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Sunday, December 06, 2020

"उलूक बेवकूफ नहीं है" (चर्चा अंक- 3907)

 मित्रों!
रविवार की चर्चा में देखिए, 
मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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28 साल पहले 6 दिसंबर यानी आज ही के दिन कारसेवकों ने अयोध्या का बाबरी ढांचा गिरा दिया गया था। बीजेपी और संघ परिवार इसे 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाते हैं। 

 लेकिन इस घटना पर भगवान श्रीराम क्या सोचते होंगे? 

यह सोचा, मशहूर शायर कैफी आजमी ने 

और तब निकली यह नज्म, 

जो बाद में इस घटना पर लिखी गई सबसे लोकप्रिय रचनाओं में शुमार हो गई. 

आप भी पढ़िए 'राम का दूसरा वनवास'.

राम बनवास से जब लौटकर घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए

धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन
घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए

पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आए वहां ख़ून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे

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बालकविता  "जय विजय-अच्छे-अच्छे काम करूँ"  
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।। 
उच्चारण  
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तेरा लिखा जरा सा भी समझ में नहीं आता है कह लेने में क्या जाता है? 
शिकायत है
कि समझ में नहीं आता है

‘उलूक’
पता नहीं क्या लिखता है क्या फैलाता है 

प्रश्न है
किसलिये पढ़ा जाता है वो सब कुछ
जो समझ में नहीं आता है  
सुशील कुमार जोशी, उलूक टाइम्स  
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"मन" 

सारा का सारा

आसमान...

कब और किसको 

मिला है..

यह मन ही 

पागल है...

मिठास की चाह भी 

रखता है..

और वह भी

 खारी सांभर से...

Meena Bhardwaj, मंथन 
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मेरी पहली रेल-यात्रा 

मैंने अपना होश संभालने से पहले दो-तीन बार ट्रेन में सफ़र किया होगा लेकिन अपने होश में, 5 साल की उम्र में, मेरी पहली रेल-यात्रा जून, 1956 में हुई थी.

पिताजी का ट्रांसफ़र बिजनौर से लखनऊ हो गया था.
लखनऊ जाने के लिए हम लोगों को ट्रेन से अपनी यात्रा संपन्न करनी थी.
हमारे परिवार के अन्य सदस्यों के लिए रेल-यात्रा का यह पहला अनुभव नहीं होता लेकिन मेरे होश संभालने के बाद, मेरी पहली रेल-यात्रा होने की वजह से यह मेरे लिए एक ऐतिहासिक महत्व की घटना होने वाली थी.
गोपेश मोहन जैसवाल, तिरछी नज़र  
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आज का उद्धर

विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल  
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कहां हो साहेबराव फडतरे? 
कहां हो साहेबराव फडतरे? कैसे हो? उम्मीद नहीं पक्का भरोसा है कि अब तक बंदीगृह से मुक्त हो गए होगे और लगभग पचपन साल का प्रौढ़ जीवन एक बार फिर से  पटरी  पर लौट आया होगा - चाहे अध्यात्म के रास्ते पर...या गृहस्थी के रास्ते पर।भारत भ्रमण के अपने सपने को पूरा करते हुए यदि कभी इधर पटना या बिहार का कार्यक्रम बनाओ तो तुम्हें अपने घर आमंत्रित करना मुझे बहुत अच्छा लगेगा।

(पच्चीस साल पुरानी बात है मैंने किसी अंग्रेजी अखबार या पत्रिका में(अब नाम याद नहीं) पुणे के येरवडा जेल के कैदी कवियों की कविताएं अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ी थीं। उस पढ़ कर मैंने जेल के प्रमुख को उन कवियों की कविताओं के हिंदी अनुवाद करने की इच्छा के साथ एक अनुरोध पत्र लिखा था जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
विजय गौड़, लिखो यहां वहां  
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ढलते सूरज ने भी देखा 
आज संध्या समय
जो बाला दिया, 
बहुत देर तक
जलता रहा ।

अकंपित लौ
तम के भाल पर 
तिलक समान
शोभायमान । 
नूपुरं, नमस्ते namaste  
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नैतिक चरित्र 
 छलावरण की
इस दुनिया में चेहरों को
पढ़ना, इतना भी
आसान
नहीं,
हर तरफ़ हैं बिखरे हुए कितने ही
अदृश्य नागपाश, 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा :  
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मुझे पहचानते नहीं हैं वो  
कभी परछाईं से भी 
मुझे जान लेते थे वो 
मेरी पलकों के आंसू भी थाम लेते थे वो 
साथ है, मेरा उनका चालीस बरस का 
पर ऐसा लगता है, 
मुझे जानते नहीं है वो 
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हाईकू  (मौसम बदला ) 
बरखा गई
मौसम बदला है
ठण्ड आगई 
 
सूर्य किरण
गवाह है उसकी
रौशनी मंद  
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नई उमर की नई फसलों... 
नई उमर की नई फसलों ,जो बोओगे वही काटना होगा
उठो वीर जवानों क्रांति मशाल अब तुम्हे जलाना होगा।

