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Saturday, February 06, 2010

“मैं मगर हारा नहीं हूँ....” (चर्चा मंच)

"चर्चा मंच" अंक-56
चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
आज के
"चर्चा मंच" को सजाते हैं।


कुछ ऐसे ब्लॉगों के साथ जिनकी चर्चा इस मंच पर कभी नही की गई!
सभी ब्लॉग्ल पर उनका लिंक लगा है! 
आप इन पर जाइए और अपनी टिप्पणी आशीर्वाद के रूप में अवश्य दीजिए-
*
"मैं मगर हारा नहीं हूँ...."


थक गया हूँ मैं भले ही
मैं मगर हारा नहीं हूँ...
वक़्त हो कितना भी कातिल
वक़्त का मारा नहीं हूँ !!……..

जय लोक मंगल

यह मंच आपका है आप ही इसकी गरिमा को बनाएंगे। किसी भी विवाद के जिम्मेदार भी आप होंगे, हम नहीं। बहरहाल विवाद की नौबत आने ही न दैं। अपने विचारों को ईमानदारी से आप अपने अपनों तक पहुंचाए और मस्त हो जाएं हमारी यही मंगल कामनाएं...


...हमें चेहरा नहीं मिलता

तेरी खुशबू नहीं मिलती , तेरा लहजा नहीं मिलता

हमें तो शहर में कोई तेरे जैसा नहीं मिलता    

यह कैसी धुंध में हम तुम सफ़र आगाज़ कर बैठे

तुम्हें आंखें नहीं मिलती हमें चेहरा नहीं मिलता


सर हमारा तो अभी बाकी है.

हाथ काटे हैं ज़बां काटी है.सर हमारा तो अभी बाकी है. एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो तोप पर बैठी गुनगनाती है लोग दातों में उँगलियाँ दाबें,…….

 

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.

हर कदम रखना तुम देख-भाल के !
दोस्तों! पता नहीं ऐसा आप लोगो का दिल भी करता है अथवा नहीं, मगर मेरा दिल तो कभी-कभी मार खाने की भी ख्वाइशे पालता है ! :) खैर, अब वेलेंटाइन डे भी नजदीक आ रहा है, तो क्यों न आज कुछ नसीहते अपने युवा मित्रो को दे डालू ( नसीहत देने की पुरानी आदत जो है )
आ न जाना चक्कर में कभी किसी की चाल के……

अंधड़ !

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी, उस से ज़रा सा राब्त बढ़ाना बहुत हुआ।
-अहमद फराज़-उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ।अब क्या कहें ये किस्सा पुराना बहुत हुआ।ढ़लती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़,ए मर्ग - ए - नगाहाँ तेरा आना बहुत हुआ।हम खुल्द से निकल तो गये हैं, पर ऐ खु़दा,इतने से वाक्ये का फ़साना बहुत हुआ।अब हम हैं और सारे…..

हमराही

कविता की जुबानी-----
आज कविता खुद अपनी दास्तां सुनाने आई है अपनी जुबान से अपने को आपका बनाने आई है। लोग कहते हैं मुझे पढ़ कर क्या हूं मैं कोई कहता है कविता तो दिल की आवाज है तो कोई उसे महज एक नजर देखकर समझता टाइम पास है किसी के लिये यह सिर्फ़ कोरी बकवास है तो किसी के लिये एक………

JHAROKHA

जैन:प्राचीन इतिहास-14
गातांक से आगे....सात निन्हव व दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय -ऊपर जिन गणों कुलों व शाखाओं का उल्लेख हुआ है, उनमें कोई विशेष सिद्धान्त-भेद नहीं पाया जाता। सिद्धान्त-भेद की अपेक्षा से हुए सात निन्हवों का उल्लेख पाया जाता है। पहला निन्हव महावीर के जीवन काल………..

