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रविवार, मार्च 20, 2022

"सैकत तीर शिकारा बांधूं"'(चर्चा अंक-4374)

सादर अभिवादन 


रविवार की विशेष प्रस्तुति में आपका हार्दिक स्वागत है 

आज की प्रस्तुति समर्पित है हमारे ब्लॉग जगत की चिरपरिचित  रचनाकार
और हमारे चर्चा मंच की प्रिय चर्चाकारा 
मीना भारद्वाज जी के नाम।

 मीना जी इन दिनों शारीरिक अस्वस्थता के कारण मंच से दुरी बना रखी है 
और उनकी कमी हमें बहुत खल रही है। 
जैसे घर में एक सदस्य के ना होने से भी घर सुना लगता है
 कुछ ऐसा ही मुझे भी महसूस होता है। 

मीना जी की तारीफ क्या करूं..

शांत-सौम्य और आकर्षक सुरत...
  बच्चों सा कोमल और संवेदनशील मन..
जो ना किसी को दुःख पहुंचाना चाहता है
और ना ही खुद पर हुआ एक छोटा सा कटाक्ष ही सह पाता है... 
ऐसा व्यक्तित्व है हमारी मीना जी का
और लेखन में ऐसा जादू कि-
शब्द-शब्द बोल पड़ते हैं...
 
मीना जी एक ऐसी रचनाकार...
 जिनकी कलम से साहित्य का कोई भी विषय अछूता नहीं रहा है.... 
कम और सरल शब्दों में बहुत कुछ कह जाना ही उनकी अदा है।
 चाहे विद्या कोई भी हो उनकी लेखनी  शब्दों की ऐसी माला पिरोती है... 
जो अंतरात्मा तक को छूने में सक्षम है। 



कल कल बहते भावों को ,

शब्दों की माला में बांधूं ।

झील सतह पर हंस का जोड़ा ,

सैकत तीर शिकारा बांधूं ।।

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कल कल बहती आप की भावनाओं को मेरा अभिनन्दन है मीना जी,

भावों की ये सरिता यूं ही बहती रहें..

और हम पाठकों को यूँ ही आनंदित करती रहें... 

आप पर मां सरस्वती की कृपा दृष्टि बनी रहें

 यही कामना करती हूँ। 

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आईये मीना जी की भाव सरिता में डुबकी लगाते है और खुद को भी भाव-विभोर करते है...


"भाव सरिता"(कविता)






ऊषा रश्मियाँ लेकर आती ,

पूर्व दिशा से सुन्दर सूरज ।

स्वागत में खग कलरव करते ,

ठगी ठगी सी लागे कुदरत।।

मंजुल मुकुर प्रत्युष मनोहर ,

कैसे मैं शब्दों में बांधूं ।।

झील सतह पर हंस का जोड़ा ,

सैकत तीर शिकारा बांधूं ।।



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लेखन कार्य का उदेश्य ही यही होता है कि-समाज तक कोई न कोई संदेश पहुंचे

और आज पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने से बड़ा कोई संदेश नहीं


।। मुक्तक ।।





वृक्षों के जैसा कोई उपकारी नही है
नष्ट करना इनको समझदारी नही है।
पोषित इन के दम पर पूरा पर्यावरण
वन रक्षण क्या सबकी जिम्मेदारी नहीं है


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"विंड चाइम्स" देखने में तो एक साधारण सी घंटी ही होती है
लेकिन इसकी मधुर धुन कुदरत की सूक्ष्म भाषा को भी समझा देती है
यदि आप समझना चाहे तो...




दूर से आती …,

‘विंड चाइम्स‘ की 

घंटियों की आवाज़

बंद कमरे में भी बता जाती हैं

हवाओं का रुख...

संकेत देना कुदरत का

और फिर

संभल कर चलना 

खुद का काम है


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अंतर्मन के द्वन्द को कुछ इस तरह से वया किया है कवित्री ने....

"अन्तर्द्वन्द्व" (माहिया)


कुछ तीखी लगती हैं लोगों की बातें लगने पर दुखती हैं तुम से कुछ कहना है हो चाहे कुछ भी बस यूं ही रहना है ----------------
हाइकु के माध्यम से बहुत कुछ कहती सुंदर सृजन...

