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Sunday, December 05, 2021

"48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ" (चर्चा अंक4269)

 सादर अभिवादन

रविवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीय शास्त्री सर की रचना से)

पहले जैसा 'रूप' नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

"रूप रंग भले ढल जाए

प्यार और साथ हमेशा बना रहें"

आदरणीय शास्त्री सर को विवाह की "48वीं वर्षगाँठ की 

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं नमन

परमात्मा  आप की जोड़ी बनाएं रखें

*******

गीत "48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-5 दिसम्बर, 2021" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबकी सुननाअपनी कहना,
बच्चों की बातों को सहना,
हरा-भरा परिवार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

पहले जैसा 'रूप' नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

*****

प्रेम सरिस दूजा नहीं
यही प्रणय का सार
हृदय प्रेम परिपूर्णता
सजा सकल संसार
मन कोयल सा कूकता
अंग अंग संगीत
पावन परिणय में बँधे
साथ चले मनमीत।।

******

संशय से निकलो

संशय जब-जब बने धारणा

गहरी नींव हिला देता

अच्छे विद्व जनों की देखी 

बुद्धि सुमति भी हर लेता

बात समय रहते न संभली

शंका ने झकझोड़ दिया।।

******

सेहत का है राज यही, नहीं भूलना इन्हें कभी

समय पे सोना औ' जागना 

बात-बात पर दुखी न होना, 

थोड़ा सा ही पौष्टिक भोजन 

आसन, प्राणायाम साधना !


दर्द कभी हो कहीं देह में 

यह तन की पुकार है सुनना,  

उलझे से हों ग़र विचार तो 

यह मन का विकार है गुनना !

******राम बारात आगमन
जनकपुरी में बारात आई। देवगणों ने दुंदुभी बजाई।।
पुत्र-विवाह की लेकर मनोरथ।आये अयोध्या के राजा दशरथ।।
तीन अनुज संग आये रघुराई।दो सांवरे और दो गोरे भाई।।
देवों के देव गणेश पधारे। ब्रह्मा-विष्णु महेश पधारे ‌।।
*****
जलवा तुम्हारा

रूप रंग स्वभाव तुम्हारा  

 जलवा तुम जैसा  

 है ही  ऐसा

हो तुम  सब से  जुदा |

तुम्हारा मन किसी से

 मेल नहीं खाता

देख कर किसी को भी

 अंतरमुखी हो जाता |

सब चाहते तुमसे 

मिलना जुलना बातें करना

पर तुम्हें है  पसंद

 गुमसुम रहना |

भूले से यदि मुस्कुराईं

मन को भी भय  होता

 यह बदलाव कैसा 

*****


एक गीत : मौसम है मौसम बदलेगा
अगर कभी हो फ़ुरसत में तो, उसकी आँखों में पढ़ लेना
जिसकी आँखों में सपने थे  जिसे ज़माने ने लू्टे  हों ,
आँसू जिसके सूख गए हो, आँखें जिसकी सूनी सूनी
और किसी से क्या कहता वह, विधिना ही जिसके रूठें हो।


******जन्‍मदिन विशेष: आसमान में धान बोने वाले कवि थे ‘विद्रोही’उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। सुल्तानपुर में उन्होंने स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में वकालत करने के लिए दाखिला लिया लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सके। उन्होंने १९८० में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर में प्रवेश लिया। १९८३ में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल दिया गया। इसके बावजूद वे आजीवन जेएनयू में ही रहे******आज का सफर यही तक, अब आज्ञा देआपका दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा

9 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. कामिनी जी,नमस्कार !
    बहुत सुंदर,सराहनीय एवम पठनीय अंक ।कई सूत्रों पर गई। आपके श्रमसाध्य कार्य को मेरा नमन ।सादर शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह 💐🙏

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  3. सुप्रभात
    आभार सहित धन्यवाद कामिनी जी मेरी रचना को आज के अंक में स्थान देने के लिए |

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  4. सुप्रभात! पठनीय रचनाओं से सजा सुंदर अंक, आभार!

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  5. बहुत ही सराहनीय प्रस्तुति
    सभी अंक पठनीय हैं
    इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए
    आपका बहुत-बहुत आभार🙏🙏🙏

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  6. शुभकामनाएं आदरणीय शास्त्री जी को विवाह वर्षगांठ पर |

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  7. बहुत सुन्दर और पठनीय लिंक मिले आज की चर्चा में।
    आदरणीया कामिनी सिन्हा जी आपका आभार।
    --
    हमारी 48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ पर शुभकामनाएँ व्यक्त करने वाले
    समस्त मित्रों का धन्यवाद।

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  8. सराहनीय प्रस्तुति
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार

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  9. सराहनीय प्रस्तुतीकरण।

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