चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Tuesday, October 09, 2012

मंगलवारीय चर्चामंच (1027)उनका संदेसा उनके जाने के बाद आया!


आज की मंगलवारीय चर्चा में आप सब का स्वागत है राजेश कुमारी की आप सब को नमस्ते आप सब का दिन मंगल मय हो 
प्रकृति की गोद में खेलता बचपन 

                अब चलते हैं आपके प्यारे ब्लोग्स पर 

कांग्रेस का राउडी-राबर्ट... - कांग्रेस के पास कितने
शुभ मुहुर्त - ना जाने कैसे रिवाज़ हैं निकलवाते हैं
ग़ज़ल - प्राण शर्मा - *शरीफों के तरह ही घर में

अधूरे सपनों की कसक (2)

रेखा श्रीवास्तव at मेरी सोच - राजेश कुमारी का सपना जो पूरा ना हुआ 


सतीश सक्सेना at मेरे गीत 


पीला गुलाब - 2 & 3 . - * चार साल बीत गए. उस दिन शृंगार

नारी को पहचानो

अपर्णा

आशा बिष्ट at शब्द अनवरत...!!!

अभिनय

ज्ञान साधना है

नभ का कोना

जब तक गति है - पाना है खोना है

रश्मि प्रभा... at मेरी भावनायें...

संयम

उपासना सियाग at nayee udaan -

किसी दोस्त सा चेहरा

शारदा अरोरा at गीत-ग़ज़ल -

सफलता के लिए प्राथमिकताएं तय कीजिए और एक समय में एक ही लक्ष्य रखिए

अफवाह

Dr. sandhya tiwari at Parinda - 

एक अनछुआ मौन

Ashok Vyas at Naya Din Nayee Kavita -

चंद्रमौलेश्वर जी - उनका संदेसा उनके जाने के बाद आया!

Shah Nawaz at छोटी बात

आज की ताजा खबर -- अंजु (अनु) चौधरी ( क्षितिजा )

संजय भास्कर at आदत....मुस्कुराने की -

[कहानी] शालिनी कौशिक :अब पछताए क्या होत

शालिनी कौशिक at ! कौशल ! -

दलीय व्यवस्था और सरकारें

रवि शंकर पाण्डेय at रवि शंकर पाण्डेय
******************************************************************

इसके  साथ ही आज की चर्चा समाप्त करती हूँ फिर मिलूंगी तब तक के लिए शुभविदा,  शब्बा खैर ,बाय बाय

42 comments:

  1. अजी वढेरा (स्सारी वाढ्रा/वाड्रा )तो प्राइवेट आदमी बतलाया गया है ,कांग्रेस के गले की फांस बन चुका है .

    ram ram bhai
    मुखपृष्ठ

    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )


    ZEAL
    कांग्रेस का राउडी-राबर्ट... - कांग्रेस के पास कित

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  2. नींद की REM STAGE (RAPID EYE MOVEMENT) में खाब आते हैं .यह वह अवस्था है जब हम गहन निद्रा में होतें हैं .पुतलियाँ तेज़ दौड़ रही होतीं हैं .कभी देखिए बच्चों को सोते हुए .यह डेढ़ घंटे का चक्र होता है .ख़्वाब प्राय :इसी चक्र के दौरान आतें हैं .उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाते हैं खाब .अप्राप्य को प्राप्य बना हमारी वासनाओं का शमन कर के चले जाते हैं .दिन में इसीलिए ख़्वाब नहीं आते अकसर क्योंकि ९० मिनिट के इस चक्र से पहले ही हम उठ जातें हैं .दिन में इतना कहां सोते हैं .

    बढ़िया विश्लेषण ख़्वाबों का ..

