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Friday, July 24, 2020

"घन गरजे चपला चमके" (चर्चा अंक 3772)

सादर अभिवादन ।
शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सब गुणीजनों का हार्दिक स्वागत है ।आज की चर्चा का शुभारंभ
स्मृतिशेष सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" की कलम से निसृत "नदी के द्वीप" कवितांश से  -
कई हरे-भरे द्वीप अवश्य ही होंगे
व्यथा के गहरे और फैले सागर में
नहीं तो थका-हारा सागरिक
कभी ऐसे यात्रा करता न रह सकता।
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इसी के साथ बढ़ते हैं
आज की चर्चा के चयनित सूत्रों की ओर-
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जो कल तक गुमनाम थे, आज हुए सरनाम।
सूरत-सीरत से नहीं, श्रोताओं को काम।।
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बहुत जरूरी है नहीं, वाणी का लालित्य।
गुणी परखते हैं यहाँ, कवियों का साहित्य।।
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लगते बहुत सुहावने, बाहर से सब ढोल।
लेकिन सुर हैं खोलते, यहाँ सभी के बोल।।
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डर ! एक भावना है। किसी संभावित खतरे की उपस्थिति या आभास की वजह से दिलो-दिमाग व शरीर पर भी असर डालने वाले ख्यालों या विचारों की श्रृंखला को डर कहा जा सकता है। जो अन्य भावनाओं की तरह जन्म के साथ प्राणियों को नहीं मिलती, उसका रोपण समय के साथ-साथ होता या करवाया जाता है !
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दौड़ते पानी से गलियाँ सिकुड़ी 
धुल गए वृक्ष झरते पानी के अनुराग से।
 धरणी की शोभा सुशोभित हुई 
नव किसलय के शृंगार से।
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घटना का आधार बनाकर प्रदेश सरकार ने पूरे प्रदेश के नियमित शिक्षकों की जाँच हेतु समितियाँ बना दीं। ऐसा लगा जैसे प्रदेश में फर्जी नियुक्ति पाने वाले एकमात्र शिक्षक ही हैं। पूरे प्रदेश में यदि फर्जीवाड़ा जाँचा जाए तो सभी स्तर पर मिल जाएगा। एक-दो नहीं सैकड़ों लोग अलग-अलग नौकरियों में फर्जी नियुक्ति के आधार पर, फर्जी कागजों के आधार पर काम करते मिल जायेंगे।
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पंचाक्षर स्त्रोत
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय ।।1।।
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मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै मकाराय नम: शिवाय ।।2।।
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स्वर्गीय दुबे  ने , वातावरण कितना भी बोझिल हो,संकट चाहे जितना भी गंभीर हो, ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन का भरपूर आनंद लिया और साथ ही सम्मुख खड़े व्यक्ति के अधरों पर भी मुस्कान लाने का प्रयत्न किया।
 उनकी जब भी और जहाँ भी मुझसे मुलाकात हुई, वे तपाक से बोल उठते थे-" का शशि ! तनिक मुसकिया द भाई।"
जीव-जंतु की जीवनदात्री
वसुधा ही सब में प्राण भरे।
पाषाण हृदय के मानव ही
माँ को आभूषण हीन करे।
सोच रही है आज धरा भी
दिया दूध का जिसको प्याला।
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मधुश्रावणी का त्योहार
घन गरजे चपला चमके
नभ से छम-छम जल बरसे
गाये मस्त पवन मल्हार
मधुश्रावणी का त्योहार....
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रचना जो सुन्दर हो गयी कर भी सुन्दर हो गया
संवेदना की बस्तियां,नारी -नर भी सुन्दर हो गया -
सतनाम की, श्री राम की ,रहमान की गरिमा रहे ,
प्रीत की धुन अभिसरित वो घर भी सुन्दर हो गया -
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देश के इतिहास में अनेक बार विस्तारवादी शक्तियों ने न केवल भौगोलिक-राजनैतिक आक्रमण किए वरन् देश की सांस्कृतिक संरचना को भी विच्छिन्न करने का प्रयास किया । इन परिस्थियों में उन महान संतों ने ही देश की सुप्त चेतना को जागृत कर मानवतामूलक धर्म का संदेश दिया ।
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मंदि‍र के अलावा झरना हमें खींचने लगा। पि‍छली बार गई थी तो इतना पानी नहीं था। शायद बरसात की वजह से घघारी नदी, जि‍से जमुनी नदी भी कहा जाता है, पानी से लबालब भरा था। इस लाॅकडाउन में भी प्रसाद की दुकानें सजी हुई थी। 
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अनाज उगाने की जिम्मेदारी है
कारखाना चलाने की जिम्मेदारी है
सेवा करने की लाचारी है
सब आम आदमी के लिए है .
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मेरी लिखावटों के पीछे
दरार है
हाथ कांपते हैं मेरे
तेरा नाम लिखने से पहले
हाँ यहीं तो प्यार है
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राम से द्रोह कर उन्हें काल्पन‍िक बताने वाले न कभी जानेंगे और ना ही जानने का प्रयास भी करेंगे क‍ि आख‍िर राम को जन जन का बनाने वाली वाल्म‍िकी रामायण का आरंभ कैसे हुआ, वे कौन से प्रश्न थे ज‍िनसे वाल्म‍िकी प्रेर‍ित हुए राम कथा ल‍िखने को। वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग इसका प्रमाण है।
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भरता जाता है भीतर 
जगत का साजोसामान 
सुंदर स्थान...रिश्तों का सम्मान 
पर खाली का खाली ही रहता है 
फिर लगाता है उसमें अवरोध 
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शब्द-सृजन-31 का विषय है-
'पावस ऋतु'  
आप इस विषय पर अपनी रचना
(किसी भी विधा में) आगामी शनिवार(सायं 5 बजे) तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर
संपर्क फ़ॉर्म (Contact Form ) के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।
चयनित रचनाएँ आगामी रविवारीय अंक में प्रकाशित की जाएँगीं।
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आपका दिन शुभ और मंगलमय हो,फिर मिलेंगे…
🙏🙏
"मीना भारद्वाज"
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9 comments:

