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Friday, November 19, 2021

'प्रेम-प्रवण '(चर्चा अंक-4253)

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय  प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


 शीर्षक व काव्यांश आ.अमृता तन्मय जी की रचना 
'प्रेम-प्रवण ' से -


आर्य प्रिय वो
जो तीक्ष्ण पीड़ा से
तृण तोड़कर
त्राण दे सके
और सुरभित कस्तूरी को
तेरे गोपित नाभि से
नीलिन होकर ले सके

निज क्लेश न्यून कर
और अपनी प्रीति
प्रदान उसे कर
जो तेरी सुधि में
नित पुष्पित हो
नित सुष्मित हो
निज सुध-बुध खोकर


आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

 --

उच्चारण: संस्मरण "जमाना बहुत बदल गया" 

 सुबह होते ही सारे मेहमान 2-3 बैलगाड़ियों पर सवार होकर दो कोस दूर गंगाघाट पर लगे विशाल मेले में जाते थे। गाड़ी में ही खिचड़ी, घी, आम और आँवले का अचार, लकड़ी, खिचड़ी पकाने के लिए एक बड़ी देग और गंगाघाट पर खिचड़ी बनती थी।

--

Amrita Tanay: प्रेम-प्रवण .........

अनायास ही
अहैतुक ही
जब हृदयंगम
होता है ये लक्षण
तब अहोभाग्य से
रहता सदैव ह्रदय
केवल और केवल
प्रेम-प्रवण 
--
एक दिए का जलना
बहुत भला है

जहाँ अभी हाल के बरसों में
बुझ गए हों अनेक दीपक
महामारी से मरने वालों की संख्या
--
पत्ते-तने हरे थे मगर फल कहीं न थे
चिड़िया उदास आम की डालों से आ रही
जादूगरी,तिलस्म किसी काम का नहीं
मुश्किल तमाशा देखने वालों से आ रही
--
अच्छे दिन शायद फिर आने लगे हैं, 
लोग मिलते ही हाथ मिलाने लगे हैं।  
कोरोना के डर से हुए निडर इस कदर,
कि दोस्तों को फिर गले लगाने लगे हैं।  
--

जो चला गया उसे भूल जा

जो है साथ में उसे प्यार कर


वो न प्यार था, कुछ और था

जो था रस्म-ओ-रहम की खुराक पर

--
फिर भी कलिका खिली हुई जो
उसका ही कुछ मान करो

एक दिशा और एक दशा में
चलते जाते कई अनावृत्त
रेखाओं का जाल सजाया
मूक हो गई पर आकृत
--
मन के द्वार 
 सजी रंगोली
 मंगल कलश 
 सजा कर कमलों में 
करती हूँ अभिनन्दन तेरा 
हिंदी, लगाकर तुझको 
रोली चन्दन मैं !!
--
मानव वेश धरे अब दानव
कैसे इनसे पार पड़े
ठगी लूट गोरखधंधों के
कितने अब बाजार खड़े
फिर भी लड़ता जीवन रण है
मानवता है अडिग खड़ी।
--
वर्षों बाद जेल काट तथा बुढ़ापा ओढ़, गब्बर वापस आया था रामगढ़। मन में एक आशा थी कि शायद छूटा हुआ  लूट का माल हासिल हो ही जाए ! पर वह भौंचक सा रह गया था यहाँ आ कर ! बीते सालों में रामगढ़ खुशहाल हो चुका था ! अब वहाँ तांगे नहीं, तिपहिया और टैंपो चलने लग गए थे। सड़कें भी पक्की हो गई थीं ! बिजली आ चुकी थी। लालटेनें इतिहास का हिस्सा बन चुकी थीं। बीरू-बसंती के प्यार को विवाह के गठबंधन में बदलने में सहयोगी उस समय की बिना पाइप की पानी की टंकी में अब पाइप और पानी दोनों उपलब्ध हो गए थे ! पुलिस का थाना बन गया था। एक डिग्री कालेज भी खुल गया था, जिससे अब किसी अहमद को अपनी जान पर खेल, शहर जा पढाई नहीं करनी पड़ती थी ! यह सारा बदलाव यहां से ठाकुर के चुनाव जीतने का नतीजा था। 
--
अब इस उम्र में इन शब्दों से जब भी मेरा सामना होता है तो अपने कारनामे पर मैं खुद को समय के आइने में देखती हूँ। फिर एक लम्बी साँस के साथ बड़ा संतोष महसूस होता है कि कुछ तो तूफ़ानी हमने भी अपने जीवन में किया है। वरना आज के समय के सीमित दायरे का पूरी तरह से व्यवस्थित घर होता तो शायद ‘ऊपरतक्का’ और ‘खौरा-खापट’ शब्द का ईजाद नहीं हो पाया होता ।
--

7 comments:

  1. सुप्रभात
    धन्यवाद इतना सुन्दर अंक और लिंक्स संकलित करने के लिए |

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  2. सुप्रभात🙏🙏
    बेहतरीन प्रस्तुति!
    सभी अंक सरहानीय है
    पुरुष दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ सभी आदरणीय सर को🙏🙏🙏🙏

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  3. बहुत सुन्दर और श्रमसाध्य चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार अनीता सैनी दीप्ति जी।

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  4. अनीता जी, हमेशा की तरह एक सुंदर,सार्थक रचनाओं से परिपूर्ण शानदार अंक, उन्हीं के मध्य मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार एवम अभिनंदन । मेरी आपको और सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।

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  5. हार्दिक आभार आपका।सादर अभिवादन

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  6. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार

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