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Wednesday, June 03, 2020

"ज़िन्दगी के पॉज बटन को प्ले में बदल दिया" (चर्चा अंक-3721)

मित्रों!
       मोदी सरकार ने अनलॉक-1 को लेकर गाइडलाइंस शनिवार को जारी की। देश में सभी चीजों को चरणबद्ध तरीके से खोला जाएगा। लेकिन कंटेनमेंट जोन्स में 30 जून तक पाबंदियां जारी रहेंगी। राज्य अपने मूल्यांकन के मुताबिक पाबंदियां लगा सकते हैं. कंटेनमेंट जोन में जो चीजें खुलेंगी, उनके लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स (SOPs) जारी करेगा।
गाइडलाइंस के मुताबिक, फेज 1 के अंदर धार्मिक स्थान या लोगों के लिए प्रार्थना की जगहें 8 जून से खुलेंगी। इसके अलावा होटल, रेस्टोरेंट और दूसरी होस्पिटेलिटी सेवाएं भी इसी दिन से खुलेंगे। शॉपिंग मॉल को भी 8 जून से खुलने की मंजूरी होगी।
फेज 2 में स्कूल, कॉलेज, शैक्षणिक, ट्रेनिंग, कोचिंग संस्थान आदि को राज्य, केंद्र शासित प्रदेशों की सलाह के साथ खोला जाएगा। गाइडलाइंस के मुताबिक, राज्य सरकारें  फीडबैक के आधार पर इन संस्थानों को दोबारा खोले जाने का फैसला जुलाई के महीने में करेंगे। देशभर में लोगों की आवाजाही पर रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक रोक रहेगी। इसके अलावा 65 साल की उम्र से ज्यादा के लोगों, गर्भवती महिलाओं और 10 साल से छोटे बच्चों को घर पर रहने की सलाह दी गई है. 
हम सब देशवासियों को लॉकडाउन 5.0 का पालन करना चाहिए।
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अब देखिए बुधवार की चर्चा में  
मेरी पसन्द के कुछ लिंक... 
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गीत  

"कनेर मुस्काया है"  

आया चलकर खुला खजाना,
फिर से आज कुबेर का।
निर्धन के आँगन में पनपा,
बूटा एक कनेर का।
कोमल और सजीले फूलों ने,
मन को भरमाया है।
लू के गर्म थपेड़े खाकर,
फिर कनेर मुस्काया है।। 
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कुछ पंछी 

तारों भरी रात शीतल आकाश में कुछ पंछी
 डैने सिकोड़े निकले हैं उन्मुक्त उड़ान पर। 
नींद में ऊँघता है जब पृथ्वी का कण-कण 
तब गंत्तव्य में ढूँढ़ते हैं अनुत्तरित प्रश्न । 
गूँगी गुड़िया पर अनीता सैनी  
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ज़िन्दगी के पॉज बटन को प्ले में बदल दिया 

लॉकडाउन 4 का अंत हुआ या समापन, ये सभी लोग अपने हिसाब से तय कर लें. आज एक जून से अनलॉक किये जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई. कुछ लोगों का ऐसा विचार बना हुआ था कि लॉकडाउन अभी बढ़ेगा. कुछ लोगों ने अब इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी कि अभी लॉकडाउन हटना नहीं चाहिए था. कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि अब जबकि संक्रमितों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई है तो लॉकडाउन हटाना सही नहीं. ये वही लोग हैं जो घोड़े और बाप-बेटे वाली कहानी में थे. जिन्हें किसी भी स्थिति में चैन नहीं आ रहा था. बहरहाल, अनलॉक किये जाने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद नागरिकों की जिम्मेवारी है कि वे संयम से रहना सीखें. 
राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  
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मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल  

[ भाग -2] 

