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Friday, March 01, 2013

मंहगाई-कर जोड़, छुवें दोनों उच्चस्तर :चर्चा मंच 1170



Prabodh Kumar Govil 



हवाएँ...

डॉ. जेन्नी शबनम 







Virendra Kumar Sharma 

किसी की आँखों की नमी लिख रहा हूं......

निवेदिता श्रीवास्तव 



डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

ठगे गए हैं आम, स्वाद जीवन का खोया

Madan Mohan Saxena 
  उच्चस्तर पर सम्पदा, रहे भद्रजन लूट ।
संचित जस-तस धन करें, खुली मिली है छूट । 
खुली मिली है छूट, बटे डीरेक्ट कैश अब ।
मनरेगा से वोट, झपटता पंजा सरबस ।
लेकिन मध्यम वर्ग, गिरे गश खा कर रविकर ।
मंहगाई-कर जोड़,  छुवें दोनों  उच्चस्तर ॥ 
Aziz Jaunpuri 
 खेली खाई खासगी, खाला खालू खान । 
 गालू-ग्वाला तोपची, चॉपर गगन निशान । 
चॉपर गगन निशान, कोयला तेल खदाने । 
घुटा घुटा ले शीश, किन्तु ना घपला माने । 
मारे बम विस्फोट, व्यवस्था पब्लिक डेली । 
अपनी चाची मस्त, खून की होली खेली  ॥ 
 खासगी=निजी, अपना 
गालू=गाल बजाने वाला 
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -10 
सर्ग-2
भाग-4
जन्म-कथा 
सृंगी जन्मकथा
 रिस्य विविन्डक कर रहे, शोध कार्य संपन्न ।
विषय परा-विज्ञान मन, औषधि प्रजनन अन्न ।
विकट तपस्या त्याग तप, इन्द्रासन हिल जाय ।
तभी उर्वशी अप्सरा, ऋषि सम्मुख मुस्काय ।

खंड्पूरी खंडरा ख़तम, खखरा खेले फाग-
खोया खील खमीर खस, खंडसारी खटराग |
खंड्पूरी खंडरा ख़तम, खखरा खेले फाग |

(चन्द्र-विन्दु हैं)
खखरा खेले फाग, खाय खाँटी मंहगाई  |

घर घर *रागविवाद, टैक्स-दानव मुस्काई |
*झगडा 
खुद का सारोकार, पर्व त्यौहार विलोया  ||
ठगे गए हैं आम, स्वाद जीवन का खोया ||

खोया = दूध से तैयार मावा
खील = भुना हुआ धान / लावा
खमीर = मिठाई बनाने में प्रयुक्त होता है-खट्टा पदार्थ खस= सुगंधिंत जड़
खंडसारी = देशी चीनी
खटराग =व्यर्थ की वस्तुवें / सामग्री
खंड्पूरी = मेवा और शक्कर भरी पूरी
खंडरा = बेसन से बना तेल में छाना हुआ पकवान
खखरा = चावल बनाने का बड़ा पात्र / छिद्रमय
नोट: "खट राग" दो बार आया है-




मयंक का कोना
(१)

पिता,
चलते-चलते कभी न थकते, ऐसे होते पाँव!
  पिता देत संतान को, बरगद जैसी छाँव!!

(२) 

माँ फिर से अपना आँचल कर दो
जब दुनिया ने किया किनारा।
तब माँ मैंने तुम्हें पुकारा।।

24 comments:

  1. रविकर भाई, बधाई।

    चित्रों से भरपूर चर्चा मन भाई हुजूर।

    .............
    सिर चढ़कर बोला विज्ञान कथा का जादू...

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  2. बहुत सुन्दर और आकर्षक ढंग से की गयी स्तरीय चर्चा!
    आभार रविकर जी!

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  3. बहुत बढिया लिनक्स की चर्चा......