      कुचक्र राजनीति का ,आज दुश्मन चला रहा
      अनीति द्वेष की आग में किसानों को जला रहा
      प्रपंच पाप रच के मति भ्रम देशद्रोही कर रहा
      सत्य की नींव हिले नही प्रयास सदा तुम्हारा होगा।। 
उर्मिला सिंह, सागर लहरें  
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डॉ बीना सिंह- राज की बात मैं आज बताती हूं  मेरे अंदर भी एक समंदर उछलता है_
कभी इधर तो   कभी    उधर बच्चों सा
नादान भोला भाला  मन मेरा मचलता है 
विचारों का  आना और यूं   चले जाना
 आवारा की तरह बेलगाम  बहे जाना
   ह्रदय मंजूषा में सहेज कर   रखा है
 तुम ही बता दो यह अच्छा है या बुरा है
 यादों के पगडंडी  पर मन    टहलता है 
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गोल्डन पगोडा 

प्रथम जब भर आतीं चुपचाप

मोतियों से आँखें नादान  आंकती तब आंसू का मोल तभी तो आ जाता यह ध्यान !
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एक ग़ज़ल :  तुम्हारे हुस्न से  

तुम्हारे हुस्न से जलतीं हैं ,कुछ हूरें  भी जन्नत  में ,

ये रश्क़-ए-माह-ए-कामिल है,फ़लक जलता अदावत में ।

तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर ?

ज़ियादा कम का मसला तो नहीं होता है उल्फ़त में । 

आनन्द पाठक, आपका ब्लॉग 
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  • फुर्सत के चंद लम्हे - 
  • "एक मुलाकात खुद से " 
  •      फुर्सत के चंद लम्हे जो मैं खुद के साथ बिता रही हूँ। घर से दूर,काम -धंधे,दोस्त - रिस्तेदारो से दूर,अकेली सिर्फ और सिर्फ मैं। हां,आस-पास  बहरी दुनिया है कुछ लड़के - लड़कियां  जो मस्ती में डूबे है,कुछ बुजुर्ग जो अपने पोते - पोतियो के साथ खेल रहे है,कुछ और लोग है जो शायद मेरी तरह बेकार है या किसी का इंतज़ार कर रहे है।  
  • कामिनी सिन्हा-मेरी नजर से 
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आज के लिए बस इतना ही...।
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15 comments:

  1. आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी,
    बहुत अच्छे लिंक्स का चयन करना हमेशा आपकी ख़ासियत रही है। आज भी आपने जो लिंक्स यहां प्रस्तुत किए हैं वे सभी सर्वोत्तम हैं। नमन आपको 🙏

    आपने मेरे गीत को चर्चा मंच में सम्मिलित कर जो सम्मान दिया है, उसके लिए मैं आपके प्रति हृदय से आभारी हूं।
    🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  2. उम्दा लिंक्स आज के चर्चामंच की |मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार सहित धन्यवाद
    सर |

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  3. बहुत सुंदर एवं सारगर्भित रचनाओं से सुसज्जित चर्चा मंच के इस अंक के लिए डॉ रूपचंद शास्त्री 'मयंक' जी को साधुवाद 🙏🌹🙏

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  4. विविधताओं से परिपूर्ण बहुत सुन्दर प्रस्तुति में मेरे सृजन को सम्मिलित करने हेतु सादर आभार सर.

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति।

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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  7. चर्चामंच पर इस बार काम‍िनी जी ने मोती की तरह चुन चुन कर पोस्ट सजाई हैं, बहुत धन्यवाद । इतनी खूबसूरत रचनायें पढ़वाने के ल‍िए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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  8. वाह ! बेहद खूबसूरत रचनाओं की खबर देते सूत्र ! आभार !

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  9. सभी रचनाएं अपने आप में अद्वितीय हैं, मुझे शामिल करने हेतु आभार, प्रस्तुति एवं संकलन अति सुन्दर।

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  10. शास्त्री जी,धन्यवाद । चर्चा में स्थान देने के लिए ।
    कैफ़ी आज़मी साहब की इस नज़्म को पढ़कर मन में आया ...
    जिस दिन बाबर सरीखों ने मंदिर ध्वस्त कर ऐसे ढांचे बनाए जिन्हें ख़ुद वो भी मस्जिद नहीं मानते, उस दिन राम का कौन सा वनवास हुआ था ? काश ये भी लिखा गया होता ।

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  11. आदरणीय शास्त्री जी, नमस्कार ! आपने मेरी रचना को शामिल किया, इसके लिए आपका आभार व्यक्त करती हूँ ,विविध प्रकार की रचना पढ़ने का अवसर मिला,जिससे मुझ जैसे नए लोगों का नए नए सूत्रों से परिचय होता है,जो नए मार्ग प्रशस्त करता है ,सुंदर संकलन और सुंदर प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएँ ..।

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  12. विविधता में एकता को प्रदर्शित करते इस मंच पर मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार माननीय।
    सादर।

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  13. बहुत खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

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