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Tuesday, June 09, 2020

"राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।" (चर्चा अंक-3727)

सादर अभिवादन ।
मंगलवार की चर्चा में आप सबका हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ।आज की प्रस्तुति आरम्भ करते हैं
हिंदी के प्रख्यात आलोचक, लेखक और विद्वान स्मृतिशेष डॉ नामवर सिंह की कविता के अंश से --
दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध-सा
मेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है ।
यहाँ एक ही सत्य सहस्र शब्दों में विकसा
रूप रूप में ढला एक ही नाम, तोष है ।।
***
आइए अब बढ़ते हैं आज के चयनित सूत्रों की ओर -
सवाल पर सवाल हैं, कुछ नहीं जवाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।
--
गीत भी डरे हुए, ताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुए, किन्तु शेष आस हैं,
दो नयन में पल रहा, नग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।
***
एक तरफ हैं हालातों के घुड़सवार,
जिरहबख्तर पहने और
हाथों में है लपलपाती तलवार
तो दूसरी तरफ,
मजबूरियों की पैदल लंबी कतार,
इन्द्र छद्म वेश में फिर आकर
ले गए छल से
कवच कुंडल का देवदत्त उपहार
***
रात में फैसला हो गया कि दोनों लछमन के बेटे के संग चली जाएँगी. अच्छा सा दिन देख कर दोनों को विदा कर दिया गया. अगले साल ही अच्छी खबर आ गई कि रज्जो और छोटी दोनों के लड़के पैदा हुए हैं. चार महीने बाद रज्जो बच्चे को लेकर अपने माँ बापू से मिलने गाँव आई.
 पर रज्जो फिर कभी वापिस नहीं गई. 
***
अकसर हम पुल‍िस को या प्रशासन को क‍िसी भी नाइंसाफी के ल‍िए दोष दे देते हैं या क‍िसी नीत‍ि के बेमानी होने पर शासन को कठघरे में ले आते हैं, इससे भी आगे एक झटके में सारे नेताओं को भ्रष्ट, नाकारा और चोर बताने से नहीं ह‍िचकते परंतु जब बात हमारे अपने स्वार्थों पर आती है तो इसी ”नाकारा और चोर तंत्र” से येन केन प्रकारेण कथ‍ित तौर पर ”मदद” लेने से भी नहीं चूकते।
***
तेरी बात - बात सोचूँ  मैं और यूँ ही दिल भरा करूँ,
तेरी चाहतों की याद को, मैं उदासियों से हरा करूँ।
कभी धूल है, कभी शूल है, कभी भारी कोई भूल है
के ये मन शरद का फूल है, इसे कैसे मैं हरा करूँ।
***
सिवाना दुर्ग राजस्थान के प्राचीन दुर्गो मे से एक है राजस्थान के इस भू भाग पर करीब 10 मील दूरी पर कोई न कोई किला या दुर्ग जरूर मिल जाएगा इन्ही दुर्गो या किलो के कारण राजस्थान का इतिहास बहुत प्राचीन रहा है दुर्गो व किलो मे सिवाना दुर्ग का इतिहास बहुत प्राचीन है यह दुर्ग भी एक पहाड़ी पर बनाया गया है ।
***
हमसे किया है
हमीं पर आज़माना
मोहब्बत की बातें
किसी और को ना बताना।
***
लॉकडाउन -5 ने मुझे लगभग तीन दशक पश्चात यहाँ मीरजापुर में पुनः 'अनलॉक' होने का   स्वर्णिम अवसर दिया है। मैं ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर भी वर्षों से प्रातः भ्रमण का आनंद नहीं उठा पाया रहा था, क्योंकि अपनी संघर्ष सहचरी साइकिल संग अख़बार वितरण के लिए निकलना होता था।
***
मत भूलो अनलॉक में, लॉकडाउन के लाभ।
स्वच्छ हुआ पर्यावरण, धरा हुई हरिताभ ।।
हम यदि रहें सचेत तो, रहे प्रदूषण दूर।
हमें सुनाई दे सदा, नदियों का संतूर।।
***
एक ताजातरीन मुद्दा इन दिनों मीडिया पर छाया है । सरकारें फिर से एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रही है। बुद्धिजीवी बहस कर रहे है । मजदूरों के पलायन से सभी का थोड़ा ध्यान भटका है और यह  मुद्दा है एक मादा हाथी और उसके अजन्मे बच्चे की मृत्यु या हत्या का ।
***
प्रेम का प्रसार हो जी, सुखी संसार हो जी। 
स्नेह बीज रोपने हैं, हाथ तो बढ़ाइये। 1।
दुख दर्द सोख ले जो, वैमनस्य रोक ले जो। 
छाँव दे जो तप्तों को, बीज वो लगाइए। 2।
***
क्या यूँ ही उगेगा सूरज,
यूँ ही डूब जाएगा,
क्या यूँ ही खिलेंगे फूल 
और यूँ ही मुरझा जाएंगे?
***
पहली बार किसी सैनिक को ससम्मान उसके घर छोड़ने गया था।  घुटन अभी भी धड़कनों से रिस रही थी। सांसें स्वयं से द्वंद्व करतीं  नज़र आईं। सफ़र में कुछ पल ठहरे थे एक और जवान के घर। 
वहीं से कुछ प्रश्न ज़ेहन में खटक गए। 
 अंतरद्वंद्व  के चलते आख़िर बैठे-बैठे मैं  पूछ ही बैठा-
"तुम्हारी पत्नी के हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं।
***
शब्द-सृजन-25 का विषय है- 
'रण' 
आप इस विषय पर अपनी रचना 
(किसी भी विधा में) आगामी शनिवार (सायं 5 बजे) 
 तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म (Contact Form ) के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।
चयनित रचनाएँ आगामी रविवासरीय चर्चा-अंक में प्रकाशित की जाएँगीं। 
***
उदाहरणस्वरूप कविवर अज्ञेय जी की
 एक कविता-
--
"वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ?
तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ?
हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर-
पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ?
मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ?
कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ?
शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी दीपक-
आरति को ठहरें या रण-प्रांगण में जाएँ?"
दिल्ली जेल, सितम्बर,1931
साभार : कविता कोश 
****
आपका दिन शुभ  हो ,फिर मिलेंगे...
🙏🙏
"मीना भारद्वाज"

