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Saturday, October 17, 2020

'नागफनी के फूल' (चर्चा अंक-3857)

शीर्षक पंक्ति : आदरणीय   जी 

सादर अभिवादन। 

शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

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नागफनी प्रकृति के सौंदर्य की अनूठी मिसाल है।मरुभूमि में तूफ़ानों का मुक़ाबला करती हुई नागफनी जीवन का ख़ूबसूरत संदेश देती है।भावी जीवन की दुश्वारियों से जूझने के लिए जल का संचय करने के लिए नागफनी किस तरह अपने आप को परिस्थियों के अनुकूल बनाती है यह समझना बेहद ज़रूरी है।
नागफनी के रंगीन पुष्प निर्जन रेगिस्तान में जीवन के खिलखिलाने की सार्थक कहानी कहते हैं। नागफनी के फूल जीवन संघर्ष की बेमिसाल इबारत लिखते हैं।

आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

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        हिन्दी साहित्य में दोहा छन्द का अपना गौरवशाली इतिहास है। सन्तों की वाणी से निकले संदेश आज भी सतत रूप से लोक में व्याप्त हैं और उनका माध्यम दोहा छंद ही बना है। दोहा अर्द्ध सम मात्रिक छन्द हैजिसमें तेरह-ग्यारहतेरह-ग्यारह अर्थात एक दोहे में 48 मात्रओं वाले इस छोटे से छंद की शक्ति मर्म को छूने तथा लक्ष्य भेदन में पूर्ण रूप से सफल होती है। क्योंकि एक दोहे में सीमित शब्दों में पूरी बात कहना कवि का धर्म होता है अगर एक बात एक दोहे में पूरी नहीं हुई तो फिर वह दोहा दोहे के रूप में स्थापित नहीं हो सकता।

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जंगली परिजात* लुईस ग्लूक

जहाँ ख़त्म होते थे मेरे दुःख 
उसके आगे था एक दरवाजा 


तुम्हे बता दूँ कि  जिसे तुम मृत्यु कहते हो 
उसे मैं सदैव याद रखती हूँ ।  

बाहर का अनन्य शोर , देवदार की झूलती शाखाएं 
निढाल ढलता सूरज समा रहा है 
बंजर धरती के आगोश में । 
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आस्था का चेहरा

आस्था का चेहराजिसको हम तमाम उम्र देखते, सुनते और ढोते तो हैं लेकिन आस्था शब्द के दो साबुत और एक आधे अक्षर के मतलब को समझ तक नहीं पाते। मन में रह-रहकर सवाल उठता है कि आस्था का चेहरा क्या इससे भी सुंदर हो सकता है? या यही अल्टीमेट है। आस्था शब्द का जन्म किन परिस्थियों में हुआ होगा? क्या हमारे भीतर आस्था के बीज गढ़े होते हैं ? या इसको बोया जाता है ? यदि बोया जाता है तो क्या बोने वालों का मन भी सुंदरता का मतलब जानता होगा क्या जितनी आस्था वह हमें सिखा रहा है, उतनी उसने भी अपने जीवन में की होगी? आख़िर आस्था क्यों की जाती है किसी पर? क्याया आस्था का भी शरीर होता है? क्यों की जानी चाहिए?

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वक्त बीतता गया

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जीतता गया 
कुछ भीतर रीतता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जोड़ता गया
कुछ पीछे छोड़ता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जुटाता गया 
कुछ यूं ही लुटाता गया 

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आ रहे हैं वो

 लब-ए-शाम पे मुस्कुराहट है
 आ रहे हैं वो,
धड़कनों में थरथराहट ह
 आ रहे हैं वो।
वही खुशबु लिए आगोश में
सबा रक्स करती आ गयी
शजरे अँगनाई में सरसराहट 
   आ रहे हैं वो।

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भारत रत्न !...ताकि अहमियत बनी रहे

भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में की गई थी। इसके लिए चयनित व्यक्ति विशेष का चयन ज्यादातर सर्वमान्य रहा, पर कुछेक बार अनुत्तरित प्रश्न भी खड़े हुए, इसकी चयनित शख्सियत को ले कर ! इधर भी एक चलन कुछ ज्यादा ही देखने में आने लगा है, कोई भी अपनी जाति-बिरादरी, धर्म-पंथ के नेता के लिए इसकी मांग उठाने लग पड़ा है ! यदि इसकी रेवड़ी बंटने लगी तो फिर भविष्य में इसकी महत्ता का सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है !  

