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Wednesday, August 25, 2021

"विज्ञापन में नारी?" (चर्चा अंक 4167)

 मित्रों!

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

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गीत "लगा रहे हैं पहरों को" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

चौकीदारी मिली खेत की, 
अन्धे-गूँगे-बहरों को।
चोटी पर बैठे मचान की, 
लगा रहे हैं पहरों को।।

घात लगाकर मित्र-पड़ोसी, धरा हमारी लील रहे,
पर बापू के मौन-मनस्वी, देते उनको ढील रहे,
बोल न पाये, ना सुन पाये, 
ना पढ़ पाये चेहरों को।।
चोटी पर बैठे मचान की, 
लगा रहे हैं पहरों को।।

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एक गीत- रख गया मौसम सुबह अंगार फूलों पर 

रख गया

मौसम 

सुबह अंगार फूलों पर ।

वक्त पर

लम्बे-घने

तरु भी हुए बौने,

रेत 

नदियों में

पियासे खड़े मृगछौने,

ताक में

अजगर

शिकारी नदी कूलों पर । 

छान्दसिक अनुगायन 

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सभी को हमसे दिक़्क़त हो गई है 

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अहमद मसूद क्या कर पाएंगे पंजशीर घाटी में तालिबान का मुकाबला? 

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Nothing is easy 

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रजनी 

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उऋण 

"कन्यादान कौन करेगा..?" नेहा और नितिन की शादी के समय पण्डित जी ने कहा। दोनों की शादी मन्दिर में हो रही थी..।

"आप अनुमति दें तो मेरा दोस्त दीपेन कन्यादान करना चाहता है और वह अपनी पत्नी के साथ यहाँ उपस्थित भी है..। सामने आ जाओ दीपेन..," वर नितिन ने कहा। 

सबके सामने दीपेन के आते ही उपस्थित लोगों में खलबली मच गयी। दबे आवाज में कानाफूसी शुरू हो गयी तथा वधू नेहा और उसकी माँ भौंचक दिख रहे थे। क्योंकि दीपेन और नेहा एक दूसरे के जेरोक्स कॉपी लग रहे थे।

"यह तुम्हारा ही अंश है देवकी... जो हमें तुम्हारे सेरोगेट मदर के रूप से दान में मिल गया था..," दीपेन की माँ यशोदा ने कहा। 

"सोच का सृजन" 

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झील में चंदा नदिया- तीरे झील में उतरता हौले से चंदा बहती नदी आँचल में समेटे जीवन सदी Sapne (सपने ) 

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आओगे न तुम ? 

सुनो

मैंने चांद की

पीठ पे कुछ लिख

छोड़ा है

और

छोड़ आई हूं

चांद की आंखों  में

अपनी दोनो आंखें

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देखी समानता दोनों में 

 जीवन है फूलों की डाली
मधुर सुगंध बिखेरती 

लहराती बल खाती      

मंद वायु  के झोंकों  संग 

Akanksha -Asha Lata Saxena 

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थिर शांत झील में 

दूर कहीं जाना नहीं 

निज गाँव आना है 

संसृति को निहारा 

ध्यान अब जगाना है

मन पाए विश्राम जहाँ 

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विज्ञापन में नारी: 

क्या लड़कियां इतनी गिरी हुई है? 

आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

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जो जैसा मन जाने न वैसा 

हम जो हैं जैसे हैं, उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना होगा, क्योंकि चुनाव करने वाला मन या बुद्धि अभी स्वयं ही बंटे हुए हैं, उनके द्वारा लिया गया निर्णय अनिर्णीत ही रह जायेगा. जब मन पूर्ण विश्रांति में होगा, भीतर शुद्ध चेतना का आविर्भाव होगा.  जहाँ कोई दूसरा नहीं होता ऐसी स्थिति में स्वयं को स्वयं की अनुभूति होती है. वहाँ कोई अस्वीकार नहीं है, सब कुछ एक से ही प्रकट हुआ है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति है. ऐक्य की उस अवस्था में स्वयं को तथा जगत को वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकारने की क्षमता प्रकट होती है. 

डायरी के पन्नों से 

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नज़र के इशारे नकाबों ने खोले ... 

न महफ़िल न किस्से न बातों ने खोले.
सभी राज़ उनकी निगाहों ने खोले.
 
शहर तीरगी के मशालों ने खोले,
कई राज़ मिल के सितारों ने खोले

स्वप्न मेरे 

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बुक कैफै प्रकाशन के 

नये सेट का प्री ऑर्डर शुरू 

एक बुक जर्नल 

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कार्टून :- भारत का मौद्रीकरण 

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 

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आज के लिए बस इतना ही।

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13 comments:

  1. वंदन
    असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    अनेक उम्दा लिंक्स पढ़ने को मिले
    श्रमसाध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

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  2. सुप्रभात
    आभार सहित धन्यवाद मेरी रचना को स्थान देने के लिए आज के अंकमें
    भावपूर्ण प्रस्तुति | |

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  3. बहुत ही सुंदर सराहनीय प्रस्तुति आदरणीय सर।
    सादर

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  4. बहुत शानदार प्रस्तुति, सुंदर लिंक चयन सभी रचनाएं बहुत आकर्षक पठनीय,सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए हृदय से आभार।
    सादर।

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  5. चर्चा मंच पर आपको पुनः सक्रिय देखकर ख़ुशी हो रही है, पठनीय सूत्रों के चयन से आज का अंक सुंदर बन पड़ा है। हृदय से आभार मुझे भी इसका हिस्सा बनाने के लिए शास्त्री जी!

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  6. हार्दिक आभार आपका आदरणीय।सभी लिंक्स अच्छे।

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  7. सुन्दर एवं रोचक सूत्रों का संकलन एवं प्रस्तुतिकरण । हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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  8. बहुत सुन्दर लिंक्स से सजी चर्चा प्रस्तुति ।

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  9. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए और मेरी रचना का शीर्षक चर्चा अंक को देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  10. सुंदर सारगर्भित सूत्रों का संकलन संयोजन,आदरणीय शास्त्री जी आपको मेरा सादर अभिवादन ।

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  11. रोचक लिंक्स से सुसज्जित चर्चा। मेरी पोस्ट को चर्चा में शामिल करने के लिए हार्दिक आभार।

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  12. हार्दिक आभार आपका सर।सभी लिंक्स अच्छे।

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