    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

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  3. अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

    ReplyDelete
  4. अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

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  5. .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने......(सुनाईं).... कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

    .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो......(रातों रातों )..... अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

    जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे......(उसमें ).... आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे

    उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको......(लड़कों ).... के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी

    मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे....(मुझमें ).... और उसमे....(उसमें )... अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

    उसमे ....(उसमें )....यही होना था

    परिवेश प्रधान बेहद सशक्त कहानी .सोहबत और संस्कार दूर तलक पीढ़ी -दर-पीढ़ी जाते हैं .यही इस वातावरण प्रधान कहानी का हासिल है .बधाई .सशक्त कहानी के लिए .शुभकामनाएं .शालिनी जी .

    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

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  6. Virendra Kumar Sharma has left a new comment on your post "मंगलवारीय चर्चामंच (1027)उनका संदेसा उनके जाने के ...":

    अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .



    Posted by Virendra Kumar Sharma to चर्चामंच at October 9, 2012 6:22 AM

    Virendra Kumar Sharma
    6:23 am (0 मिनट पहले)

    मुझे
    Virendra Kumar Sharma has left a new comment on your post "मंगलवारीय चर्चामंच (1027)उनका संदेसा उनके जाने के ...":

    अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

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  7. .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने......(सुनाईं).... कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

    .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो......(रातों रातों )..... अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

    जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे......(उसमें ).... आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे

    उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको......(लड़कों ).... के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी

    मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे....(मुझमें ).... और उसमे....(उसमें )... अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

    उसमे ....(उसमें )....यही होना था

    परिवेश प्रधान बेहद सशक्त कहानी .सोहबत और संस्कार दूर तलक पीढ़ी -दर-पीढ़ी जाते हैं .यही इस वातावरण प्रधान कहानी का हासिल है .बधाई .सशक्त कहानी के लिए .शुभकामनाएं .शालिनी जी .

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  8. .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने......(सुनाईं).... कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

    .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो......(रातों रातों )..... अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

    जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे......(उसमें ).... आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे

    उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको......(लड़कों ).... के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी

    मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे....(मुझमें ).... और उसमे....(उसमें )... अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

    उसमे ....(उसमें )....यही होना था

    परिवेश प्रधान बेहद सशक्त कहानी .सोहबत और संस्कार दूर तलक पीढ़ी -दर-पीढ़ी जाते हैं .यही इस वातावरण प्रधान कहानी का हासिल है .बधाई .सशक्त कहानी के लिए .शुभकामनाएं .शालिनी जी .

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  9. .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने......(सुनाईं).... कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

    .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो......(रातों रातों )..... अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

    जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे......(उसमें ).... आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे

    उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको......(लड़कों ).... के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी

    मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे....(मुझमें ).... और उसमे....(उसमें )... अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

    उसमे ....(उसमें )....यही होना था

    परिवेश प्रधान बेहद सशक्त कहानी .सोहबत और संस्कार दूर तलक पीढ़ी -दर-पीढ़ी जाते हैं .यही इस वातावरण प्रधान कहानी का हासिल है .बधाई .सशक्त कहानी के लिए .शुभकामनाएं .शालिनी जी .

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  10. .मित्र मण्डली में लड़कियों की संख्या लडकों से ज्यादा थी .दिलफेंक ,आशिक ,आवारा ,दीवाना न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियाँ विनय को मिलती रात को पापा के आने पर मम्मी ने उन्हें ऐसी बातें सुने......(सुनाईं).... कि पापा की बोलती बंद कर दी ..''वो बड़े घर का लड़का है ,जवान है ,फिर दोस्ती क्या बुरी चीज़ है ...अब आप तो बुड्ढे हो गए हो क्या समझोगे उसकी भावनाओं को और ज्यादा ही है तो उसकी शादी कर दो सब ठीक हो जायेगा ,विनय के पापा को यह बात जँच गयी .

    .कारोबार पापा ही सँभालते रहे ..विनय तो बस एक दो घंटे को जाता और उसके बाद रातो रातो......(रातों रातों )..... अपनी मित्र मण्डली में घूमता फिरता .