पिछले लेख की की प्रतिक्रिया में " ब्लॉग जगत की मीरा" की उपाधि से विभूषित कवयित्री मीना दीदी ने मुझे यह एक उपयोगी परामर्श दिया था-" प्रिय शशिभाई, आपकी साइकिल भी आपकी तरह स्वाभिमानी है,आपने स्वयं उसका दर्द समझ लिया तो ठीक वरना वह मौन रहकर सब सहती रहेगी। अब उसको ठीक कराइए। काम के लिए नहीं तो थोड़ा बहुत घूम फिर आने हेतु उसका प्रयोग कीजिए।" उनकी प्रतिक्रिया निश्चित ही मुझे चौंकाने वाली रही।सो,अपने अतीत और वर्तमान को टटोलते हुये स्वयं से यही प्रश्न कर रहा हूँ-" मैं और यह मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल क्या कभी सुख के साथी भी रहे हैं ?" 
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खामोशी ! 


बेटियों के उदास चेहरे

अच्छे नहीं लगते
माँ के कलेजे में हूक उठती है।
फिर भी
वो खामोशी से सह जाती हैं
पूछने पर
"कुछ नहीं माँ बेकार परेशान रहती हो।
बस थोड़ी सी थकान है।" 
hindigen पर रेखा श्रीवास्तव  
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जड़ें 

एक पेड़ का 
धराशायी होना,
टूट कर गिरना,
हतप्रभ कर देता है ।
एक सदमे की तरह
आघात करता है ।
कुछ तोड़ देता है
अपने भीतर ... 
नूपुरं noopuram 
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मेरी कलम की स्याही सूख गई है 

मेरी कलम की स्याही सूख गई है
क्या यह कोई अजूबा है ?
नहीं यह एक तजुर्बा है
जब मन ना हो कुछ लिखने का
अपने विचार व्यक्त करने का
तब कोई तो बहाना चाहिये...
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 सीता की पीर 

1. 
राह अगोरे  
शबरी-सा ये मन,  
कब आओगे?  
2. 
अहल्या बनी  
कोई राम न आया  
पाषाण रही। 
लम्हों का सफ़र पर डॉ. जेन्नी शबनम  
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मौलिकता भ्रम से इतर कुछ भी नहीं .. 

मौलिकता अनैतिक भ्रम से इतर कुछ भी नहीं. एक साहित्यकार पूरा जीवन पढ़ने-लिखने में खपा दे, घट-घट भटके, अनुभवों की गंगा पार कर ले तो भी जीवन के अंत तक वह कुछ भी मौलिक नहीं लिख सकता है. कुंवर नारायण यह कहकर जा चुके हैं. उनसे पहले भी कई लोगों ने यही कहा है, उनके बाद भी कई लोग यही कह रहे हैं. आगे भी लोग यही कहेंगे... 
वंदे मातरम् पर Abhishek Shukla  
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हम सेवी.. तुम स्वामी 

हम सेवी। तुम स्वामी ।।  
मुख तेरा । अभिरामी।। 
~Sudha Singh vyaghr~  
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लौट चलें पैदल ही 

"माई अब कमाने के लिए कोई और रास्ता सोचना पड़ेगा! अकेले की कमाई से तो घर चलाना बहुत मुश्किल है। सही कहा बेटा!तेरे बापू के जाने से कमाई कम हो गई, ऊपर से सुगना की पढ़ाई का खर्चा.. कैसे उसका ब्याह होगा? क्या करें उसकी पढ़ाई छुड़वा दें? अरे नहीं-नहीं माई! क्या बोल रही हो! लोग क्या कहेंगे कैसा भाई है बहन को पढ़ा भी नहीं सका... 
Anuradha chauhan  
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जलता है अंगार प्रिये 

हाहाकार मचा उर अंतर जलता है अंगार प्रिये  
लावा बहता पीड़ा बनकर एक तड़प साकार किए... 
Abhilasha 
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करेला नीम चढा... 

'परचेत' पर पी.सी.गोदियाल "परचेत"  
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मील के पत्थर 

ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।  
पत्थर नहीं तुम हो गतागत ज्ञान दाता।  
है प्रीत जिसको लक्ष्य से वह जान पाता।  
किस दिशा में और कितना है गमन।  
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन... 
विमल कुमार शुक्ल 'विमल' 
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दस्तक.... 

