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Monday, December 14, 2020

'जल का स्रोत अपार कहाँ है' (चर्चा अंक 3915)

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

आइए पढ़ते हैं कुछ चुनिंदा ब्लॉग्स पर प्रकाशित रचनाएँ-

-- 

गीत-गंगा मइया 

"जल का स्रोत अपार कहाँ है"

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) 

 कलकल-छलछल, बहती अविरल, 

हिमगिरि के शिखरों से चलकर,

आनेवाली धार कहाँ है।

गंगा की वो धार कहाँ है।।

--
दर्पण जैसी निर्मल धारा,
जिसमें बहता नीर अपारा,
अर्पण-तर्पण करने वाली,
सरल-विरल चंचल-मतवाली,
पौधों में भरती हरियाली,
अमल-धवल आधार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
 

 मैं संभलकर खड़ी होने की कोशिश कर ही रही थी  

कि कानों में आवाज  गूंजी

--”ऐ …,जल्दी से आ जाओ! नाली यहाँ पर है।” 

और वे लगभग मेरे आसपास की जगह को फलांगती हुई आगे निकल गईं और अपने छीले हुए घुटने और हथेली के साथ लड़खड़ाती हुई‎  मैं अपने घर की ओर। बारिशों के दौर में सड़कों पर बहते पानी के वेग को देख कर अक्सर मैं उस घटना को  याद करती हूँ तो तय नही कर पाती उन औरतों के व्यवहार को मासूमियत का नाम दूँ या

 समझदारी का ।

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ज़ल...उर्मिला सिंह

आँगन में झांकती चाँदनी परीें को चंद्र खटोले से उतरने दो
खोल दो खिड़कियां ,दरीचों से भी ताजी हवा आने दो
 हँसते होठो पर भी नमी की बरसात हो जाने दो
अश्कों से बोझिल आंखों को हँसी का स्वाद चखने दो।।
-- 
यह भूल हुई कैसे  अनजाने में
समझ नहीं पाया
अब पश्च्याताप हो रहा है
यह मैंने क्या किया ?
-
 
हर बार पत्थरों को धकेलकर
जिधर राह मिलेबह जाती हूँ
शायद पानी बन चुकी हूँ
फिर अपनी प्यास से तड़पती क्यों हूँ?
--
टूटकर बिखर  जाऊं कहीं।
दिल की दिल को सुनाइये तो जरा।।
प्यासे ही रह गये जाकर मयखाने।
थोड़ी ही सही पिलाइये तो जरा।
--
पक्के मकान उग आए हैं
खुले मैदानों में,
गुम हैं वे ग़रीब से होटल
जिनमें चाय-समोसे बनते थे,
काठ और टीन के देवालय की जगह
अब भव्य मंदिर खड़ा है,
अंग्रेज़ी बोलते बच्चे अब
सर्र से निकल जाते हैं बगल से,
हाँवह स्कूल अब भी वही है,
जिसमें मैं पढ़ता था,
--
 Amrita Tanmay
सारी छूटी सखियाँ सब अब मुझेबहुत ही भाने लगी हैं 
हिल-मिल कर हिय-पिय की वो बतिया बतियाने लगी हैं
कैसे कहूं कि मेरी सारी समझ भरी भारी-भरकम बातों पे
सब मिल पेट पकड़-पकड़कर जोर-जोर से ठठाने लगी हैं
--
--
जिसपे रंगे थे मेरी आँखों के काजल 
और जुल्फों के मुस्कराते अल्फाज़ 

हँसी भी उकेरी थी तुमने एक दिन 
वो गुलाबी गालों के रेशमी अह्सास 
--
स्वार्थ-वश, होकर विवश,
कुछ भी बांचिए,
भले ही,
पर, देश को न बाँटिए!
--

आँगन में दीवार नहीं,सहकार की मंजी सज्जित हो

करने को याद अतीत बहुत हैं,अपनी वैर भुलाई जाये -
बिरवा विस्वास का सींचा जाये घाताघात का दंश हो,
लोड़ी ,ईद, बैसाखी, होली मिलकर साथ मनाई जाये - 
--

सब तरफकुछ

पल उसके
बग़ैर
लगते हैंकिसी अधूरे सफ़र -
की तरहकुछ लोग मिटा
कर भी दे जाते हैं,
बहुत कुछ
किसी
लौटते हुए परिश्रांत लहर की
तरह।

--

हिमालय पर वर्ण पिरामिड...कुसुम कोठारी 

मैं
मौन
अटल
अविचल
आधार धरा
धरा के आँचल
स्नेह बंधन पाया।
--
बचपन,यौवन,प्रौढ़,बुढ़ापा

तन के साथ-साथ

मन की भावनाओं का आलोड़न

महसूस तो होता है,

पर स्मृतियों में कैद पल

भींच लेते हैं सम्मोहन में

फिरउलझा मन लौटता है  

स्मृतियों के परों से वापस

असंतोष वर्तमान का

कानों में फुसफुसाता है

ज़िंदगी चल तो रही है

परपहले जैसी नहीं...

--

ई ससुर, मुद्दा क्या है?... ध्रुव सिंह 'एकलव्य'


तफ़्तीश करना मुद्दों की 

मुद्दा बड़ा अहम् है 

इस कारगुज़ारी में,

मिल गये हैं बंदर 

इसी मुद्दे की 

चारों बाँह पकड़कर। 

 ख़तरे में है मुद्दा 

एक सौ पैंतीस करोड़ 

मुद्दों के लिये,

ख़तरे में हैं जिनके मुद्दे 

अभी केवल कुछ वर्षों से।

--

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

--

17 comments:

  1. बेहतरीन अंक। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ....

    शुभ प्रभात

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  2. सुन्दर चर्चा. मेरी कविता शामिल करने के लिए शुक्रिया.

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  3. सुन्दर संकलन और सराहनीय प्रस्तुतीकरण के लिए आप को हार्दिक शुभकामनायें..मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार..सादर नमन..।

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  4. सुप्रभात उम्दा संकलन लिंक्स का आज के इस अंक में |मेरी रचना को स्थान देने के लिए
    आभार सहित धन्यवाद सर |

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  5. बेहतरीन अंक सराहनीय प्रस्तुतीकरण

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  6. सुन्दर संकलन ,मेरी रचना को शामिल करने के लिये आभार तथा ह्र्दयतल से धन्यवाद।

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  7. बहुत सुन्दर संकलन । संकलन में मेरे सृजन को सम्मिलित करने के लिए सादर आभार ।

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  8. मधुकलश खुल सा गया हो जैसे यहां । अति सुंदर संकलन हेतु हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  9. सुंदर रचनाओं का मोहक गुलदस्ता।
    सभी लिंक आकर्षक सुंदर।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    सादर।

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  10. बहुत-बहुत आभारी हूँ रवींद्र जी।

    सादर।

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  11. सुन्दर सूत्रों से सजी सुन्दर चर्चा| आभार आपका !

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  12. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति।
    सादर

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  13. बहुत खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

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  14. सप्तरंगी साहित्य से सजा हुआ चर्चा मंच अपना प्रभाव छोड़ जाता है - - मुझे जगह प्रदान करने हेतु आभार - - नमन सह।

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  15. बहुत सुन्दर और सार्थक चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  16. बहुत ख़ूबसूरत चर्चा मंच।
    शुभकामनाएँ

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