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Monday, December 20, 2021

'चार दिन की जिन्दगी, बाकी अंधेरी रात है' (चर्चा अंक 4284)

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आइए पढ़ते हैं कुछ पसंदीदा रचनाएँ-

 गीत "बैर के अंकुर उगाना पेट में निर्मूल हैं"

चार दिन की जिन्दगीबाकी अंधेरी रात है,

किसलिए फिर दुश्मनी की बात है,

शूल की गोदी में पलते फूल हैं,

बैर के अंकुर उगाना पेट में निर्मूल हैं,

दे रहा है अमन का पैगाम भारत!

अब नहीं होगा हमारा देश आरत!!

*****

आत्म कथा पुष्प की

मुझे यहीं जीने का

सच्चा  आनन्द मिला

अपनी क्षमता जान सका

खुद को पहचान सका |

*****

 एक ग़ज़ल : वह अधेरों में इक रोशनी है

नाप सकते हैं हम आसमाँ भी,

हौसलों में कहाँ कुछ कमी है।

*****

उम्र और सांझ


उम्र और सांझ

परस्पर

साथ चलते हैं

उम्र

का कोई एक सिरा

सांझ से बंधा होता है

और

सांझ

का एक सिरा

उम्रदराज़ विचारों से बंधा होता है।

*****

उम्मीद

सुना है जब शरीर बोझ बन जाए तो साँसें बहुत जल्दी साथ छोड़ देती हैं। पर कुछ तो है जो ये डोर टूटने नही दे रहा और मैंने उस कुछ को उम्मीद का नाम दे दिया है।

क्योंकि एक उम्मीद ही है जो इंतज़ार की उम्र लम्बी कर सकती है।

*****

एक नवगीत सामाजिक विसंगतियों और विरोधाभासों के नाम

जनता को तो देता,

केवल वादों की गोली।

और हरे नोटों से,

भरता नित अपनी झोली।

जनसेवक है या फिर,

वह कोई  व्यापारी है?

*****

बदलाव का ढोंग

अंधपरंपराओं की कोठरी की
झिर्रियों से रिसता ज़हरीला धुँआ
निडर,बेखौफ़ निगलता रहता है 
अपना कमज़ोर शिकार चुपचाप
अनवरत...,
और.... 

*****

अपशब्द | कविता | डॉ शरद सिंह | नवभारत

बात सहज है

और नहीं भी

आप्लावित धैर्य

छलक पड़ने को

हो उठता है आतुर

तब

निकल पड़ते हैं अपशब्द

मेरे भी मुख से

पर उन्हें सुनती हैं

बंद कमरे की

खिड़कियां, दरवाज़े

और दीवारें

चेतन और अवचेतन के बीच

एक आदिम द्वंद्व

द्वार खुलने तक

शांति का

तय होता रस्ता

अक्षमताओं की भूमि पर

बोता रहता है

क्षमताओं का बीज

*****

भगवान और शैतान- उत्पत्ति


कमबख्त किसी शैतान ने ही बनाई है ये मूँगफली! तभी खाते हुए रुका नहीं जाता है। भगवान इतना निर्दयी नहीं हो सकता है।"

भगवान और शैतान हो हो लेकिन वो पैदा कैसे होते हैं इसका पता तो लग ही जाता है।

*****

विभूति एक आत्मा ( गीता जयंती विशेष )

मिलने को उत्सुक है, चंचल अधीर जीव,

त्रस्त, संत्रस्त, अपत्रस्त हुआ जाता है

अब किस की देहरी पे शीश मैं झुकाऊँ जाके ,

पूरा ब्रम्हाण्ड आज शून्य नज़र आता है ।।

*****


आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

9 comments:

  1. सुप्रभात
    उम्दा लिंक्स आज की
    धन्यवाद रवीन्द्र जी मेरी रचना को आज के पटल पर स्थान देने के लिए |

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  2. खूब आभार आपका रवीन्द्र जी...। साधुवाद

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  3. आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।
    आपने बहुत अच्छा चर्चा का अंक सजाया है।
    बहुत-बहुत आभार।

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  4. बहुत अच्‍छी चर्चा प्रस्‍तुति

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  5. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति। अंक में मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु आभार।

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  6. विविधापूर्ण सूत्रों से सजी सुंदर प्रस्तुति में मेरी रचना शामिल करने के लिए अत्यंत आभारी हूँ रवींद्र जी।

    सादर।

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  7. बहुत खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

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  8. बहुत सुंदर सराहनीय संकलन । मेरी रचना शामिल करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार आदरणीय रविंद्र सिंह यादव जी । सभी रचनाकारों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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