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Tuesday, December 28, 2021

"मेहमान कुछ दिन का अब साल है" (चर्चा अंक-4292)

सादर अभिवादन

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से)

पड़ने वाले पड़ने नये साल के हैं कदम!

स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

बस दो चार दिन और....

ये साल भी गुजर जायेगा....

और यह जाएगी सिर्फ अच्छी बुरी यादें....

और बन्ध जायेंगी नये साल से ढ़ेर सारी उम्मीदें..

अब आने वाला साल कैसा रहेगा ये तो वक्त ही बताएगा....

हम तो बस दुआ कर सकते हैं कि

आने वाला साल बहुत सी खुशियां लेकर आए

इन्हीं दुआओं के साथ, चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...

****** 

गीत, "मेहमान कुछ दिन का अब साल है"

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कोई खुशहाल है. कोई बेहाल है,
अब तो मेहमान कुछ दिन का ये साल है,
ले के आयेगा नव-वर्ष चैनो-अमन!
स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

******

"मेरे साथ चलोगी"




पहली बार

 मौन का अनावरण-

“हमारे खेत के हैं 

अब की बार खूब लगे हैं”

-”मेरे साथ चलोगी”

व्यवहारिकता की व्यस्तता में

उसने मुझे कब छोड़ा

और मैंने उसे कब 

याद नहीं…


*********

गजल -- रोज़ नए गम हैं -

जब न पलकें लगें न जगा जा सके ,

           कोई मेरी गजल गुनगुना लीजिये |

                       कई जन्मों के पाप धुल जायेंगे ,

           आंसुओं में किसी के नहा लीजिये 

                       मारीचों का युग है बचेंगे नहीं ,

           खुद को कितना राघव बना लीजिये

*******सहनशील चेतना हो जिसकी
जीवन क्या है ? क्या निरंतर कुछ न कुछ अनुभव करते रहने की ललक का ही दूसरा नाम जीवन नहीं है। शिशु के जन्म लेते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जब तक देहाध्यास  नहीं छूटता, इंद्रियों से अनुभव लेने की कामना का नाश नहीं होता। हर नए प्रातः में हमारा पदार्पण यदि सजगता पूर्ण हो तो इन अनुभवों को ग्रहण करते हुए भी जीवन के मूल्यों को हम किसी भी क्षण विस्मृत नहीं करेंगे। *******संकल्प
शुभारम्भ संकल्प से ,परम्परा प्राचीन।
ध्येय सिद्धि की पूर्णता,रहिये इसमें लीन।।

सुप्त पड़ी क्षमता जगा,शक्ति मानसिक साध।
एक ज्योति संकल्प की,जलती रहे अबाध ।।

सदाचार के ह्रास से, हुई सभ्यता भार।
भूल गये संकल्प वो,जो जीवन आधार।।
*******रक्षा का कर्तव्यजब पाण्डव वनवास में थे,तो दुर्वासा ऋषि दुर्योधन के घर पधारे। दुर्योधन ने उनकी खूब आवभगत की। क्योंकि,वह जानता था कि दुर्वासा ऋषि बड़े क्रोधि स्वभाव के हैं। आतिथ्य में किसी भी प्रकार की कोई कमी होने पर तुरंत श्राप दे डालते हैं।उसके आदर -सत्कार से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उससे कोई वरदान मांगने के लिए कहा। दुर्योधन कब चूकने वाला था। उसने हाथ जोड़ते हुए उनसे कहा-आपके आशीर्वाद से मुझे किसी भी चीज की कमी नहीं।********प्रतिलिपि
प्रतिलिपि लिखी जिन गुमनाम गुलजारों की l
मिली वो इस अंजुमन के प्यासे रहदारों  सी ll

सूनी दीवारें सजी थी किसी दुल्हन सेज सी l
कुरबत जिसके उतर आयी थी महताब बारात की ll

मशरूफ थी रूह इस कदर इनायतें रैना इंतजार में l
शुरूर नूर लिहाज का गुम हो गया इस कायनात में ll
******ऐसे नसीब का तू बता खुद भी क्या करूँ******आवश्यक है वैज्ञानिक समझ विकसित करना

6 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति, सभी रचनाएं बहुत आकर्षक और सुंदर।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए हृदय से आभार कामिनी जी ।

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक चर्चा प्रस्तुति।
    मेरी पोस्ट की पंक्ति को चर्चा का शीर्षक बनाने के लिए
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी।

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  3. नए वर्ष के लिए सभी पाठकों और रचनाकारों को अग्रिम शुभकामनाएँ, सुंदर चर्चा!

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  4. बहुत सुंदर सराहनीय लगाया है आपने कामिनी जी, मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  5. बेहतरीन व सार्थक प्रस्तुति, सभी रचनाएं बहुत आकर्षक और सुंदर।
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरनीय कामिनी जी।

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  6. एक से बढ़ कर एक रचना
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार

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