    जिस मामले का आपसे मतलब नहीं है उसमे......(उसमें ).... आप नहीं बोलें तो अच्छा !कभी मेरे लिए या अपने बेटे

    उधर अवंतिका ,अपने पापा के नक़्शे कदम पर आगे बढती जा रही थी ,दिनभर लडको......(लड़कों ).... के साथ घूमना ,फिरना और रात में मोबाइल पर बाते करना यही दिनचर्या थी उसकी

    मैंने तुझे कब रोका जो उसे रोकती ...मम्मी मुझमे....(मुझमें ).... और उसमे....(उसमें )... अंतर............कहते हुए खुद को रोक लिया विनय ने ..आखिर वह भी तो लड़कियों के साथ ही मौज मस्ती करता था और आज जब अपनी बेटी वही करने चली तो अंतर दिख रहा था उसे ....विनय सोचता हुआ घर से निकल गया .

    उसमे ....(उसमें )....यही होना था

    परिवेश प्रधान बेहद सशक्त कहानी .सोहबत और संस्कार दूर तलक पीढ़ी -दर-पीढ़ी जाते हैं .यही इस वातावरण प्रधान कहानी का हासिल है .बधाई .सशक्त कहानी के लिए .शुभकामनाएं .शालिनी जी .

    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

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  11. अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

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  12. अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खाले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

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  13. राजेश कुमारी जी!
    आज तो चर्चा मंच पर पढ़ने के लिए काफी कुछ दे दिया आपने!
    आभार!

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  14. अजी कैसे बोले पति विज्ञापनी झूठ .विज्ञापन में तो नारी ऐसे लगती है जैसे सलाद की इंद्रधनुषी प्लेट .सजी संवरी रहती है 24X7 ,और धारावाहिकों में तो गहने और एक से एक साड़ियाँ पहने रहती है .एक से एक बढ़के षड्यंत्र रचती है .डर्टी पिक्चर से सम्बन्ध एक ही परिवार के सभी पुरुष बनाए रहतें हैं .आपके पति आपसे झूठ बोल ही नहीं सकते .रहेंगे कहां जाके .ज़िन्दगी विज्ञापन नहीं है .बढ़िया व्यंजना है .

    ram ram bhai
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    bas yun...hi....
    "जो बीबी से करते हैं प्यार.......वो प्रेस्टिज से कैसे

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  15. अब क्या टिपण्णी करें स्पैम बोक्स मुंह खोले खड़ा है खाए जा रहा है टिपण्णी दर टिपण्णी .सर्वभक्षी कांग्रेसी कहीं का .

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  16. आदरणीय अंजु अनु चौधरी ब्लॉगजगत की जानी मानी शक्सियत है .......शख्शियत हैं .....................
    जिन्हें ब्लॉगजगत में ( अपनों का साथ ) ब्लॉग के माध्यम से जाना जाता है !
    ख्याबो.......(ख़्वाबों )........ को बना कर मंजिल ...बातो.......(बातों )........ से सफर तय करती हूँ ..अपनों में खुद को ढूंढती हूँ ....खुद की तलाश करती हूँ ... .. बहुत सफर तय किया ...अभी मंजिल तक जाना हैं बाकि...जब वो मिल जाएगी तो ...विराम की सोचेंगे |बस ये ही हूँ मैं ...यानी अंजु (अनु ) चौधरी ...शब्दों को सोचना और उन्हें लिख लेना ..ये दो ही काम करने आते हैं....साधारण सी गृहणी ...अपनी रसोई में काम करते करते ...इस सफर पर कब आगे बढ़ गई ये पता ही नहीं चला ...कविता के रूप में जब लेखनी सामने आई ...तो वो काव्य संग्रह में तब्दील हो गई

    किसी भी किताब के बारे में लिखना और फिर जिसने उस किताब को लिखा है और फिर उसके बारे में लिखना बहुत अलग अलग अनुभव होता है
    ........करीब ६ महीने पहले अंजू जी का कविता - संग्रह " क्षितिजा " को पढ़ा पर कभी कुछ दिनों से क्षितिजा के बारे में लिखने का समय नहीं मिल पाया पर आज उसी से जुड़े कुछ विचार आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ

    अंजू की के काव्य संग्रह की रचनाये..........(रचनाएं )............... विविध विषयों पर आधारित है (हैं ).................परन्तु संग्रह की रचनाओ (रचनाओं )........का मूल कथ्य स्त्री की सम्पूर्णता को समेटे हुए है !