"हाइकु

हिमानी पथ
सैनिकों की टुकड़ी
कतारबद्ध ।

ऊषा लालिमा~
ब्रह्मपुत्र में जाल
डालता मांझी ।

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एक दौर आया था भयावह सा...
दिन पल महीने बस गुजर से रहे थे और मन एक पिंजरे में कैद सा...
दरवाजे पर पसरा सन्नाटा मौत सा...
उस घड़ी को बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है आपने

"त्रिवेणी"



माटी की देह से उठती  मादक गंध ,
सूर्योदय के साथ दे रही है संदेशा ।

प्रकृति की देहरी पर पावस ने पांव रख दिये हैं ।।
🍁🍁🍁


घंटे दिन में और दिन बदल रहे हैं महिनों में ,
मन के साथ घरों के दरवाजे भी बंद है ।

आरजू यही है महिने साल में न बदलें ।।


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आधुनिकता के दौर में भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच
अपनों के लिए वक़्त निकलना भी कितना मुश्किल हो गया है....

"वक्त"(लघु कथा)



दोपहर का समय और दैनिक कामों में उलझी मैं कुछ सोच रही थी
 कि मोबाइल पर कोयल की कुहूक ने ध्यान अपनी ओर खींच लिया ।
 जैसे ही कॉल अटैंड की उधर से बिना सम्बोधन के परिचित आवाज आई--'कब आओगी.. 
आठ बरस बीत गए । कल सपने में दिखी..कभी मिलने को मन नहीं करता ?'

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 दूसरे से मिलने की फुरसत नहीं चलो वक़्त मिला है खुद से ही एक मुलाकात कर लें।
               जीने की ज़द्दोज़हद में ये भी बामुश्किल ही मिलता है। 

"वक्त"(ग़ज़ल )



वक्त मिला है आज , कुछ अपना ढूंढते हैं ।
करें खुद से खुद ही बात , अपना हाल पूछते  हैं ।।

कतरा कतरा वक्त , लम्हों  सा बिखर गया ।
फुर्सत में खाली हाथ , उसे पाने को जूझते हैं ।।

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मट्टी और पानी के मिलन से उठती सोंधी खुशबु को लेखिका ने
कुछ अलग ही अंदाज़ में महसूस किया है यकीनन आप भी इस महक में खो जायेगे....

“महक”



जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी धरती पर बारिश की पहली बार बूँदें टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन में मिट्टी‎ की सुराहियों और मटकों वाला था। मुझे याद है मैं सदा नया मटका धोने की जिद्द करती और इसी बहाने उस भीनी महक को महसूस करती रहती । माँ की आवाज से ही मेरी तन्द्रा टूटती । ---------------

 "तुम्हारी तिजोरी है माँ ?'  स्नेह में डूबा लरजती आवाज में 

उनका जवाब होता -- हाँ.. तेरी नानी की भेंट है यह ।"

माँ की दी हुई छोटी से छोटी वस्तु भी एक अनमोल यादें होती है जिसे हर स्त्री आजीवन संभालकर रखना चाहती है। स्त्री मन के इसी भावना को सुंदर शब्दों में पिरोया है आपने 


"संदूक"(मन की वीथियाँ)



बहुत दिनों के बाद आज समय मिला है ..आलमारी
ठीक करने का । कितनी ही अनर्गल चीजें रख
देती हूँ इसमें और फिर साफ करते करते सलीके से  ना
जाने कितना समय लग जाता है । कितनी स्मृतियाँ
जुड़ी होती है हर चीज के साथ ..और मन है कि डूबता
चला जाता है उन गलियारों में और जब काम
पूरा होता है तो सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो
जाते हैं । ऐसे समय में  अक्सर बचपन का
घर और माँ का करीने से जँचा कमरा
घूम जाता है नज़रों के आगे ।


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चलते-चलते एक संस्मरण जो ये सोचने को मजूबर करता है
कि "सचमुच,क्या इंसान इतना स्वार्थी हो गया है "?