13 comments:

  1. मीना जी,
    आप ने हमेशा उत्साह बढ़ाया हे और अपने स्नेहिल शब्दों से प्रोत्साहित किया है

    दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध-सा
    मेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है ।

    भूमिका बहुत सार्थक और आकर्षक भी

    सभी लिंक्स एक से बढ़ कर एक। ..अभी कुछ ही पढ़ पायी हूँ। .धीरे धीरे पहुँचती हूँ सब तक
    सुन्दर प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम।।।।।।रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए

    मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार।

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  2. जी मीना दी,बहुत सुंदर भूमिका और प्रस्तुति । कालजयी रचनाओं के मध्य सभी लिंक्स अच्छे हैं।
    मेरी सृजन संघर्ष सहचरी साइकिल के अंतिम भाग को भी आपने स्थान दिया है। इसके लिए आपका अत्यंत आभारी हूँ और इस मंच का भी।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति. मेरी कविता शामिल करने के लिए आभार.

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  4. शानदार लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीया मीना भारद्वाज जी।

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  5. बढ़िया प्रस्तुति।

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  6. बहुत सुंदर चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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  7. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आदरणीय मीना दीदी. बेहतरीन रचनाएँ चुनी हैं आपने. मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु सादर आभार.

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  8. बहुत बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति

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  9. रज्जो का ब्याह रज्जो का ब्याह :मानसिक कुहांसे को आवज़ देती सशक्त रचना एक गुहार है मन की यह कथा।
    veeruji05.blogspot.com
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com

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  10. नहीं, बिल्कुल भी नहीं। ये एक असाधारण तथ्य है । ये तो एक गूढ़ रहस्य है जो वो हथिनी शायद जानती थी। मैं नमन करती हूँ उसकी असीम शक्ति को जो मुझे सीखा गयी कि अपनी पीड़ा को अपनी सहनशक्ति से पार मत जाने देना। मूक हो जाना ,ये तुम्हे बल देगा जबकि क्रोध तुम्हे निर्बल करेगा। कुछ पीड़ाओं को एकदम निजी रखना। नतमस्तक हूँ मैं उस देवीस्वरूपा के आगे । मेरी स्मृतियों में वो सदैव रहेगी। मुझे मार्ग दिखाने वाले चुनिंदा लोगों के रुप में।

    मार्मिक प्रस्तुति -हाथी एक बुद्धिमान प्राणी है यह सिखाता है बल बुद्धि विवेक का इस्तेमाल। जब तक हाथी पे हमला नहीं किया जाता यह हमलावार नहीं बनता। आत्म रक्षा में ही ऐसा करता है मानवीय संवेदना और सरोकारों को गणेश भगवान् से ज्यादा कौन बूझता है। हमारे पर्यावरण के ये पहरुवे अपनी गोबर से नव पौध अंकुरित करते चलते हैं बीज का यह अंतरण करते है। केरल की घटना रक्तरँगी नास्तिक लेफ्टीयों की निगरानी में घट सकती है ,घटती रहीं हैं वाहन ये प्रायोजित हत्याएं। हथनी के दांत दिखाऊ नहीं होते। एक गज समूह का नेतृत्व हथनी के हाथों में रहता है।

    veeruji05.blogspot.com

    veerujan.blogspot.com

    veerujialami.blogapot.com

    kabirakhadabazarmein.blogspot.com

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  11. बहुत सुंदर चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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  12. 'रज्जो का ब्याह' शामिल करने के लिए धन्यवाद.

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  13. बहुत बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति.. मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया 🙏

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