीद,
उम्र
के साथ, बढ़ा जाते हैं कुछ अधिक ही  
मिठास। 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा 
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चौकस 
"बस! बस श्रीमती सान्याल। आपकी कथा से मेरे भी ज्ञानचक्षु खुल गए.. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। मैं भी अपनी नतनी को नहीं जाने दूँगी..।" इतना कहते हुए श्रीमती मैत्रा तत्परता से अपने घर जाने के लिए निकल गयीं। 
विभा रानी श्रीवास्तव, "सोच का सृजन" 
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वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध -- (११) 

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - ( ज  )

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन) 

आज के ज़माने में वर्तमान सभी भारोपीय भाषा समुदायों में मात्र यूरोपीय बोलियाँ ही ऐसी हैं जिनके अपनी ऐतिहासिक बसावट की ज़मीन ( अधिकांशतः यूरोप में ही) में पहुँचने की यात्रा के पुरातात्त्विक साक्ष्य मौजूद हैं। जैसा कि विन का कहना है,  “एक  ‘साझे यूरोपीय क्षितिज’ का विकास ३००० ईसापूर्व के बाद ही होता है। यह तक़रीबन पिट ग्रेव संस्कृति के विस्तार का समय था (कुरगन संस्कृति का तीसरा चरण)। चीनी-मिट्टी से बने पदार्थों के ख़ास शिल्प के आधार पर इसे सामान्यतः कौरडेड वेयर होरिज़ोन  कहते हैं। इस संस्कृति के भिन्न-भिन्न स्वरूपों  के मध्य, पूर्वी एवं उत्तरी यूरोप में फैलने  से उत्पन्न परिदृश्य को ही आद्य-भारोपीय भाषा और संस्कृति के आस्तित्व में आने के  के कारण के रूप में  व्याखायित किया गया है। जिस भूभाग में कौरडेड वेयर या  बैटल ऐक्स संस्कृति का विस्तार हुआ, भौगोलिक रूप से उसी की कोख से पश्चिमी या यूरोपीय  भाषा-शाखाओं, जर्मन, बाल्टिक, स्लावी, सेल्टिक और इटालिक भाषाओं का जन्म हुआ (विन १९९५:३४३, ३४९-३५०)।“ 

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एक गाँव, अफसरों वाला 
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद डिवीज़न के प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 24 किमी दूर दो नदियों, सई और लोनी, के बीच बसे इस गाँव का नाम बहुचरा है। दिखने में मोटे तौर पर यह भी प्रदेश के दूसरे गाँवों जैसा ही एक आम सा गाँव है, पर जो बात इसे दूसरों से अलग करती है वह है यहां की उपज ! यहां खेती तो नाम मात्र की होती है, पर होनहार बच्चों के लिए इस गाँव की जमीन खूब उपजाऊ है।  
गगन शर्मा, कुछ अलग सा, कुछ अलग सा  
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फोटो निबन्ध:  एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे 
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे क़ैसर-उल जाफ़री का यह शेर राकेश शर्मा पर एकदम फिट बैठता है। अपनी घुमक्कड़ियों के दौरान राकेश कई ऐसी खूबसूरत शामें अपने कैमरे के माध्यम से चुरा कर ले आते हैं कि देखने वाले के मुँह से वाह अपने आप निकल पड़ती है।राकेश भाई को मैं जितना जानता हूँ उसके हिसाब से कह सकता हूँ कि उन्हें घुम्म्कड़ी में जिस चीज का शौक सबसे ज्यादा है वो... 
विकास नैनवाल 'अंजान', दुई बात 
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एक टुकड़ा मन 
पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा,  
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आज की चर्चा में बस इतना ही...।
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10 comments:

  1. विजयोत्सव की हार्दिक बधाई व वंदन के संग
    हार्दिक आभार आपका

    संग्रहणीय संकलन

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  2. सुन्दर चर्चा.मेरी कविता शामिल करने के लिए शुक्रिया.

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय, विजयादशमी दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐

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  4. विजयादशमी के पर्व की बधाई और शुभकामनाएं ! सार्थक भूमिका और सुंदर चर्चा, आभार !

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  5. विजयादशमी की सभी को असंख्य शुभकामनाएं - - अध्यात्म के साथ जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता आकर्षक अंक मुग्ध करता है, मुझे शामिल करने हेतु हार्दिक आभार - - नमन सह।

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  6. सुन्दर सार्थक भूमिका के साथ सदैव की भांति श्रमसाध्य और बहुत सुन्दर सूत्रों से सजी प्रस्तुति ।

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  7. प्रणाम शास्त्री जी, व‍िजयादशमी की हार्द‍िक शुभकामनाओं के साथ आपका बहुत बहुत आभार क‍ि चर्चामंच के इस संकलन में मुझे भी स्थान द‍िया। शमी वृक्ष का पूजन व महत्व हमारे ल‍िए आज का उपहार रहा। धन्यवाद

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  8. आदरणीय भाई साहब
    सादर नमस्ते ।साहित्यिक मुरादाबाद में प्रस्तुत रचनाओं को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत आभार ।

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  9. विजयोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ

    उत्कृष्ट रचनाओं के लिए बधाई

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  10. विजय दशमी की हार्दिक बधाई। सुन्दर, सुरुचिपूर्ण लिंक्स का संकलन। मेरी रचना को इस चर्चा में शामिल करने के लिए आभार।

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