“एक घटना”



अक्सर महत्वपूर्ण दस्तावेज या कोई प्रतियोगी परीक्षा का फॉर्म भरते हैं तो एक प्रश्न होता है --
 “कोई शारीरिक‎ पहचान”‎ और हम ढूंढना शुरू कर देते हैं‎  माथे पर ,हाथों पर
 या घुटनों पर लगे चोट के निशान जो प्राय: सभी के मिल ही जाते है 
और याद‎ आती है उस से जुड़े घटनाक्रम की। 
मैं भी इन बातों से अलग नही हूँ बल्कि “बिना देखे चलती है ।”


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"निहारिका" मीना जी पहली पुस्तक
और दो साझा संकलन "गुलिस्तां" और "उड़ान"
परमात्मा इनका सफर यूं ही जारी रखें


मगर मेरा सफर
 आज यही तक,अब आज्ञा दे 
आपका दिन मंगलमय हो 
कामिनी सिन्हा 







11 टिप्‍पणियां:

  1. निःशब्द और अभिभूत हूँ कामिनी जी ! आज की चर्चा प्रस्तुति अनमोल धरोहर है मेरे लिए।चर्चा मंच परिवार से मिला मान भरा अपनत्व मेरी लेखन यात्रा का अनमोल तोहफ़ा है ।लम्बी खिंचती स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते मंच से दूरी मुझे भी बहुत खलती है ।आपके द्बारा सृजित नेहसिक्त प्रस्तुति और स्नेहिल सम्मान के लिए हृदय की गहराइयों से असीम आभार कामिनी जी 🙏 🙏

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    उत्तर
    1. आदरणीया मीना जी, काबिलियत किसी की प्रशंसा या सम्मान की मोहताज नहीं होती। हां ये मेरा स्नेह है आप के प्रति। और वैसे भी इस आभासी दुनिया में हम आप जैसे लोग सिर्फ और सिर्फ अपनी खुशी के लिए लिखते हैं प्रोत्साहन मिल गया तो उनका तहे दिल से धन्यवाद और प्यार मिला तो हमारा अहो भाग्य। और आप जैसी स्नेहिल सखी पाकर मैं तो खुद को भाग्यशाली मानती हूं।इसे बस मेरा स्नेह समझे बाकी आप जैसी साहित्यकार की लेखनी स्वयं बोलती है । आप के लिए ये प्रस्तुति बना कर मुझे बेहद खुशी मिली। सादर नमस्कार आपको 🙏

      हटाएं
  2. बहुत सुंदर और सार्थक चर्चा प्रस्तुति|
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी!

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर सराहनीय भुमिका ।
    मीना जी के उज्जवल साहित्य सफर के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं💐💐
    सुंदर पठनीय सूत्रों का चयन ।
    आभार कामिनी जी 💐💐

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    1. शुभकामनाओं हेतु हार्दिक आभार जिज्ञासा जी !

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  4. बहुत सुन्दर और श्रमसाध्य प्रस्तुति कामिनी जी।आज की चर्चा में मीना जी के लेखन की मनोहारी झलकियाँ आपने हमें पढ़वाई हैं ।चर्चा का लिंक सहेज लिया है । मीना दी यों ही साहित्य में अपनी लेखनी की ख़ुशबू बिखरते रहे।
    अनेकानेक शुभकामनाएँ।

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    1. शुभकामनाओं हेतु हार्दिक आभार अनीता जी !

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  5. आप सभी को हृदयतल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार 🙏

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  6. बहुत बहुत सुंदर अंक कामिनी जी,मीना जी को पढ़ना सदा ही मानसिक तृप्ति देता है कम शब्दों में गहनतम भाव रचना उनकी लेखनी की बेमिसाल विशेषता है।
    काफी रचनाएं पढ़ी हुई है पहले ही, फिर भी ताजगी का अहसास है हर सृजन में, सभी रचनाओं का चयन बेमिसाल है आपकी श्रमसाध्य श्र्लाघ्य प्रस्तुति को नमन।
    मीना जी आज किसी परिचिय का तकाजा नहीं रखती उनकी लेखनी विविध रंगों पर साहित्य की विविध विधाओं पर खूब जमकर चलीं है और क्या खूब चली है।
    सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक हृदय से शुभकामनाएं मीना जी आपका साहित्य सफर ऐसे ही ऊंचाइयों को छूता रहे। और पाठकों को अमूल्य पठन सामग्री मिलती रहे।
    सस्नेह।

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    उत्तर
    1. निःशब्द और अभिभूत हूँ । आप पुनः सभी रचनाओं पर पधारे और अपनी स्नेहिल उपस्थिति अंकित कर मेरी सृजनात्मकता का मान बढ़ाते हुए उत्साहवर्धन किया । हृदयतल से आभार कुसुम जी ! सस्नेह…,सादर 🙏🙏

      हटाएं

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