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  4. अच्छा सजा चर्चा मंच |भाँति भाँति की लिंक्स |
    आशा

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  5. आदरणीय गुरुदेव श्री चर्चा बेहद सुन्दर एवं प्रसंशनीय है, पठनीय लिंक्स मिले हैं सादर आभार आपका.

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  6. very nice links 2 read today. thnx 4 sharing my post.

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  7. सुंदर सूत्रों से सजी आकर्षक चर्चा बधाई रविकर भाई जी

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  8. बेहद सुन्दर पठनीय लिंक्स ,,आभार आपका.

    RECENT POST: पिता.

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  9. बेहतरीन लिंक्‍स संयोजन ... आभार

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  10. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ...आभार।।।

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  11. खूबसूरत लिंक्स के साथ सुंदर चर्चा....

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  12. खूबसूरत लिंक्स के साथ सुंदर चर्चा....

    ReplyDelete
  13. very nice.
    KAVYA SUDHA (काव्य सुधा): शिकायत

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  14. रविकर भाई बड़े जतन से सेतु सजाये हैं अर्थ पूर्ण विविध रंगी विविध अर्थी .शुक्रिया हमें शरीक करने के लिए .

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  15. गुलशन लुटा दिल का बाजार ख़तम,
    उनमें हमारे वास्ते था प्यार ख़तम,
    सोंचा थी जिंदगी थोड़ी सी प्यार की
    जीने के आज सारे आसार ख़तम,.......सोंचा शब्द यहाँ अखरता है -सोचा था ,ज़िन्दगी थोड़ी सी प्यारकी .....बेहतरीन प्रयोग कर रहें हैं आप भाव अर्थ और रूपक तथा गजल के फॉर्म पर .

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  16. बहुत सुन्दर रचना पिता के निस्स्वार्थ प्रेम को रूपायित करती -

    हमारे बीच में नही पिता,तब आया है ज्ञान!
    हर पग पर आशीर्वाद मिले,चाहे हर संतान!!

    इस पद को छोड़ सभी में "है" के स्थान पर" हैं "कर लें .रचना का सौंदर्य बढ़ जाएगा .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

    सरसी छंद
    (१६,११, कुल २७मात्राए,पदांत में दीर्घ लघु )

    चलते-चलते कभी न थकते,ऐसे होते पाँव!
    पिता ही सभी को देते है,बरगद जैसी छाँव!!

    परिश्रम करते रहते दिनभर,कभी न थकता हाथ!
    कोई नही दे सकता कभी, पापा जैसा साथ!!

    बच्चो के सुख-दुःख की खातिर,दिन देखें न रात!
    हरदम तैयार खड़ें रहते,देने को सौगात!!

    पिता नही है जिनके पूछे,उनके दिल का हाल!
    नयन भीग जाते है उनके,हो जाते बेहाल!!

    हमारे बीच में नही पिता,तब आया है ज्ञान!
    हर पग पर आशीर्वाद मिले,चाहे हर संतान!!

    ReplyDelete
  17. बहुत सुन्दर रचना है सर .लेकिन कुत्ते की पूंछ ........

    "हमीं पर वार करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)
    Mushayera


    हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
    जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

    शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
    नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।

    हमारी आग में तपकर, कभी पिघलेंगे पत्थर भी,
    पहाड़ों के शहर में हम, चमन गुलज़ार करते हैं।

    कहीं हैं बर्फ के जंगल, कहीं ज्वालामुखी भी हैं,
    कभी रंज-ओ-अलम का हम, नहीं इज़हार करते हैं।

    अकीदा है, छिपा होगा कोई भगवान पत्थर में,
    इसी उम्मीद में हम, रोज ही बेगार करते हैं।

    नहीं है “रूप” से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
    तराशा है जिसे रब ने, उसे स्वीकार करते हैं।

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  18. बहुत ही सुन्दर सूत्र

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  19. बहुत अच्छी चर्चा. मुझे यहाँ शामिल करने के लिए आभार.

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