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Friday, December 24, 2021

'अहंकार की हार'(चर्चा अंक 4288)

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय  प्रस्तुति में आपका स्वागत है

शीर्षक व काव्यांश आ.रूपचंद्र शास्त्री "मयंक " जी के दोहे 'अहंकार की हारसे-

मातृभूमि के लिए जोदेते हैं बलिदान।

रक्षा में संलग्न हैंअपने वीर जवान।।

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अभिनन्दन-वन्दन करेंउन सबका हम आज।

जिनके पुण्य-प्रताप सेजीवित सकल समाज।।

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

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दोहे "अहंकार की हार" 

फूलदान में हैं सजेसुन्दर-सुन्दर फूल।
सुमनों सा जीवन जियेंबैर-भाव को भूल।।
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शस्य-श्यामला है धराजीवन का आधार।
पेड़ों-पौधों से करेंधरती का शृंगार।।
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एक स्वप्न से क्या मिल सकता 

जिससे ज़्यादा ना दे अतीत, 

जाल कल्पना का भी मिथ्या 

भावी के सदा गाता गीत !

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आईना

दिन-ब-दिन, ढ़ल रहा, ये वक्त,
राह भर, ये मांगती है रक्त,
धार, वक्त के, ना मोड़ पाओगे,
रहगुजर, इस वक्त को ही, तुम बनाओगे!
सूनी यामिनी में 
जलते-जलते क्रोध में 
नज़र चाँद पर जा ठहरी 
सर्दियों की रात में 
न जाने क्यों लगा ज्यों तपती दोपहरी
--
फटे जीवन में 
जली रोटी की महक
बच्चे की ललचाई और गहरे धंसी आंखों में
जीवन की उम्मीद है।
लोभ लगाए पावन फेरे
लेकर मँहगे स्वप्न बड़े।
एक हाथ में स्वर्ण पोटली
दायज रूपी रत्न जड़े।
फिर भी अपने हाथ पसारे
हर मंडप के बीच लड़ा।
चला रहा....
दरिया नहीं कोई
जो तुझमें समा जाऊँगी 
रे सागर, 
तिरे सीने पे अपने
कदमों के निशाँ
छोड़ जाऊँगी…!!
--
उम्र तमाम हुई तन में साँस अभी बाकी है
सर्दी गर्मी ठंढ  सहे खेल मौत का बाकी है
सूरज का गुस्सा झेले चाँदनी की उपेक्षा.....
हर मौसम ने उजाड़ा ठोकर अभी और बाकी है।
 विशालकाय लिए बदन
सुगंध भी बहुत है कम
कहा अकड़ कर गुलाब
मुझसे महक रहा चमन.
मध्यम वर्ग वालों को मालूम होगा वे इसी युक्ति नामक चिड़िया के सहारे अपने सारे युद्ध फतह कर लेते हैं। सच कहा जाए तो मिडिल क्लास लड़की उस किसान की तरह होती है जो धूप और बरसात में रहकर भी अपने परिवार के साथ संसार का पेट पालता है। लेखिका ने अपनी इस कृति के माध्यम से मध्यम वर्ग के सुख-दुःख को अपने अनुभवी शब्द दिए और न जाने कितने बेजुवानों को शब्द मिल गये, कितनों की पीड़ा हल्की हो बिसर गयी होगी। मध्यम वर्ग के वातावरण में रहकर एक माँ अपने बच्चों को कैसे-कैसे नदी-नाले लाँघते-फलाँगते शिखर तक पहुँचा पाती है। देखने वालों के पसीने छूट जाते हैं लेकिन वह अपने पथ पर अटल रहती है। मध्यम मार्ग समझने वालों के लिए सुकून का मार्ग हैइन्हीं शब्दों के साथ बस मैं यही कहूँगी कि आप यूँ ही लिखती रहें और छपती रहें। अनेक शुभकामनाएँ! 
आज फ़िर ट्रेन दो घंटे लेट हो गई थी। शिल्पा स्टेशन पर उतरी तो रात के सिर्फ़ 7.30 बजने के बावजूद अंधेरा हो गया था। ठंड इतनी ज्यादा थी कि पूरी बाही का स्वेटर और उसके ऊपर शॉल पहनने के बावजूद वो ठंड से ठिठुर रही थी। स्टेशन से बाहर निकली तो उसे नजदीक ही एक बुजुर्ग रिक्शेवाला दिखा। घर जाने के लिए वो रिक्शे में बैठ गई। 
रिक्शे में बैठने के बाद अचानक उसकी नजर रिक्शेवाले के तरफ गई तो उसने देखा कि रिक्शेवाले ने सिर्फ़ एक पतला सा शर्ट पहना हुआ था और वो बहुत बुरी तरह ठंडी से ठिठुर रहा था। 

8 comments:

  1. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति|
    आपका आभार अनीता सैनी दीप्ति जी!

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  2. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, अनिता दी।

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  3. अनीता जी आभार आपका...। साधुवाद

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  4. बड़े दिन की अग्रिम शुभकामनायें,विविधतापूर्ण रचनाओं के सूत्रों से सजा चर्चा मंच, आभार मुझे भी इसमें शामिल करने हेतु !

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  5. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति। मेरी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार अनीता जी।

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  6. सराहनीय और पठनीय सूत्रों का संकलन । अनीता जी आपको और सभी रचनाकारों को बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

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  7. बेहतरीन संकलन ,हमारी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए ह्रदय से आभारी हूँ।

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  8. बेहतरीन चर्चा संकलन

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