    ............. क्षितिजा का अर्थ होता पृथ्वी की कन्या ...धरती की कन्या है तो उसका स्वभाव ही नारी युक्त है और वह नारी भाव से घिरी हुई है ..और अंजू जी की अधिकतर रचनाएं है भी नारी के भावों पर ..खुद अपने परिचय में वह कहती है कि" नारी के भावों को शब्द देते हुए उनकी प्रति क्रियाओं को सीधे सपाट शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है "


    भाई साहब थोड़ा नाक में बोलना भी सीखों बिंदी का प्रयोग भी ज़रूरी है आवश्यक स्थलों पर ................बिंदी शब्दों की आभा है ....अलंकरण है .......गहने हैं .

    सोमवार, 1 अक्तूबर 2012
    ब्लॉग जगत में अनुनासिक की अनदेखी
    ब्लॉग जगत में अनुनासिक की अनदेखी

    अनुस्वार ,अनुनासिक की अनदेखी अपनी नाक की अनदेखी है .लेकिन नाक पे तवज्जो इतनी ज्यादा भी न हो

    कि आदमी का मुंह ही गौण हो जाए .

    भाषा की बुनावट कई मर्तबा व्यंजना में रहती है ,तंज में रहती है इसलिए दोस्तों बुरा न मनाएं .



    आदमी अपने स्वभाव को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता .ये नहीं है कि हमारा ब्लॉग जगत में किसी से द्वेष है

    केवल विशुद्धता की वजह से हम कई मर्तबा भिड़ जाते हैं .पता चलता है बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया .अब

    डाल दिया तो डाल दिया .अपनी कहके ही हटेंगे आज .

    जिनको परमात्मा ने सजा दी होती है वह नाक से बोलते हैं और मुंह से नहीं बोल सकते बोलते वक्त शब्दों को

    खा भी जातें हैं जैसे अखिलेश जी के नेताजी हैं मुलायम अली .

    लेकिन जहां ज़रूरी होता है वहां नाक से भी बोलना पड़ता है .भले हम नाक से बोलने के लिए अभिशप्त नहीं हैं .

    अब कुछ शब्द प्रयोगों को लेतें हैं -

    नाई ,बाई ,कसाई ......इनका बहुवचन बनाते समय "ईकारांत "को इकारांत हो जाता है यानी ई को इ हो जाएगा

    .नाइयों ,बाइयों ,कसाइयों हो जाएगा .ऐसे ही "ऊकारांत "को "उकारांत " हो जाता है .

    "उ " को उन्हें करेंगे तो हे को अनुनासिक हो जाता है यानी ने पे बिंदी आती है .

    लेकिन ने पे यह नियम लागू नहीं होता है .ने को बिंदी नहीं आती है .बहने ,गहने पे बिंदी नहीं आयेगी .लेकिन

    मेहमानों ,पहलवानों ,बहनों पे बिंदी आयेगी .

    ब्लॉग जगत में आम गलतियां जो देखने में आ रहीं हैं वह यह हैं कि कई ब्लोगर नाक से नहीं बोल पा रहें हैं मुंह

    से ही बोले जा रहें हैं .

    में को न जाने कैसे मे लिखे जा रहें हैं .है और हैं में भी बहुत गोलमाल हो रहा है .

    मम्मीजी जातीं "हैं ".यहाँ "हैं "आदर सूचक है मम्मी जाती है ठीक है बच्चा बोले तो लाड़ में आके .

