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Monday, November 15, 2021

'सन्नाटा बाजार में, समय हुआ विकराल' (चर्चा अंक 4249)

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

लीजिए पढ़िए चंद चुनिंदा रचनाएँ-

दोहे "खेतीहर-मजदूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

सन्नाटा बाजार मेंसमय हुआ विकराल।

नोट जेब में हैं नहींकौन खरीदे माल।।

--फाँस गले में फँस गयीशासक है लाचार।

नये-नये कानून क्योंलाती है सरकार।।

*****

पॉकेटमनी

पॉकेटमनी के सपने देखते-देखते मैं पापा की शर्ट की पॉकेट तक और रागिनी उनकी पैन्ट की पॉकेट तक पहुँच गईं पर वो हमारे हाथ नहीं आया.
जन्मदिन हम बच्चों के लिए हज़ार ख़ुशियाँ लेकर आता है.
इस दिन हमको वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है, मम्मी-पापा हमारे लिए अलादीन का मिनी चिराग हो जाते हैं और हमारी बड़ी नहीं तो कम से कम छोटी-मोटी ख़्वाहिशें ज़रूर पूरी करते हैं.
मेरे दसवें जन्मदिन पर मम्मी मेरे और अपने दोस्तों को बुलाकर पार्टी देना चाहती थीं पर मैंने इसके बदले में बच्चों के लिए पॉकेटमनी ग्रान्ट किए जाने की डिमाण्ड कर डाली.

रागिनी ने भी मेरे सुर से अपना सुर मिला लिया. चार महीने बाद उसका भी तो आठवाँ जन्मदिन आना था.
*****

सपनों का आँचल

सपनों का आँचल होगा
और सफ़ेद अश्व पर सवार होकर
उसका राजकुमार उसके पास आयेगा
और उसे प्यार के गीत सुनाएगा
और जी लेगी वह एक सच्ची खुशी

उस झूठी सी एक रात में!
*****
कर्ज माटी का चुका वो फर्ज निभाए
श्वेतवस्त्र नजर कर मेरा अंग सजाए

करवा चौथ तीज व्रत का अंत कैसा
उम्र भर के विरह का दिया दंश ऐसा ।
*****
झरना
हर किसी के लिये
कलेजा निकाल कर 
रख देना
उसकी फितरत है
छल कपट जिससे कोसो दूर है
खरे सोने सा जिसका दिल है
वो एक ऐसा शख्स है
जो सिर्फ देना जानता है
*****

रवीन्द्र सिंह यादव 


6 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति 🙏

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  2. सार्थक लिंको के साथ सुंदर चर्चा प्रस्तुति|
    आपका आभार आदरणीय रवीद्र सिंह यादव जी|

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  3. बहुत सुन्दर सूत्रों का संकलन आज का चर्चा मंच ! मेरी रचना को भी आज सम्मिलित किया, आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रवीन्द्र जी ! सादर वन्दे !

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  4. सुंदर सार्थक रचनाओं के सूत्र से सुशोभित अंक । बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

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