"हे प्रभु यह तेरापन्थ"

मिथिला पुत्र लल्लन प्रसाद ठाकुर जयन्ती पर्व, जन्मदिन और माधव सेवा।
कल मिथिला पुत्र स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर का जन्म दिवस था और इस तिथि समारोह में तब्दील कर सामाजिक सेवा के साथ सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन कर स्व. एल पी. ठाकुर स्मृति न्यास ने ठाकुर जी को सम्पूर्ण श्रधांजलि दी।जैसा की न्यास की अध्यक्ष सुश्री कुसुम ठाकुर ने…..

अनकही

नया ठौर

चप्पल से निकला चुर्र-र - मैं जब भागते- भगाते देर शाम अपने मित्र शर्माजी के घर पहुंचा तो सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। देखा, शर्मा की धर्मपत्नी खलबला रही थीं और अपने ड्राइंग रूम ...

SELECTION & COLLECTION

शादी तीन रिग्स वाला सर्कस है - अंकल जी आंटीजी संपत का प्रणाम स्वीकार करे। आप लोगो से बहुत अंतराल के बाद मिलना हो रहा है । पर आपको मन ही मन रोजाना याद करता रहता हु। में मेरी दीदी की शादी..

यशस्वी

22 अक्टूबर 2019 में हो जायेंगे 100 साल पूरे - *यह मेरे ब्लॉग की भी 100 वीं पोस्ट है।* भारत में मद्रा के स्वरूप में हमेशा ही बदलाव होता रहा है। पहले जो मुद्रा प्रचलन में थी वो इस समय के प्रचलित मुद्रा स...

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ब्लॉगर कार्यशाला में क्या हो? - अब जबकि छत्तीसगढ़ में ब्लॉगर कार्यशाला के आयोजन की रूप रेखा बनने लगी है ये जान लेना बहुत जरुरी है की एक आम ब्लॉगर की जरूरतें और समस्याएं कौन कौन सी है । अ..

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छू आई बादल के गाँव - *छू आई बादल के गाँव बहुत दिनों के बाद सखी री उमड़ घुमड़ कर गरजी बरसी बीते मौसम में हो आई धो आई स्मृतियों के ठाँव छू आई बादल के गाँव कुनमुन सी ये धूप सुन...

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एक मुलाक़ात.. - कल दादा आये थे.. आदि से मिलने.. आदि के घर... कौन थे.. ये तस्वीरें देख कर पता लगा लो... पहचान गए न?

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हमारे प्रेम के विरुद्ध…हम…फिर भी ज़िंदा चाहत-संगीत

हर बार उभर आते हैंमेरे चेहरे परतुम्हारे प्रेम के निशानतबजब हम मिलते हैंसूरज मुस्कराता हैऔर, और तेज़ बहने लगती है नदीफर्राटा भर-भर हांफ उठती हैधरतीपर ये उन्माद नहीये सब करते हैंव्यंग्यहम परहम भी लगातार निचोड़ते रहेअपने-अपने हिस्से का……..

चौराहा


गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष 

गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी मेरी पॉडकास्‍ट इंटरव्‍यू का दूसरा भाग सुनें !! - कई दिन पूर्व गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी इंटरव्‍यू के पहले भाग का लिंक मैने आपलोगों को दिया था । आज दूसरे भाग का लिंक भी दे रही हूं , कृपया सुने और उ..

"मेरी पुस्तक - प्रकाशित रचनाएँ : प्रेम फ़र्रुखाबादी"

चलो उन्हें सकून तो मिला, मुझे भुलाकर - चलो उन्हें सकून तो मिला, मुझे भुलाकर। चलो उनका दिल तो खिला, मुझे भुलाकर। हमेशा यही आरजू रही वो जहाँ रहें खुश रहें चलो दूर हुआ उनका गिला, मुझे भुलाकर। जाने...

