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Wednesday, November 17, 2021

"मौसम के हैं ढंग निराले" (चर्चा अंक-4251)

 मित्रों!

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक!

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गीत "सर्द हवाओं ने तेवर सब ढीले कर डाले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक) 

श्वेत कुहासा-बादल काले।
मौसम के हैं ढंग निराले।।

भुवन भास्कर भी सर्दी में,
ओढ़ रजाई सो जाता है,
तन झुलसानेवाला उसका,
रौद्ररूप भी खो जाता है,
सर्द हवाओं के झोंको ने,
तेवर सब ढीले कर डाले।
मौसम के हैं ढंग निराले।।

उच्चारण 

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पिरामिड: मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम 

श्री
राम
अराध्य
मरयादा
पुरषोत्तम
रघु कुल मणि
अवध शिरोमणि ।।

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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हिन्दू धर्म की महानता के 16 कारण... (अंतिम किश्त ) 

अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।
अर्थात : यह मेरा है, यह पराया है, ऐसे विचार तुच्छ या निम्न कोटि के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति समस्त संसार को ही कुटुम्ब मानते हैं।  इसी धारणा में विश्व कल्याण की अवधारणा भी समाहित है।

प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व में जनजाति के हितों का संरक्षण

स्वाधीनता के लिए जनजातीय संघर्ष के महानायक भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन। भगवान बिरसा मुंडा गरीबों के सच्चे भगवान थे। उन्होंने शोषित और वंचित वर्ग के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष किया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान और सामाजिक सद्भावना के लिए किए गए प्रयास हम सभी को सदैव प्रेरित करते हैं। 

राष्ट्रचिंतक 

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सरप्राइस 

बरसों से मन मे दबी भावनाओं को बस एक बार वह उस पर जाहिर कर देना चाहता था, मगर क्या यह इतना आसान था एक पति, एक पिता और एक परम आज्ञाकारी पुत्र के लिये।

palash "पलाश" 

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एक ग़ज़ल-आखिरी फूल हैं मौसम के 

चित्र साभार गूगल
 सिर्फ़ मधुमास के मौसम में ही ये खिलते हैं 
आख़िरी फूल हैं मौसम के चलो मिलते हैं 

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चित्र 

अपने आलीशान घर की दीवार पर 
उसने एक चित्र लगाया,
जिसमें लकड़ी का एक सुन्दर घर था,
आसपास हरियाली थी,
रंग-बिरंगे फूल खिले थे,
सामने नदी बह रही थी. 
अब वह सुबह से शाम तक 
उस चित्र को देखता रहता है,
अब अपना घर उसे अच्छा नहीं लगता. 

कविताएँ 

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न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी ! ऐसा क्यों ? 

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेंट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामीण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की डिमांड रख दी हो, जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो !

कुछ अलग सा 

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खोट 

रूप कुरूप नजर जो आये,

अयथार्थ दिशा मे दर्पण देखो, 

तृप्ति हेतु करो जो अर्पण,

उस अर्पण का तर्पण देखो। 

'परचेत' 

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विकल्प की तलाश 

अग्निशिखा : 

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चाँद और मानव 

आज भारत का सितारा

 हुआ बुलंद

 अन्तरिक्ष विज्ञान में

 पीछे नहीं रहा  |

नासा फिर से 

अग्रणी हुआ विश्व में 

वाह क्या करिश्मा हुआ 

किया कमाल भारतीय  वैज्ञानिकों ने | 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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पुस्तक अंश: आतंक का पहाड़ 

गन थामे देवराज चौहान दौड़ते-दौड़ते ठिठका। गैलरी सीधी जा रही थी जो कि टीवी रूम में जाकर समाप्त होती थी। और जहाँ इस समय देवराज चौहान खड़ा था, उसके ठीक बाईं तरफ जो गैलरी जा रही थी, आतंक के पहाड़ ने बताया था कि इस तरफ गनमैनों के छोटे-छोटे रेस्टरूम बने हुए हैं। और इस वक्त रात थी। स्पष्ट था कि पूरे नहीं तो आधे से ज्यादा गनमैन इस वक्त आराम कर रहे होंगे। दस-बारह के करीब ही पहाड़ी में कहीं अपनी ड्यूटी दे रहे होंगे। एक बुक जर्नल 

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प्रेम 

मखमली से भाव रखते
गेरुए सी छाप तेरी

साथ चंदन सा महकता
प्रेम अंगूरी हुआ है
धड़कनों की रागिनी में
रूप सिंदूरी हुआ है
सोचता मन गाँव प्यारा
ये डगर रंगीन मेरी ।।

काव्य कूची 

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ऊंघ रही हैं बोझिल पलकें और उबासी सोफे पर 

धूप छुपी मौसम बदला फिर लिफ्ट मिल गई मौके पर.
कतरा-कतरा शाम पिघलती देखेंगे चल छज्जे पर.
 
तेरे जाते ही पसरी है एक उदासी कमरे पर,
सीलन-सीलन दीवारों पर सिसकी-सिसकी कोने पर

स्वप्न मेरे 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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6 comments:

  1. सुप्रभात !
    आदरणीय शास्त्री जी, प्रणाम !
    सुंदर तथा सराहनीय अंक । चर्चा मंच पर मेरे पिरामिड सृजन को स्थान मिलना गर्व का विषय है,आपकी तहेदिल से आभारी हूं, आपको मेरा सादर नमन एवम वंदन । आपको और चर्चा मंच को हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  2. सुप्रभात
    आभार सहित धन्यवाद मेरी रचना को आज के अंक में शामिल करने के लिए |

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  3. हार्दिक आभार आपका आदरणीय।सादर अभिवादन

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  4. रोचक लिंकों से सुसज्जित चर्चा। आभार शास्त्री जी🙏

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  5. सुंदर अंक। मेरी रचना को आज के अंक में शामिल करने के लिए आभार.

    ReplyDelete
  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुति। मेरे ब्लॉग चर्चामंच पर स्थान देने के लिए आपका बहुत धन्यवाद और आभार।

    ReplyDelete

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