    अब देखिए हमने कहा में हमने ही रहेगा हमनें नहीं होगा .ने में बिंदी नहीं आती है .लेकिन उन्होंने में हे पे बिंदी

    आयेगी ही आयेगी .अपने कई चिठ्ठाकार बहुत बढ़िया लिख रहें हैं लेकिन मुंह से बोले जा रहें हैं .नाक का

    इस्तेमाल नहीं कर रहें हैं .

    यह इस नव -मीडिया के भविष्य के लिए अच्छी बात नहीं है जो वैसे ही कईयों के निशाने पे है .

    मेरा इरादा यहाँ किसी को भी छोटा करके आंकना नहीं है .ये मेरी स्वभावगत प्रतिक्रिया है .

    कबीरा खड़ा सराय में चाहे सबकी खैर ,

    ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर .

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  17. बढ़िया प्रस्तुति .
    किसी दोस्त सा चेहरा

    वो मिरे साथ चल तो सकता था
    दिल में चाह ने सताया नहीं होगा उतना
    किसी दोस्त सा चेहरा
    शारदा अरोरा at गीत-ग़ज़ल -

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  18. दे दो मुझको
    भूला भटका
    कुछ सूना सूना
    बस मेरा अपना
    वो नभ का कोना...

    बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति एक टुकड़ा आसामान ही हो ,कौना एक नभ का हो ,.....कुछ तो हो ....

    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

    नभ का कोना
    expression at my dreams 'n' expressions.....याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन

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  19. बहुत सशक्त रचना है लेकिन अनुनासिक की अनदेखी ने फिर रुला दिया हर जगह नहीं कहीं नहीं नहीं ,नहीं नहीं नहीं .....नही न लिखो प्लीज़ !कर्म की और सहज प्रेरित करती सोच को धक्का देती रचना .

    ram ram bhai
    मुखपृष्ठ

    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

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  20. बहुत सशक्त रचना है लेकिन अनुनासिक की अनदेखी ने फिर रुला दिया हर जगह नहीं कहीं नहीं नहीं ,नहीं नहीं नहीं .....नही न लिखो प्लीज़ !कर्म की और सहज प्रेरित करती सोच को धक्का देती रचना .

    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

    ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
    शुभ मुहुर्त - ना जाने कैसे रिवाज़ हैं निकलवाते हैं

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  21. स्रोत हो तुम प्राथमिक आहार का ,

    क्यों बनो तुम ग्रास कर्के-रोग का ?

    (कर्क रोग बोले तो कैंसर ,मुम्बैया में मराठी में कैंसर को कर्क रोग ही कहा जा रहा है )

    रौनकें आयद सभी तुमसे यहाँ ,

    आंच हो जिस वक्ष में नासूर क्यों ?

    आईने के सामने तुम आइए,

    वक्ष के अर्बुद से न घबराइए .

    राह है आसान अब हर रोग की ,

    वक्त से बस बा -खबर हो जाईये .

    सतीश जी आपने बहुत सार्थक गीत लिखा है और देखिए हमसे भी कुछ लिखवा लिया आपके इस रागात्मक संचारी गीत ने .आभार .

    ReplyDelete
  22. स्रोत हो तुम प्राथमिक आहार का ,स्रोत हो तुम सम्पूर्ण आहार का ,

    क्यों बनो तुम ग्रास कर्के-रोग का ?

    (कर्क रोग बोले तो कैंसर ,मुम्बैया में मराठी में कैंसर को कर्क रोग ही कहा जा रहा है )

    रौनकें आयद सभी तुमसे यहाँ ,

    आंच हो जिस वक्ष में नासूर क्यों ?प्यार हो जिस वक्ष में नासूर क्यों ,

    आईने के सामने तुम आइए,आईने के सामने खुद आईये

    वक्ष के अर्बुद से न घबराइए .

    राह है आसान अब हर रोग की ,

    वक्त से बस बा -खबर हो जाईये .

