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Tuesday, October 13, 2020

"अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर एक मां की हुंकार....."(चर्चा अंक 3853 )

स्नेहिल अभिवादन 
आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय उर्मिला सिँह जी की रचना से )

"माँ हूँ ,कमजोर तुझे ना बनने दूँगी..
 जमाने पर अब बलि ना चढ़ने दूँगी..
 बहुत सुनी बातें सबकी-अब और नही,
 तेरी बाहों में मैं काली की शक्ति दूंगी !!"
--
बेटियों को आपने संस्कारों के साथ-साथ अपनी 
मान-मर्यादा, आत्मसमान और लाज की रक्षा 
करना भी सीखना ही होगा...
--
आईये, आज की चर्चा की शुरुआत करते हैं... 
एक संकल्प के साथ  
"अब बेटियों को कमजोर नहीं बनने देना है "
"बेटियाँ  हमारा मान, हमारा स्वाभिमान"
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आलेख 
"ब्लॉगिंग एक नशा नहीं आदत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आदत है तो कुछ गलत नहीं होगा। लोग भाँति-भाँति आदतो से ग्रस्त  

प्यारी प्यारी लगती छवि तुम्हारी ..फूलों से  भी नाजुक कली हमारी....इस निर्मम जग में तेरा सम्मान नही,हाँथों  में जब तक तेरे तलवार नही !!--------------बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं  बकवास करने का मौसम आ जाता है
शामिल
हो लिया है
आदतों में सुबह की
एक प्याली
जरूरी चाय की तरह

फिर भी
इधर कुछ दिनों
कागजों में बह रही
इधर उधर फैली हुई
बहुत कुछ
की
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ऐन्द्रजालिक की भाँति छाया रहता है
घर के कोने-कोने में माया का ओढ़े गुमान।
माया महकती है सदृश्य हर पहर  
हरशृंगार के पावन पुष्प के समान
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मुनाजात-ए-बेवा  (एक विधवा की विनती)
दीर्घ काल से विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाना भारतीय इतिहास का एक कलंकपूर्ण अध्याय है. सती प्रथा को एक विधवा का धार्मिक कर्तव्य माना जाना तो पुरुष-प्रधान समाज की पाशविकता का सबसे बड़ा प्रमाण है. 
ब्रिटिश शासन में स्त्री-जीवन से जुड़ी हमारी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के उन्मूलन के अनेक प्रयास किए गए. 
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"क्या आपको अपने लिए डर नहीं लगा ?"
"क्या हमें एक पल भी डरने की अनुमति है?"
प्रसव पीड़ा से जूझती गर्भवती रूबी अपने लिए लेबर रूम में 
 प्रतिक्षारत रहती है तभी उसे पता चलता है कि 
एक और स्त्री प्रसव पीड़ा से परेशान है।

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दूरियाँ

दूरियाँ दिल में बढ़ी है
रोज बढ़ते फासलों से।
बेवजह लिपटे रहे हम
झूठ के ही आँचलों से।
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यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा

काम  जाएँ कब ये क्या जानें
आंसुओं को बचाए रखिएगा 
शक्ल उनकी दिखेगी बादल में
यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा
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तेरे लब पर कोई सवाल क्यों नहीं

सूरज की तपिश से तन तापने वाले।
घर का चूल्हा धीरे-धीरे बुझा रहा।
मन के भीतर क्यों कोई विचार नहीं आता ?
सर से छत,रोटी और पढाई सब उठ गए।
तेरे लब पर कोई सवाल क्यों नहीं आता ?
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जीवित दहन - - (राष्ट्रीय बालिका दिवस के उपलक्ष में )
गर्भ से मृत्यु तक, उसे सिर्फ़ है लड़ना
अस्तित्व बचाने के लिए नहीं,
बल्कि सारी पृथ्वी को
ख़ूबसूरत बनाने
के लिए,
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        प्रियतमे, तब अचानक, याद आती है तुम्हारी।
       अनन्त  में  श्यामवर्ण जब  करते  घटाटोप गर्जन,
       अमा-निशा के तमस में जब होता विद्युत-स्पंदन,    
        प्रकाश भय-विक्षिप्त हो क्षितिज में जा छिपता है,               
       विरही नभ के अश्रुओं से जब भीगती वसुधा सारी।
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एक ही तो बात है 

एक ही तो राज है, 

एक को ही साधना 

एक से दिल बाँधना !


एक ही आनंद है 

वही जीवन छंद है, 

बह रहा मकरंद है 

मदिर कोई गंध है !


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एक मुट्ठी धूप है
तो क्या हुआ?
हार जाएंगे अंधेरे
आस्था ने मंदिरों की
सीढ़ियां चढ़ जान दी
पर कुछ न पाया

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आज का सफर यही तक
आप सभी स्वस्थ रहें ,सुरक्षित रहें।
कामिनी सिन्हा

12 comments:

  1. अशेष शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका

    सराहनीय प्रस्तुति हेतु साधुवाद

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  2. पठनीय सूत्रों के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीया कामिनी सिन्हा जी।

    ReplyDelete
  3. पढ़ने के लिए ढेर सामग्री, पठनीय रचनाओं से सजा चर्चा मंच ! आभार !

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति हमारी रचना को शामिल करने के लिए धन्यवाद आपका।

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  5. बहुत सार्थक रचनाओं के साथ सुन्दर प्रस्तुति, मेरी रचना को शामिल करने हेतु हार्दिक आभार - - नमन सह।

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  6. बहुत ही सुंदर सराहनीय प्रस्तुति आदरणीय कामिनी दी मेरे सृजन को स्थान देने हेतु दिल से आभार।

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  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार कामिनी जी।

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  8. आप सभी स्नेहीजनों को तहेदिल से शुक्रिया एवं सादर नमस्कार

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  9. सभी रचनाएँ दिल को छूने वाली हैं। इस संदर प्रस्तुति के लिए बधाई! मेरी कविता को यहाँ स्थान देकर सम्मान देने के लिए कामिनी जी का हार्दिक आभार!

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