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Tuesday, June 15, 2021

"ख़ुद में ख़ुद को तलाशने की प्यास है"(चर्चा अंक 4096)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीया सधु चंद्र जी  की रचना से )

यदि खुद खुद को तलाशने की प्यास जग जाए तो खुद को पा लेना निश्चित है.... 

खुद को पा लिया तो जीवन धन्य हुआ.....

मगर, खुद पर नजर ही तो नहीं पड़ती 

कमबख्त ये नजर, दुसरो से हटती जो नहीं....

चलिए, एक बार खुद को  तलाश कर खुद से मिलने की कोशिश करते है.....


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ख़ुद में ख़ुद को तलाशने की प्यास है


धुंधली ज़मी 
लदी अस्तित्व(धूल) से 
धूल में नहा कर ।
धूल, धूलि, गोधुलि में 
धवल  करने आस है ।
मुझे ख़ुद में ख़ुद को 
तलाशने की प्यास है।


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अन्न फल से संतुष्ट कहती

मिट्टी भी हितकारी हो।

सपरिवार हम सबके लिए

हर पल मंगलकारी हो।


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एक सख्त सजा चाहता हूँ



मैं 
तुम्हारे कटे 
शरीर पर 
मौन नहीं
एक 
सख्त सजा चाहता हूँ
तुम मांगो या ना मांगो...।


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जीवन का यह भेद जानकर ही 

मन का कमल खिलेगा 

वह पूर्ण है तो पूर्णता में ही उसे खोजना होगा 

कोई भी अभाव न खले भीतर 

तभी एक क्षण के लिए भी 

वह हाथ नहीं छोड़ेगा !



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 एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ --



       लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,

आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।

नम्रता की क्यों कमी है,”अहम’ क्यॊ इतना भरा है

सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।


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उस पार से इस पार तक - -




मरना सब कुछ यहाँ, हमारी है - -
लाचारी, पुल के उस पार से
इस पार तक है मुख़्तसर
सफ़र अपना, न कोई
टिकट, न पास
है किराया,
रेलसेतु
के उस पार उतर चली है धूसर सांझ
की छाया।


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उमड़ घुमड़ बरसे मेघा



प्रिय के बिन सूना नैन मेरा
और लूट लिया है चैन मेरा
बिरहा में हम तड़पे मेघा

कोई राह निकालो जतन करो
मोरे पिय से मोरा मिलन करो

दिन रैन नहीं कटते मेघा


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मैं बदरी कान्हा की सहेली!



सूर्य ताप ठंडा

आशा

हवा हवा की बिजली

कुलाचें नभ ठनती

कभी भी जैसे 

बिछी गगन गदेली।।


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बैठे-बैठे पैर क्यों नहीं हिलाना चाहिए?




अक्सर जब बच्चे बैठे-बैठे पैर हिलाते है, तो बड़े बुजुर्ग उन्हें पैर हिलाने के लिए मना करते है। पहले के जमाने में बच्चे बड़ों की हर बात बिना तर्क वितर्क के मान लेते थे। लेकिन आजकल के बच्चों को जब भी कोई कार्य करने से मना किया जाता है, तो उन्हें वाजिब कारण बताना बहुत ही जरूरी हो जाता है। क्योंकि आजकल के बच्चों को जब तक कोई भी कार्य क्यों नहीं करना है, यह नहीं बताया जाता है, तब तक वे उस बात को मानते नहीं है। 


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पहला हिस्सा पर्यावरणविद् स्व. सुंदरलाल बहुगुणा जी पर केंद्रित रहेगा। 

- दोस्तों पिछले दिनों पर्यावरणविद् आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी का स्वर्गवास हो गया, वे हममें प्रकृति संरक्षण की एक गहरी समझ बो कर कर गए हैं, उसे किस तरह से अंकुरित और पल्लवित करेंगे हमें तय करना है, आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी पर आप आलेख भेज सकते हैं, उनके साथ संस्मरण, कोई सीख, कोई बात जो आपको उनके विषय पर लिखने को विवश कर दे...। 


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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे...

आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें 

कामिनी सिन्हा 

14 comments:

  1. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, कामीनी दी।

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  2. खुद को तलाशने का सफर जितना जरूरी है उतना ही रोचक भी. आज के अंक में पठनीय रचनाओं का संकलन है, आभार !

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  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ।
    उम्दा चर्चा ।

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  4. बहुत आभारी हूं आपका कामिनी जी।

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  5. कामिनी जी मेरी कविता को आपने सम्मान दिया इसके लिए आपको साधुवाद। सभी रचनाकारों को भी मेरी ओर से खूब बधाई।

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  6. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति

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  7. कामिनी जी,सादर नमस्कार !
    श्रमसाध्य कार्य तथा सुंदर चर्चा अंक सजाने के लिए आपको कोटिशः नमन । मेरी रचना का चयन करने के लिए आपका बहुत शुक्रिया.. शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह ।

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  8. असाधारण संकलन, सप्तरंगी भावनाओं से अलंकृत, सभी रचनाएँ अपने आप में अद्वितीय हैं मुग्ध करता हुआ चर्चामंच, मुझे शामिल करने हेतु असंख्य आभार आदरणीया - - नमन सह।

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  9. शीर्षक और भूमिका दोनों बहुत ही प्रेरक ।
    शानदार प्रस्तुति हर लिंक आकर्षक ज्ञानवर्धक, इस गुलदस्ते में मेरी रचना सजाने के लिए हृदय तल से आभार।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    सादर, सस्नेह।

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  10. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति।
    सभी को बधाई।
    सादर

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  11. चर्चा मंच पर उपस्थित होने के लिए और सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार आप सभी को

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  12. बहुत खूबसूरत चर्चा संकलन

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  13. बहुत सुन्दर और श्रमसाध्य चर्चा प्रस्तुति कामिनी जी ।

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