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Monday, May 16, 2022

'बुद्धम् शरणम् आइए, पकड़ बुद्धि की डोर' (चर्चा अंक 4432)

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीय रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएँ।

       अहिंसा,शांति और करुणा का संदेश दुनियाभर में फैलाने वाले महात्मा बुद्ध का जन्म वैशाख मास की पूर्णमासी को हुआ था। 

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएँ। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

लीजिए पढ़िए चंद चुनिंदा रचनाएँ-

दोहे "प्यारे गौतम बुद्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बुद्धम् शरणम् आइएपकड़ बुद्धि की डोर।

चलो धर्म की राह मेंहोकर भाव-विभोर।।

--

दिव्य ज्ञान की खोज मेंमानव हो संलग्न।

बौद्ध धर्म कहता यहीरहो ध्यान में मग्न।।

*****


आज के दिन अंतिम बार नजर आयेगी
कल एक मई दो हजार बाईस को अवकाश पर चली जायेगी
‘उलूक टाइम्स’ करोड़ों पन्नो के बीच
एक लाख उनसठ हजार आठ सौ अठत्तर पर आज नजर आता है
*****

मन  प्रांगण में बसे हैं,

जीवन ज्योति धाम ये।

तिमिर से बाहर निकल,

आशा का दामन थाम ले।

*****

मुझे किसने है पुकारा?...

ये स्नेह स्वर कितना अनुरागी है

कि भीतर पूर नत् श्रद्धा जागी है

भ्रमासक्ति थी कि मन वित्तरागी है

औचक उचक हृदय थिरक उठा

आह्लादित रोम-रोम अहोभागी है

कैसा अछूता छुअन ने है पुचकारा?

आह! ये किसकी टेर हैमुझे किसने है पुकारा?

*****

शब्द प्रभाव

उस भँवर की मरीचिका में

मन भटकता रहता है,

उलझता  रहता है

तृप्ति -अतृप्ति की

अंतहीन यात्राओं में...।

*****

एक ग़ज़ल -प्रयागराज में धारा समास लगती है 

कभी समंदरों की बाँह  में सुकूँ था इसे

अब अपनी गाद में बैठी हताश लगती है


जहाँ पे धार धवल  है ये खिलखिलाती भी है

वहाँ पे फूल तितलियाँ पलाश लगती है

*****

अगर पायल मेरी बोले (गीत)

खुले आकाश का पंक्षी,

उड़े स्वच्छंद पर खोले

ठिठक जाते कदम रह-रह

अगर पायल मेरी बोले

रहे बंधक मेरे घूँघरू

भरी चढ़ती जवानी में॥

*****

 बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’: ‘ठुमरी’ के पर्याय थे वाज‍िद अली

परफॉर्मिंग आर्ट्स की तरहवाजिद अली शाह ने भी अपनी अदालत में साहित्य और कई कवियों और लेखकों को संरक्षित किया। उनमें से उल्लेखनीय बराक’, ‘अहमद मिर्जा सबीर’, ‘मुफ्ती मुंशी’ और आमिर अहमद अमीर’ थेजिन्होंने वाजिद अली शाहइरशाद-हम-सुल्तान और हिदायत-हम-सुल्तान के आदेशों पर किताबें लिखीं।

*****

वन मेला - Prakash Sah

रूनझूण-रूनझूण आवाजें, जमीन पे ससर रहे थें

बुजुर्गों जैसे डाँटकर, सूखे पत्तें कुछ समझा रहे थें 

बादल आये थें चुपके से, मैं उलझा था वन देखने में

भर झोली लाये थें पानी, सबको नहलाकर चले गये 

*****

परिवार की परिभाषा

आधुनिकता व नगरीकरण ने,
सृजित किया  एकल परिवार।
कयोंकि  संयुक्त रूप से रहना,
आज लोगों को नहीं स्वीकार।
*****
"विश्व वानिकी दिवस" के दिन जलता वन
वन विभाग या वन पंचायत को जंगलो के आस-पास के ग्रामीण समुदाय को जागरूक करना होगा उन्हें प्रशिक्षित करना होगा, साथ ही साथ उन्हें ये यकीन भी दिलाना होगा कि -"ये अब भी तुम्हारा ही घर है इसे सहेजना तुम्हरा  कर्तव्य है इससे उतना ही लो जितने से तुम्हारी भी जीविका चले और इसका भी आस्तित्व बना रहें।"  हम अपनी सम्पदा में बढ़ोतरी यदि नहीं कर पा रहें है तो कम से कम जो धरोहर मिली है उसे ही सहेज ले। 
*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


13 comments:

  1. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  2. सुंदर,सार्थक रचनाओं से परिपूर्ण उत्कृष्ट अंक ।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका आभार और अभिनंदन ।
    बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।
    आपको मेरा नमन और वंदन आदरणीय 👏💐।

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  3. बहुत सार्थक चर्चा प्रस्तुति।
    मेरे दोहे को चर्चा का शीर्षक बनाने के लिए
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  4. इस प्रोत्साहन हेतु आपका सादर धन्यवाद।

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  5. चयनित रचनाओं से सजा बहुत ही सुंदर अंक,मेरे लेख को भी मंच पर स्थान देने के लिए हृदयतल से आभार सर,
    आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें

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    Replies
    1. बिल्‍कुल सही कहा कामिनी जी आपने

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  6. धन्‍यवाद रवींद्र जी, मेरी पोस्‍ट को अपने मंच पर स्‍थान देने के लिए आपका आभार

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  7. हार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन

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  8. बहुत सुंदर संकलन।
    सभी को बधाई।
    सादर

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  9. बुद्ध की प्रबुद्धता का लेशमात्र भी अंश ग्रहण कर सकें तो जीवन के दुख सुख के चक्रों से मुक्त हो जाये।
    अत्यंत सारगर्भित,ज्ञानवर्धक और सुंदर सूत्रों से सज्जित अंक में मेरी रचना शामिल करने के लिए अत्यंत आभार आपका।

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  10. स्निग्ध चाँदनी सी प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

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  11. बुद्ध
    सार्थक रचनाओं का सुंदर संकलन।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।

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