सुनो मनुष्य!
समरसता की आस में
थक चुकी रोष से भरी 
प्रकृति के प्रतिकार का
क्षणांश नाद ही
महाविनाश के
मौन पदचाप की
दस्तक है। 
मन के पाखी पर Sweta sinha  
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फिरोजी चुन्नी 


अंकिता उसे दूर से देखते ही पहचान गयी, दौड़कर अविनाश के पास आयी और हाथ पकड़कर बोली, तुम आ गये, उसने कहा "तूम्हारे सामने खड़ा हूं"

अविनाश ने अपने बैग से एक पैकेट निकालकर अंकिता को देते हुए कहा, मम्मी ने तुम्हारे लिए भेजा है, खोलकर देख लो"

अंकिता ने पैकैट खोला 

अरे वाह "फिरोजी रंग की चुन्नी" और वह बहुत देर तक रोती रही.. 
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पानी बिन जीवन नहीं  

(दोहे) 

 बूँद बूँद है कीमती,जल की कीमत जान।  
पानी बिन जीवन नहीं,सच को ले पहचान।।  
भीषण गर्मी से तपे, सभी दिवस बन जून।  
जीवन की किलकारियाँ,बिन पानी सब सून।। 
Anuradha chauhan 
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गौण 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा  
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सच्ची घटना :  

जब हैजा से अयोध्या वाले 'महात्मा जी' मरे 

यह किस्सा वर्ष 1940 का है। तब पूरे देश में हैजा महामारी फैली थी। इलाज नहीं होने और छूत रोग के चलते यह जानलेवा बीमारी तेज से पसरी। शायद ही कोई गांव रहा होगा, जहां से रोज लाशें नहीं निकलती होंगीं। ग्रामीणों में दहशत के कारण गजब का भ्रम हो गया था। संक्रमित आदमी के पास जाने से ही नहीं, डरकर कल्पना करने या नाम लेने से भी यह बीमारी किसी को अपने चंगुल में जकड़ लेती। मृतक के घर पड़ोसी का जाना तो दूर की बात थी। घर वाले भी पास नहीं फटकते थे। बीमार कितनी खतरनाक थी। इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं। जिसको भी यह बीमारी लगती। अचानक से आठ-दस बार पतला दस्त होता। उल्टियां होतीं... 
अंजोरिया Anjoriya पर श्रीकांत सौरभ  
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आज के लिए बस इतना ही... 
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13 comments:

  1. बहुत ही शानदार आज के चर्चा मंच की पोस्ट और हमारी पोस्ट को शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय शास्त्री जी

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  2. गुरुजी, मंच पर सुंदर चर्चाओं के मध्य मेरी रचना " मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल [ भाग -2]" को स्थान देने के लिए हृदय से आपका अत्यंत आभार । यह लेख नहीं मेरी अनुभूति है।

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  3. बेहतरीन भूमिका के साथ सुंदर संकलन एवं प्रस्तुति 👌 सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार आदरणीय 🙏🙏 सादर

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  4. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय सर. कुछ पँछी को स्थान देने हेतु सादर.

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  6. विविधता पूर्ण सूत्रों से सजी बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

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  7. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति, मेरी रचनाओं को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।

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  8. मंच पर स्थान देने के लिए हार्दिक आभार, शास्त्रीजी.
    विविध और रोचक रचनाओं का मेला-सा लगा है.
    सभी को बधाई !

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  9. शानदार चर्चा, आभार शास्त्री जी। आजकल ब्लॉग टिप्पणी मे दिये गये लिंक पर क्लिक करने पर चर्चा मंच नहीं खुलता।

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  10. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  11. बहुत खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

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  12. बहुत सुंदर लिंक संयोजन
    आपको साधुवाद
    सम्मिलित सभी रचनकारों को बधाई
    मुझे सम्मिलित करने का आभार
    सादर

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