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Friday, October 12, 2012

फेमिली वाइफ : चर्चा मंच 1030

नोट:
दो चर्चाकरों की आवश्यकता है चर्चा-मंच को -
कृपया स्वयं को प्रस्तुत करें
इस नेक कार्य हेतु-
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) has left a new comment on your post "फेमिली वाइफ : चर्चा मंच 1030":

बढ़िया चर्चा!
अच्छे लिंक्स!!
आपका श्रम सराहनीय है!
जो चर्चा मंच को समर्पित भाव से सजा सकें,
ऐसे कुछ और भी योगदानकर्ता भी तलाश कीजिए न!
रविकर जी!
आभार आपका!!

बाल-श्रम पर विवाद : निगम-धीर-उमा / संगीता दी और रश्मिप्रभा जी भी

रविकर 

  1. कल रोटी पाया नहीं, केवल मिड-डे मील ।
    बापू-दारुबाज को, दारु लेती लील ।
    दारु लेती लील, नोचते माँ को बच्चे ।
    समझदार यह एक, शेष तो बेहद कच्चे ।
    छोड़ मदरसा भाग, प्लेट धोवे इक होटल ।
    जान बचा ले आज, सँवारे तब ना वह कल । 


  2. कवित्त 
    अपराध नहीं बाल श्रम है ये शिक्षा भाई
    संवेदनशीलता किसने जतलाई है|
    राजनितिक आह ने विपदा में डाल दिया
    घर के चिराग यहाँ रौशनी जलाई है||
    राम जी के श्रम बल ताड़का का बध हुआ
    संघर्ष की शुरुवात हमें दिखलाई है|
    श्रम एक बल है अनुभव से भरने का
    बालपन के श्रम ने महानता पाई है||
हालत अति चिंताजनक,दिशा दिखाए कौन
प्रश्न बड़ा खुलकर खड़ा,दसों दिशायें मौन
दसों दिशायें मौन , यही वो नौनिहाल हैं
जिसके काँधे रखा,सुनहरा कल विशाल है
व्यर्थ बिखर ना जाय,कीमती है यह दौलत
मिलजुल करें विचार ,सुधारें कैसे हालत ||
भूख कराती काम है ,कैसे जाएँ स्कूल
सबसे पहले उदर है , कैसे जाएँ भूल ? 
  1. खाने को रोटी नहीं
    ना तन पे कपडा - फिर कैसा स्वास्थ्य दिवस !
    श्रम करे नन्हीं उम्र
    2 पैसे की प्रत्याशा में - कैसी समानता !


1

हाइकू

रेखा श्रीवास्तव 


  2

सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक .... (कुँवर जी)

kunwarji's 


3

थका हुआ सा एक ख्वाब.....

expression 


4

अक्टूबर माह की महानता !

मुकेश पाण्डेय चन्दन 


5

एक उल्टी प्रेम-कहानी

मन्टू कुमार  


6

बेचारे बगदी लाल जी

Asha Saxena 
 Akanksha  



7

सबके कंधे झुक जाते हैं

"अनंत" अरुन शर्मा 

  8

तप रे !

निवेदिता श्रीवास्तव 


9

गनीमत है ...!!!

सदा 
 SADA


10

एक इकलौते वोट से बना गया प्रधानमन्त्री

ZEAL 
 ZEAL


11

ओ कलम !!

ई. प्रदीप कुमार साहनी 


12

भारतीय राजनीति के आदर्श पुरुष: नाना जी देशमुख (nana ji deshmukh)

अवधेश पाण्डेय 



  13

आंच-121 : माँ और भादो

मनोज कुमार 


  14

दोहा छंद वाली समस्या पूर्ति - शंका समाधान

NAVIN C. CHATURVEDI 


15

बच्चे तो बस हो जाते हैं ...............

वन्दना  

  16

वाड्रा गीत

Virendra Kumar Sharma  

Untitled

सुरेश शर्मा . कार्टूनिस्ट
 इनकी चिंता तो देखिये ...
 

17

नथ......

Dr Varsha Singh  

18

सोलह में शादी की आजादी

Arunesh c dave  


19

उपभोग या कुछ और?????

रणधीर सिंह सुमन  


हरियाणा के कुछ क्षेत्रो में 'फैमिली वाइफ' का प्रचलन सामने आयाहै। फेमिली वाइफ मतलब उसका उपभोग परिवार से सभी पुरुष सदस्य करते है।हरियाणा के लोग फैमिली वाइफ खरीदने केरल जाते है और उन बदकिस्मत महिलाओंके साथ लौटते है, जो न तो किसी को समझ सकती हैं और न ही किसी से बाते कर सकती है। कुछ ऐसी ही स्थिति उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी देखने को मिल जाएगी। जहाँ एक तरफ महिलाओं की स्थिति तो काफी बेहतर मानी जाती है, कुछ सामज तो महिला प्रधान भी है.....। मगर इनके बावजूद कुछ आदिवासी समाज में इनकी दर्दनाक तस्वीर मौजूद है। उत्तर-पूर्व के एक आदिवासी समाज में घर पर
किसी मेहमान के आने पर उनका स्वागत घर की बेटियों को उनके सामने परोस कर किया जाता है। जी हाँ, उन मासूमों को मेहमाननवाजी के नाम पर मेहमानों के हमबिस्तर होने पर मजबूर किया जाता है।

20

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन जी का आज 70 जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं...

