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Tuesday, December 08, 2020

"संयुक्त परिवार" (चर्चा अंक- 3909)

स्नेहिल  अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 
(शीर्षक आ. सुजाता प्रिया जी की रचना से)

"अम्मा ने आकर खबर सुनाई,भोजन है तैयार।
चलें साथ बैठकर खालें, हिल-मिल पूरा परिवार।"

"संयुक्त परिवार " ये शब्द सुनते ही आखों के आगे एक तस्वीर उभर आती है..
"एक भरे-पुरे परिवार से हँसता-खिलखिलाता आंगन"  
जो गुजरे ज़माने की बात हो गई... 
आज हर एक एकाकी है.. 
शायद, फिर से एक बार वो गुजरा हुआ ज़माना वापस आ जाए... 
इसी उम्मीद के साथ चलते हैं, 
आज की रचनाओं की ओर 
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 बालकविता "बच्चों की महिमा है न्यारी" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।
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बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।
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संयुक्त परिवार 


दादाजी खटिया बुन रहे हैं , नीम पेड़ के नीचे।

दादी माँ सहयोग में,रस्सियों को पकड़कर खींचे।

मंझली बूआ बैठ चरखे से , सूत कात रही है।
पाँव पर रख  फूफाजी की चिट्ठी बाँच रही है।
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सुदूर आत्म प्रदेश  

शीतकाल के अंत में, जब महुआ पेड़
के पल्लव विहीन टहनियों में
उभरते हैं पुष्प शंकु, उस
पतझर के मौसम
में अरण्य -
नदी

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कब जाने

जबसे दुनिया में आँख खुली

जन्म का मतलब भी न समझा

चाहतों के बोझ तले

दब गया जीवन का सपना

पल हरपल पल-पल भाग रहा

कुछ सोया सा कुछ जाग रहा

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किसान

धान ,गेहूँ,दलहन,तिलहन
कपास के फसलों के लिए
बीज की गुणवत्ता
उचित तापमान,पानी की माप
मिट्टी के प्रकार,खाद की मात्रा
निराई,गुड़ाई या कटाई का
सही समय
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समाज देख रहा

 जो हो रहा जैसा भी हो रहा

बिना सुने और अनुभव करे

निर्णय तक भी पहुँच रहा |

उसकी लाठी है बेआवाज

जब चलेगी हिला कर रख देगी

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डॉ शरद सिंह ने  'पिछले पन्ने की औरतें' उपन्यास में.... |  बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति |  

डा0 शरद सिंह ने पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास में चंदेरी (गुना) में लगने वाले बेड़नियों के मेले में ‘राई नृत्य’ का सुंदर चित्रण किया है-‘‘मशाल के इर्द-गिर्द पचासों दलों के रूप में सैकड़ों पुरुषों की भीड़ और उन दलों के मध्य पूरी सज-धज के साथ पचासों बेड़नियां...। 
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जो घर खाली दिख जाता है

एक-एक कर चुन डाले हैं 
राह के सारे पत्थर उसने, 
कंटक चुन-चुन फूल उगाये 
हरियाली दी पथ पर उसने ! 
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वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध  (१५) 

हालाँकि बाद के पौराणिक वृतांतों में उन्हें उत्तर का एक ऋषि बताया गया है जो चलकर दक्षिण में बस जाता है। किंतु, यह सर्वमान्य और ऐतिहासिक रुप से स्थापित तथ्य है कि अगस्त्य मूलतः दक्षिण के निवासी एक द्रविड़ ऋषि थे। वह और बाद में,  उनके वंशज, दक्षिण से चलकर उत्तर में बस गए और ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि-कूलों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वतंत्र ऋषि-परिवार की उन्होंने स्थापना की। 
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मित्रता (कविता) #friendship
मित्र बनाने के पहले विचारना
जरूरी है।
द्रोण और द्रुपद की गुरुकुल में मित्रता
कहाँ निभ पाई थी?
जब द्रोण गए थे,

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फॉर्मूला

सड़कें हमें कहीं नही पहुँचाती
हम सड़क पर चलते हैं और गलत जगह पहुँच जाते हैं।

दुःख भी हम तक चल कर नही आते
कुछ अलग होता है और हम दुःखी हो जाते हैं।

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आज का सफर यही तक 
आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें 
कामिनी सिन्हा 
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13 comments:

  1. बहुत सार्थक और श्रम से सजाई गयी चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी।

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  2. सुप्रभात
    शानदार लिंक्सआज की |मेरी रचना को भी शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद
    कामिनी जी |

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  3. श्रमसाध्य कार्य हेतु साधुवाद
    उम्दा संकलन

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  4. प्रिय कामिनी सिन्हा जी,
    बहुत अच्छे लिंक्स
    साधुवाद
    एवं
    हार्दिक शुभकामनाएं 🙏💐🙏

    शुभेच्छु,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  5. सही में श्रमसाध्य! अत्यंत आभार इतने सरस संकलन का!!!

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  6. कामिनी सिन्हा जी,
    मेरी पोस्ट को आपने चर्चा मंच में स्थान दिया, आपकी आभारी हूं 🙏
    चर्चा मंच में शामिल होना सदैव अत्यंत सुखद लगता है।
    आपका हार्दिक धन्यवाद 🌹🙏🌹
    - डॉ शरद सिंह

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  7. सभी लिंक्स की सामग्री रोचक,प्रेरक और बारम्बार पठनीय है। कामिनी जी, आपके इस श्रम के लिए आपको साधुवाद 🌹🙏🌹

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  8. एक से बढ़कर एक पठनीय रचनाओं के सूत्रों से सजा मंच, आभार !

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  9. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति। मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार कामिनी जी।

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  10. बहुत सुंदर चर्चा अंक कामिनी जी ! सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  11. सुगढ़ एवं सराहनीय प्रस्तुति प्रिय कामिनी जी।
    बेहतरीन रचनाओं से सजे संकलन में मेरी रचना शामिल करने के बहुत बहुत आभारी हूँ।
    सादर।

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  12. आप सभी स्नेहीजनों का हृदयतल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार

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  13. बहुत सुन्दर और सार्थक लिंक मिले पढ़ने के लिए।
    --

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