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रामेश्वर वैष्णव की अनुवादित हास्य कविता मूल आडियो सहित - रामेश्वर वैष्णव जी छत्तीसगढ के जानेमाने गीत कवि है, इन्होने हिन्दी एव छत्तीसगढी मे कई लोकप्रिय गीत लिखे है. कवि सम्मेलनों मे मधुर स्वर मे वैष्णव जी के गीत..

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मुम्बई का डॉन कौन ? - व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट च्याइला! अपून एक-एक के कान के नीचे बजाएगा, कोई भंकस नहीं मँगता है। हिन्दी साइडर लोग को वार्निंग करके बोलता है कि इधर हँसने का तो मराठी..

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-- करण समस्तीपुरी आज फुर्सत में ख्याल आने लगा, आह ! जिन्दगी में कितना कष्ट है...... काश सप्ताह में दो ही दिन होता...... शनिवार और रविवार। फिर तो फुर्सत ही फुर्सत.... मौजा ही मौजा था !! लेकिन कमबख्त होता है पूरे सात दिन। न एक दिन कम न एक दिन ज्यादा.....

मनोज

कहना तो बहुत कुछ है।
बहुत िदनों से अपने ब्लाग पर कुछ िलख्ाने की सोच रही थ्ाी पर मैं तकनीकी िदक्कतों की वजह से िलख्ा पाने आैर पोस्ट कर पाने में सक्ष्ाम नहीं हो पा रही थ्ाी। आज िफर कोिशश की है,कहना तो बहुत कुछ है लेकिन अभ्ाी मैं इस माध्यम की तकनीक में कमजोर हंु आैर यहां

इन्द्रधनुष


मेरी छोटी सी दुनिया 

कुछ चित्रों कि रंगीनियत से बुना गया पोस्ट - इस पोस्ट में डाले गए सभी चित्र मुझे बेहद खास पसंद हैं, और मेरे ही द्वारा लिए गए भी हैं.. लगभग सभी चित्र हाल-फिलहाल में लिए गए हैं, और इनमे मैंने किसी भी प्...

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विधि शिक्षा की अव्यवस्था - * निशान्तधर दुबे ने अपनी व्यथा इस तरह व्यक्त की है--* * * *सर !* मैं भोपाल विश्वविद्यालय में एलएल .एम. का विद्यार्थी हूँ। यूजीसी के अनुसार विधि महाविद्य..

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डॉ अरविंद — बड़े बड़ों की बातें! - मेरे कल के आलेख मसिजीवी का एक प्रश्न! पर डॉ अरविंद मिश्रा ने टिपियाया: बड़े बड़ों की बातें! तीन शब्द ही सही, लेकिन इस टिप्पणी को पढ कर बढा अच्छा ...

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आखिर कहां गायब हो जाते हैं दलित-आदिवासी अफसर - *दिलीप मंडल* ** कुल 88 में एक भी नहीं। ये आंकड़ा है देश की शीर्ष नौकरशाही में दलित अफसरों की मौजूदगी का। देश को चलाने वाली शीर्ष नौकरशाही यानी केंद्र स...

यही है वह जगह 

गाँव में डॉक्टर ? ना , भई ना ! - हमारे देश के डॉक्टरों ने ग्रामीण स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रस्तावित देहाती चिकित्सा पाठ्यक्रम का पुरजोर विरोध किया है । इस विरोध में हमारे देश के डॉक्टर..

राजू बिन्दास!

 इब्ने बतूता राहुल का जूता..उठाओ तो बोले चुर्र... -इब्ने बतूता राहुल का जूता..ता..उठाओ तो बोले चुर्र... आज कल हर जगह जूतों की जयकार है. भला हो इब्ने बतूता, सर्वेेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार का कि जूता राग ..

कस्‍बा qasba 

डिवाइन दुकान और आपसे चंद सवाल - होर्डिंग के ज़रिये अभिव्यक्ति की शैली को समझना एक दिलचस्प सामाजिक अध्ययन है। अपने उत्पादों को घटोत्कची फॉन्ट और रंगीन फ्लैक्स पटल पर अभिव्यक्त करती हुईं ..