    सतीश जी आपने बहुत सार्थक गीत लिखा है और देखिए हमसे भी कुछ लिखवा लिया आपके इस रागात्मक संचारी गीत ने .आभार .

    एक बात और सतीश जी ,यहाँ अमरीका के हरेक राज्य में जब तब पिंक वाल्क का आयोजन होता है .लोग दौड़तें हैं किसी न किसी के लिए ५ -१० -१५ -२० मील .जिसके लिए दौड़ते हैं वह कैंसर कोष के लिए चैक देता है .स्वेच्छा से .तमाम रास्ते दौड़ने वालों के लिए स्वयंसेवी पानी लिए खड़े रहते हैं .इस दिन सब कुछ पिंक होता है .लिबास पिंक ,साइकिल की गद्दी पिंक ,बास्किट पिंक ,पानी पिंक ,पिंक ही पिंक .पिंक रिबन वाली टोपी सब पहने रहते हैं .पिंक ट्रांसफोर्मर ,बम्बिल बी (सभी कार्टून करैक्टर्स ).

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  23. शरीफों के तरह ही घर में आना सीख जाएगा
    लगेगी चोट जब वो घर चलाना सीख जाएगा

    कोई आता नहीं है सीख कर हर बात ऊपर से
    अभी बच्चा है वो पढ़ना-पढ़ाना सीख जाएगा

    न इसको ढील दो इतनी कहीं जिद्दी न हो जाये
    ये मन है प्यारे तुमको नित सताना सीख जाएगा

    ज़माने को हमेशा जानने में वक़्त लगता है
    हमारा बच्चा भी रस्मे ज़माना सीख जाएगा

    न बोला कीजिये ऊँचे स्वरों में आप बच्चे पर
    अभी से ए सजन वो सहम जाना सीख जाएगा

    बहाना मत बनाया कीजिये बच्चे से कोई आप
    बहाना वो भी वरना नित बनाना सीख जाएगा

    उसे भी खेलने दो `प्राण` सब हँसते हुओं के संग
    तुम्हारा बच्चा भी हँसना-हँसाना सीख जाएगा

    बेहतरीन अश - आर क्या मतला क्या मक्ता .पूरा मानव मनोविज्ञान और परवरिश का सलीका उड़ेल दिया है गजल में आपने .धैर्य और दृष्टा भाव जीवन में बहुत ज़रूरी है .उम्र सब सिखा देती है बा -शर्ते आदमी आदमी हो कांग्रेसी न हो .
    ram ram bhai
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    मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012
    प्रौद्योगिकी का सेहत के मामलों में बढ़ता दखल (समापन किस्त )

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  24. राजेश कुमारी जी चर्चा मंच में शामिल करने का बहुत बहुत धन्यवाद ...

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  25. बेहतरीन सूत्र एक से बढ़कर एक सुंदर चर्चा!

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  26. अच्छी चर्चा हुई है। पोस्ट में भी,टिप्पणी में भी!

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  27. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स लिए उत्‍तम चर्चा

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  28. सुंदर चर्चा... मेरी नयी रचना... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

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  29. राजेश कुमारी जी, ढेर सारे लिंक्स..सुंदर चर्चा..आभार !

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  30. बहुत ही उम्दा लिक्स ....एवं मेरी रचना को स्थान देने के
    लिए आपका शुक्रिया मैम...

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  31. श्रृंगार ,क़ुबूल वाना ,सामने ,कन्या पक्ष ,पंडित ,पंडित जी .,

    बेहद सशक्त परिवेश और अंचल विशेष की रस्मों को सजीव करती कहानी का आकर्षक अंक .अगले अंक का इंतज़ार रहेगा .

    लालित्यम्
    पीला गुलाब - 2 & 3 . - * चार साल बीत गए. उस दिन शृंगार

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  32. 8)छन्न पकैया, छन्न पकैया, कन्या भ्रूण मिटाया
    कुछ ही वर्षों में बस समझो ,जग का हुआ सफाया

    नर नारी का विषम होता अनुपात ,मचाएगा एक दिन उत्पात .