  1. आज की भूमिका पढ़ , एक गीत याद आ गया--

    हम पानी के कतरे
    गहरा सगर ये जग सारा
    इसका नाम है जीवन धरा
    इसका कोई नहीं किनारा।

    सत्य भी यही है कि जीवन एक यात्रा है, जो अनेक भूलभुलैयों से हो कर गुजरता है। कौन सा मार्ग मिलेगा,कौन सा द्वीप मिलेगा.. ? यह पूर्व निश्चित नहीं है। निरंतर यात्रा से हम थक भी जाए, फ़िर भी ठहर नहीं सकते, क्योंकि ठहराव का अर्थ मृत्यु है। अतः हमें स्वयं को इस जीवन सरिता का बहते जाना है, बढ़ते जाना है।

    मेरे संस्मरण लेख ' दुनिया में आकर जग को हँसाया' को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हृदय से आभार मीना दीदी जी।

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  2. चर्चा का शुभारंभ स्मृतिशेष सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" की निसृत "नदी के द्वीप" कवितांश से सराहनीय आदरणीय दी।
    साथ ही बेहतरीन प्रस्तुति।मेरे सृजन को स्थान देने हेतु तहे दिल से आभार।
    सादर

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  3. अद्यतन और पठनीय लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
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    आपका आभार आदरणीया मीना भारद्वाज जी।

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  4. जीवन यात्रा में द्वीप मिलते हैं सभी को कभी छोटे कभी विशाल कभी सूने कभी शोर से भरे... और विश्राम पाकर पल भर पथिक चल पड़ता है आगे, शायद हर जन्म एक यात्रा है और हर मृत्यु एक द्वीप ... बेहतरीन रचनाओं का संकलन, आभार मुझे भी आज की चर्चा में शामिल करने हेतु मीना जी !

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  5. अच्छी रचनाओं का सुंदर संकलन ।
    आभार आपका ।

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  6. सबसे पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद मीना जी, क‍ि आपने मेरी ब्लॉगपोस्ट को अपने इस नायाब संकलन में शाम‍िल क‍िया। सभी पोस्ट देखी बहुत ही उम्दा हैं। आभार

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  7. अनुपम रचना प्रस्तुति

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  8. सराहनीय प्रस्तुति

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  9. जीवनदर्शन समझाती सुंदर पंक्तियों के साथ बेहतरीन लिंकों का चयन मीना जी,सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं

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