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रविवार, अगस्त 21, 2022

"मस्तक का अँधियार हरो"(चर्चा अंक 4528)

सादर अभिवादन आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है (शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर की रचना से)

लेखनी-पुस्तक माला धात्री,

अब मेरा भी उद्धार करो।

गुण-ज्ञानवान मुझको करके,

मन में मेरे सुविचार भरो।।

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माँ सरस्वती की चरण वंदना करते हुए चलते हैं,

आज की कुछ खास रचनाओं की ओर....

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सरस्वती वन्दना "मस्तक का अँधियार हरो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आया हूँ चरण-शरण में माँ,

सपनों को तुम साकार करो।

गुण-ज्ञानवान मुझको करके,

मन में मेरे सुविचार भरो।।

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 मैं का बोलबाला


तम की कालिमा से निकाला

भोर की लाली ने फिर सँवारा 

पवन दे रही थी मधुर हिलोर

पल्लव थाल मोती ओस के कोर

शुभ आरती उतारे उषा कुमारी ।।

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चौमासे का गोबर

"बहुत-बहुत बधाई हो! तुम्हें काव्य में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।"

"वो तो मिलना ही था..! बहुत वर्षों से दिन-रात इसके लिए मैं मेहनत कर रहा था...।"

"मुझसे बेहतर और कौन जान सकता था तुम्हारे द्वारा किये गए मेहनत को?"

"क्या अब भी तुम्हें शक़ है? हमारे गाँव में चिकित्सा की स्थिति बहुत बुरी थी। अपने पुरखों के जमीन पर चिकित्सालय बनवाया...,"

"और उसमें तुम्हारे द्वारा लायी चिकित्सक, तुम्हारी पत्नी  बन गयी..?"


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सर्व धर्म समानत्व -

सवर्ण हिन्दू निर्लज्ज होकर अपने दलित भाइयों की आहुति दे रहे थे.
शाह बानो प्रकरण में इस्लाम के अंतर्गत स्त्री-अधिकार की समृद्धि परंपरा की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं.
जैन समुदाय में दुधमुंही बच्चियों को पालने में ही साध्वी बना कर धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था.
उस समय खालिस्तान आन्दोलन अपने शिखर पर था.
पन्थ के नाम पर और स्वतंत्र खालिस्तान के नाम पर, अन्य धर्मावालाबियों का खून बहाया जा रहा था.

हमारे देश में ईसाई धर्म-प्रचारक डॉलर से भरी थैलियाँ खर्च कर हज़ारों की तादाद में धर्म-परिवर्तन करा, मानवता की तथाकथित सेवा कर रहे थे.
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मैं अपना ही अर्थ ढूंढता हूँ ।



सोहर के बीच 

माँ यशोदा ने जब मुझे कसकर गले लगाया 
उनके बहते आँसुओं को 
अपनी नन्हीं हथेली पर महसूस करते हुए 
मेरा आँखें माँ देवकी को
वासुदेव बाबा को ढूंढ रही थीं ...

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वामनराव बलिराम लाखे


सन 1857 की असफल जन-क्रांति के बावजूद, देश की जनता आजादी पाने के लिए सदा प्रयास रत रही थी ! इस मुहीम के यज्ञ में हजारों-हजार आजादी के परवानों की बिना किसी अपेक्षा के आहुतियां पड़नी बदस्तूर जारी थीं ! पर दुःख इस बात का है कि गुलामी से मुक्ति मिलते ही हम अपने कर्म-कांडों में ऐसे उलझे कि उन शूरवीरों को भूलाते चले गए ! आज हालत यह है कि नई पीढ़ी से यदि देश पर न्योछावर हुए वीरों के नाम पूछे जाएं, तो शायद हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी ! हालत तो ऐसी भी है कि लोगों को अपने ही शहर में स्थित किसी स्मारक का नाम, जो किसी क्रांतिवीर के नाम पर हो, तो पता होता है, पर उसके इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं होती !------------------------------------एक गीत -हज़ारों फूल खिलते थे

कोई भी

मूड,मौसम हो

मग़र हम साथ चलते थे.

यही वो रास्ते

जिन पर

हज़ारों फूल खिलते थे.

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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे 

आपका दिन मंगलमय हो 

कामिनी सिन्हा 

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    श्रमसाध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी।

    जवाब देंहटाएं
  3. सार्थक और श्रमसाध्य चर्चा प्रस्तुति।
    वरिष्ठ नागरिक दिवस की आप सबको बधाई हो।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूबसूरत चर्चा संकलन

    जवाब देंहटाएं
  5. आदरणीय शास्त्री जी की पंक्तियों के साथ सुंदर आरंभ।
    शानदार प्रस्तुति।
    सभी रचनाएं पठनीय सुंदर।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

    जवाब देंहटाएं

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