    नारी को पहचानो
    Rajesh Kumari at WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION

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  33. श्रृंगार ,क़ुबूल वाना ,सामने ,कन्या पक्ष ,पंडित ,पंडित जी .,

    बेहद सशक्त परिवेश और अंचल विशेष की रस्मों को सजीव करती कहानी का आकर्षक अंक .अगले अंक का इंतज़ार रहेगा .

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  34. हाँ ये हमारे दौर की हकीकत थी वहां शादी ब्याह ही नहीं कैरिअर्स भी नियोजित होते थे थोपे जाते थे ऊपर से हाई कमान की तरह .लेकिन सपने मरते कहाँ हैं पल्लवित होतें हैं .हम भी जब पढ़ते थे नौवीं में बनना चाहते थे संगीतकार .संगीत पढ़ सीख न सके .११ वीं में आये अभी भी एक इच्छा बाकी थी ,साहित्यकार बनना है ,एक नाम चीन लेखक बनना है .हिस्से में आया एमएससी फिजिक्स .लेकिन सपना मरा नहीं .प्रयास ज़ारी है .जन विज्ञान का बीड़ा उठाया हुआ है तीस पैंतीस सालों से .सपना मरा नहीं है .

    अधूरे सपनों की कसक (2)
    रेखा श्रीवास्तव at मेरी सोच - राजेश कुमारी का सपना जो पूरा ना हुआ

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  35. श्रृंगार ,क़ुबूल वाना ,सामने ,कन्या पक्ष ,पंडित ,पंडित जी .,

    बेहद सशक्त परिवेश और अंचल विशेष की रस्मों को सजीव करती कहानी का आकर्षक अंक .अगले अंक का इंतज़ार रहेगा .

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  36. ये स्पैम बोक्स फिर आगया अपनी औकात पे .संभालो इसे .

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  37. श्रृंगार ,क़ुबूल वाना ,सामने ,कन्या पक्ष ,पंडित ,पंडित जी .,

    बेहद सशक्त परिवेश और अंचल विशेष की रस्मों को सजीव करती कहानी का आकर्षक अंक .अगले अंक का इंतज़ार रहेगा .

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  38. बढिया प्रस्तुति .मन गदगद हुआ .थोड़े में पूरी बात कहनी पड़ती है यही तो दोहों की विशेषता होती है श्याम जी के दोहे इस कसौटी पे खरे उतरतें हैं -

    ठेस –
    स्वाभिमान पर अन्य के, पहुँचे कभी न ठेस।
    ऐसा तू व्यवहार कर, उपजें नहीं कलेस।।

    ठेस –
    स्वाभिमान पर अन्य के, कभी न पहुँचे ठेस।
    ऐसा तू व्यवहार कर, उपजें नहीं कलेस।।.....ऐसा करने पर गेयता और भी बढ़ जाती है .श्यामजी गौर करें .
    ठाले बैठे
    SP2/1/1 कितने सीधे श्याम जी, यथा जलेबी रूप - डा.


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  39. बहुत बढ़िया काव्य टिप्पणियाँ .नूरा कुश्ती तो बहुत देखी यहाँ नूरा कुंडली कुंडली खेल रहें हैं आप और अरुण कुमार निगम साहब .बढ़िया तंज़ और व्यंजना ला रहे हो नित्य प्रति रविकर भैया .

    दिनेश की दिल्लगी, दिल की सगी
    हरकारे *हरहा हदस, *हहर *हई हकलाय- - ये है नारी शक्ति

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  40. अति सुन्दर काव्य कथा .

    "कुछ कहना है"
    भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता

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  41. वीरेंद्र कुमार शर्मा जी के साथ आप सब का हार्दिक आभार

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  42. aabhar aapka .............mujhe aphsos hai ki vyastata ke kaaran kal net par hajir nahi ho paayi

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