अनवरत 

खूबसूरत मोर रोता है, अपने पैरों को देख कर - कई दिनों से आसमान में बादल छाए थे। लेकिन बरसात नहीं हो रही थी। तालाब सूख चुका था। पानी के लिए तालाब के पेंदे में गड्ढे बना कर काम चलाया जा रहा था। ऐसे में ..

सफ़ेद घर

ज्यादा धूप सेंकने से काम जीवन खुशहाल होता है वाली नई रीसर्च पर जनसंख्या और पर्यावरण मंत्रालय में जब ठन जाय :) - जब से वैज्ञानिकों ने एक रीसर्च कर बताया है कि वाईग्रा से ज्यादा सिर्फ धूप सेंकने से मनुष्य का काम जीवन खुशहाल रहता है तब से सडक पर तंबू गाड ..

अमीर धरती गरीब लोग

पटवारी होता तो पूरा निपट जाता मगर ये तो आईएएस अफ़सर है करोड़ो रूपये मिल गये मगर सस्पेंशन के लिये अभी तक़ रिपोर्ट का इंतज़ार है!हद है बेशर्मी की! - एक आईएएस अफ़सर बाबुलाल अग्रवाल के यंहा छापे मे करोड़ो रुपये की सम्पत्ति मिली है।उसके सस्पेंशन के बारे सरकार का कहना है कि अभी तक़ इस बारे मे कोई अधिकृत रिपोर्...

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून
कार्टून :- लोटपोट का माल...

'लोटपोट' साप्ताहिक पत्रिका मेरे पुराने कार्टून अभी भी प्रकाशित करती है

अंक 16-22 अगस्त 2009 से.

स्मृति
हवा की तरह लिपट जाती है, छाया की तरह पीछे पीछे चलती है। पुकारने पर मेरी ही आवाज़, देर तक खंडहरों में गूंजती है आज उसे क्या हुआ है,बार बार मुझे छल जाती है। प्रवंचना की ऐसी सुलगती आग । ठगिनी कितनी बार,कितने जोगी का ऱूप लेकर पर्वत की ऊंचाइयों को लांघ कर,

क्षितिज

आज की चर्चा को यहीं पर लिराम देता हूँ!

17 comments:

  1. बहुत सुंदर चर्चा...

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  2. शास्त्री जी सुंदर चर्चा
    बहुत सारे नये लिंक है। आभार

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  3. आपकी चर्चा कितनी current रहती हैं यह जानकर तो आश्चर्य होने लगा है. विनम्र आभार.

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  4. बहुत सुंदर और ताजी चर्चा.

    तामताम.

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  5. बहुत ही गजब की करते हैं आप चर्चा
    छोड़ते नहीं हैं किसी का भी पर्चा

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  6. बहुत ही मेहनत और ईमानदारी से की गई है चर्चा।

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  7. Bhai ji,
    Kya kahen kya na kahen aapka charcha manch kamaal ka laga.Dil se Badhai!

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  8. शास्त्री जी, आज पहली बात (सारथी पर आपकी टिप्पणी द्वारा) इस चिट्ठे का दर्शन हुआ. मन प्रसन्न हो गया. चर्चा का एक नया अंदाज है, और पढने के लिये चुने आलेक मिल गये.

    इस चिट्ठे के ले-आउट को थोडा बदल कर Line-width कम और padding अधिक कर दिया जाये तो और अधिक आकर्षक लगेगा.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.IndianCoins.Org

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  9. एक और सुन्दर चर्चा के लिए शुक्रिया शास्त्री जी !

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  10. शानदार चर्चा. बधाई.

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  11. bahut hi mehnat ki hai ..........sundar charcha.

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  12. बेहतरीन। लाजवाब।

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