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समदर्शी

ना चाह ना किसी की आस की
जब देखा आसपास बड़ी निराशा हुई
मन पर गिरी गाज जब भी
 पंख फैला उड़ना चाहा |
चेहरा बुझा बुझा सा हुआ
अरमानों का निकला जनाजा
आशा निराशा  में बदली
किसी खोज का अंत न हुआ |

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सरोकार मानवीय संवेदनाओं से

 हो सके  जितना भी तुझसे उम्र भर उपकार कर,
  बाँट  कर  दुख-दर्द  बंदे  हर किसी से प्यार कर।
  नफ़रतों   की  चोट  से   इंसानियत  घायल   हुई
  ज़िंदगी  इसकी   बचे   ऐसा  कोई  उपचार  कर।
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प्रार्थना शायद हमें 
 थोड़ा सा सुकून देती है !
किंतु,
जिन तथ्यों को जैसी है वैसी ही 
स्वीकार करने की बजाय 
उन तथ्यों से,अपने आप से 
   क्या हम 
पलायन नहीं करते ?
--

पेंशन

माँ आज सुबह-सुबह तैयार हो गई सत्संग है क्या..?मीना ने पूछा तो सरला बोली; "ना बेटा सत्संग तो नहीं है वो कल रात जब तुम सब सो गये थे न तब मनीष का फोन आया था मेरे मोबाइल पर,   बड़ा पछता रहा था बेचारा, माफी भी मांग रहा था अपनी गलती की...
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धूर्त फ़िल्मकार

धूर्त फ़िल्मकार  
संवेदनशील बिषयों पर 
फ़िल्म बनाते हैं 
जनता की जेब से 
पैसा निकालते हैं 
भोली-भाली जनता को 
ठगने के लिए 
किराये के गुंडों 
सरकारी तंत्र 
और मीडिया का 
चालाकी से 
इस्तेमाल करते हैं 
--
कल तक
रोटी कपडे़
के लिये 
मोहताज
हाथों में

दिखने 
लगी हैं
चमकती 
चूड़ियां

जुल्फें 
संवरी हुवी

होंठो पे
लाली भी है
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 
@अनीता सैनी 'दीप्ति' 
--

11 comments:

  1. आपका प्रयास अति उत्तमहै।रचनाओं को एक दूसरे तक पँहुचाने के लिए चर्चामंच का कार्य उल्लेखनीय है

    ReplyDelete
  2. शुभ प्रभात,
    बहुत सुंदर प्रस्तुति, सभी सुंदर लिंक्स दिए है जिसमें मुझे शामिल करने के लिए
    दिल से आभारी हूँ !

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद मेरी रचना को स्थान देने के लिए |

    ReplyDelete
  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  5. मेरी रचना को स्थान देने के लिए शुक्रिया

    ReplyDelete
  6. उपयोगी और पठनीय लिंकों से साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार अनीता सैनी जी।

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  7. आदरणीया अनीता जी सार्थक चर्चा हेतु आभार🙏

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  8. बहुत सुन्दर चर्चा।

    ReplyDelete
  9. बहुत सुन्दर श्रमसाध्य सराहनीय चर्चा प्रस्तुति। सभी लिंक बेहद उम्दा।
    मेरी रचना कौ चर्चा मे सम्मिलित करने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे ब्लॉग को यहां सम्मिलित करने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद ।

    ReplyDelete

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