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Wednesday, July 09, 2014

रक्त-स्वेद दोनों रिसे, धत गरीब की जात; चर्चा मंच 1669


बजट से पहले हलुआ


अमर उजाला
रविकर 
 "कुछ कहना है"
तलुआ चप्पल के घिसे, पिसे सदा दिन-रात |
रक्त-स्वेद दोनों रिसे, धत गरीब की जात |

धत गरीब की जात, नहीं औकात हमारी |
कबहूँ नहीं अघात, घात हम पर सरकारी |

कह रविकर कविराय, चाटते नेता हलुआ |
चमचे भी दो चार, चटाते चाटे तलुआ ||


रूपचन्द्र शास्त्री मयंक


जिन्दगी चल रही चिमनियों की तरह।
बेटियाँ पल रहीं कैदियों की तरह।।

लाडलों के लिए पूरे घर-बार हैं,
लाडली के लिए संकुचित द्वार हैं,
भाग्य इनको मिला कंघियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

451. इम्म्युन...

डॉ. जेन्नी शबनम 

चींटी और पहाड़

देवेन्द्र पाण्डेय 


10 comments:

  1. सुप्रभात!
    बढ़िया लिंक्स-सह-सार्थक चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  2. बहुत सुंदर बुधवारीय रविकर चर्चा सुंदर सूत्रों के साथ ।

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  3. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा के लिए आभार।

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  4. अच्छी चर्चा, बेहतर लिंक

    रेल बजट में नहीं दिखा 56 इँच का सीना !
    http://aadhasachonline.blogspot.in/

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  5. बढ़िया सुंदर चर्चा व लिंक्स , आ. रविकर सर , शास्त्री जी व मंच को धन्यवाद !
    I.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  6. "कुछ कहना है"
    तलुआ चप्पल के घिसे, पिसे सदा दिन-रात |
    रक्त-स्वेद दोनों रिसे, धत गरीब की जात |

    धत गरीब की जात, नहीं औकात हमारी |
    कबहूँ नहीं अघात, घात हम पर सरकारी |

    कह रविकर कविराय, चाटते नेता हलुआ |
    चमचे भी दो चार, चटाते चाटे तलुआ ||


    बहुत खूब बहुत खूब बहुत खूब -चमचे भी दो चार चटाते तलुवा

    नेता मेरा भडुवा

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  7. बेहतरीन चर्चा मंच हर मायने में।

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  8. मार्मिक रचना बेटियों पर -


    "पल रहीं कैदियों की तरह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

    उच्चारण

    जिन्दगी चल रही चिमनियों की तरह।
    बेटियाँ पल रहीं कैदियों की तरह।।

    लाडलों के लिए पूरे घर-बार हैं,
    लाडली के लिए संकुचित द्वार हैं,
    भाग्य इनको मिला कंघियों की तरह।
    बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

    ReplyDelete
  9. उपयोगी लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा।
    आपका हृदय से आभार रविकर जी।

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