Sawai Singh Rajpurohit  


  21

मुक्तक

Madan Mohan Saxena  



22

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (३६वीं कड़ी)

Kailash Sharma 


23

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद : "महंगाई"

tarun_kt  

24

माँ,,,

Dheerendra singh Bhadauriya 


  25

"लिखो रक्त की स्याही से..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  
त्रस्त हुआ है लोकतन्त्र अब.
बढ़ती तानाशाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।
गद्दारी के मानदण्ड सब,
मक्कारों ने तोड़ किये।
भोली-भाली जनता के,
सख़्ती से कान मरोड़ दिये।
गन्ध दासता की आती है,
सरकारी मनचाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

37 comments:

  1. एक से एक लिंक
    रख दिये हैं जैसे
    थाली में सजा के
    रविकर लाया है
    देखिये मोतियों की
    माला एक बना के !

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  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. कई लिंक्स से सजा चर्चा मंच |बाल श्रम पर अच्छी प्रस्तुति |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |

    ReplyDelete
  4. इस ओज पूर्ण गीत में खुला आवाहन है भारत की जनता का जागो ,गद्दार देश बेच रहें हैं .

    एक शैर इस गीत और गीतकार के नाम -

    तेरी सौदागरी ने देश का भूगोल तक बेचा ,

    खुदा के वास्ते बसकर ,बचा इतिहास रहने दे .

    बधाई शास्त्री जी इस जोश बढाने वाले गीत के लिए .

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  5. जब तलक बाहर से बेटा लौट कर आता नही, ........नहीं
    आँख चौखट पर लगाए जगा करती है वो माँ!

    उम्र काफी हो चली मेरी याद आती है मेंरी माँ,........मेरी ...........


    आज भी नजरें उतारती"धीर"की होती जो माँ!

    बेहतरीन भावांजलि माँ के नाम .

    24
    माँ,,,
    Dheerendra singh Bhadauriya
    काव्यान्जलि ...

    ReplyDelete
  6. बढ़िया चर्चा!
    अच्छे लिंक्स!!
    आपका श्रम सराहनीय है!
    जो चर्चा मंच को समर्पित भाव से सजा सकें,
    ऐसे कुछ और भी योगदानकर्ता भी तलाश कीजिए न!
    रविकर जी!
    आभार आपका!!

    ReplyDelete
  7. .. तुम्हे तो बस ईच्छा ही करनी है , वत्स !..........इच्छा .....

    प्रभु : हे प्रिय भक्त ! आय और व्यय के असंतुलन से ही महंगाई का प्रभाव भय को देता है ।

    अत: इस युग में संतोष धन को बढ़ा और विद्या को प्राप्त कर उसे बाट ....................बाँट .......

    तुझे मैं सब प्रकार से सुरक्षित कर दूंगा ।



    जब जब जगत में अधर्म (कर्तव्य से च्युत होना ) बढ़ता है , भारत की मनीषा ने अपने पालक पिता को पुकारा है और ऐसा एक भी ऊदाहरण।।।।।।(उदाहरण )...... नहीं जब वह

    निराश हुवा हो । सो विरोध और असमंजस के इन नाजुक

    क्षणों में , क्यों ना हम भी ह्रदय में सच्ची भावना के पुष्प लेकर , उस परम शक्ति की शरणागत हो ले ...हो लें .......

    सात्विक भाव और संतोष धन से पूरित पोस्ट .

    23
    श्री कृष्ण अर्जुन संवाद : "महंगाई"......
    tarun_kt
    Tarun's Diary-"तरुण की डायरी से .कुछ पन्ने.."

    ReplyDelete
  8. सहज दो टूक प्रेम वन्दना ,प्रेमाराधन .


    21
    मुक्तक
    Madan Mohan Saxena
    काब्य संसार

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  9. आशा, कर्म व ज्ञान व्यर्थ हैं,
    उनका मन विक्षिप्त है रहता.
    असुर, राक्षसी, बुद्धि भ्रष्ट से
    भ्रमित भाव में पड़ा है रहता. (९.१२)

    बहुत सुन्दर भावांजलि है .

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  10. जय श्री हरवंश राय बच्चन ,जय श्री तेज़ी बच्चन ,जय श्री अमिताभ जी बच्चन ,जया बच्चन जी,मुबारक ये विरासत, मुबारक ये दिन ,मिले ये विरासत ,इन्हें भी उन्हें भी .

    दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं ,

    जहां कहीं मिल बैठे हम तुम ,वहीँ रही हो मधुशाला .

    पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला .

    सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन जी का आज 70.....(वां )..... जन्मदिवस है उनको मेरी और सम्पुण ब्लॉग परिवार(सम्पूर्ण ........) & सुगना फाऊंडेशन।।।।।।।।।।।।(फाउनडेशन ..........) -मेघालासिया की पूरी टीम की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं...

    शानदार जानकारी है आप दोनों हाथ से लिख भी सकतें हैं .

    दोनों हाथ से कमा रहें हैं ,मेहनत का खा रहें हैं .

    शुरू में इनका नाम हरवंश राय बच्चन ही था .बाद में हरिवंश राय कर दिया गया .हर से हरि .......

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  11. उपयोगी और जानकारी भरे लिंक्स...व्यवस्थित चर्चा!
    बाल श्रम पर मेरी रचना नीचे की लिंक पर
    http://madhurgunjan.blogspot.in/2012/06/blog-post_04.html#comment-form

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  12. बहुत सुन्दर चर्चा...
    बढ़िया लिंक्स...........
    हमारी रचना को शामिल करने का शुक्रिया रविकर जी.

    सादर
    अनु

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  13. उपभोग या कुछ और?????
    रणधीर सिंह सुमन
    लो क सं घ र्ष !


    हरियाणा के कुछ क्षेत्रो में 'फैमिली वाइफ' का प्रचलन सामने आयाहै।।।।।।

    ये भाषा का दिवालिया पन है .फैमिली वाइफ ,आनर किलिंग्स(नृशंश तरीके से ह्त्या होती है यह ) ,तेज़ाब चेहरे पे फैंकने वाला प्रेमी (अपराधी होता है परले दर्जे का क्रूरतम ).ये तमाम शब्द प्रयोग भ्रामक हैं सुमन जी इन शब्द प्रयोगों से बचिए .

    फैमलि का एक अर्थ होता है माता - पिता और उनके बच्चे ,दूसरा अन्य रिश्तेदार चाचा चाची आदि भी .

    वाइफ डे 'फैक्टो तो हो सकती है ,भौतिक रूप से भले वह क़ानून सम्मत न हो लेकिन फैमलि वाइफ क्या होती है साहब यह तो सीधे सीधे गैंग रैप है ,अडलटरी है .एक सामाजिक समस्या को उठा रहें हैं तो भाषा के प्रति सावधानी बरतनी ज़रूरी है .





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  14. बाल श्रम का कारुणिक मानवीकरण .


    बालश्रमिक को देखकर ,मन को लागे ठेस

    बचपन बँधुआ हो गया , देहरी भइ बिदेस

    देहरी भइ बिदेस , भूलता खेल –खिलौने

    छोटा - सा मजदूर , दाम भी औने – पौने

    भेजे शाला कौन ? दुलारे कर्म–पथिक को

    मन को लागे ठेस, देखकर बालश्रमिक को ||

    कहीं चूड़ियाँ लाख की, कहीं बगीचे जाय |

    कहीं कारपेट बन रहे, बीड़ी कहीं बनाय |

    बीड़ी कहीं बनाय, आय में करे इजाफा |

    सत्ता का सब स्वांग, देखकर भांप लिफाफा |

    होमवर्क को भूल, घरों में तले पूड़ियाँ |

    चौका बर्तन करे, टूटती नहीं चूड़ियाँ ||

    इन दोनों महारथियों ने (रविकर जी ,अरुण निगम जी ने )बाल श्रम के पूरे विस्तृत क्षेत्र की पूर्ण पड़ताल की है इस विमर्श में .

    छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाए ,

    यही बाल श्रमिक कहलाए .

    घरु रामू मल्टीटासकर है ,

    कहीं पर है रामू ,कहीं बहादुर .

    भाई साहब बाल श्रम पर एक सार्थक विमर्श चलाया है आप महानुभावों ने

    बाल-श्रम पर विवाद : निगम-धीर-उमा / संगीता दी और रश्मिप्रभा जी भी
    रविकर
    "लिंक-लिक्खाड़"



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  15. mahendra vermaOctober 11, 2012 10:07 PM
    भेजे शाला कौन ? दुलारे कर्मपथिक को
    मन को लागे ठेस, देखकर बालश्रमिक को ।

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  16. बहुत बढ़िया चर्चा | लगभग सारे लिंक्स पर जाने की कोशिश की है |
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार |

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  17. बहुत बढ़िया लिनक्स ....सुंदर सार्थक चर्चा

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  18. बालश्रम पर बेहतरीन चर्चा,सुंदर लिंक्स,
    मेरी रचना को स्थान देने के लिये आभार,,,रविकर जी,,,

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  19. रविकर सर आपको और सभी को सादर प्रणाम, बेहद सुन्दर लिंक्स ढूंढ़-२ कर लाये और सजाये हैं आपने, मेरी रचना को स्थान दिया आपका तहे दिल से शुक्रिया.

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  20. रोचक सूत्र बढ़िया चर्चा मंच सजा रविकर भाई बधाई

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  21. बहुत सुन्दर लिंक्स...रोचक चर्चा..आभार

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  22. बहुत ही बढिया लिंक्स संजोये हैं ………सुन्दर चर्चा

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  23. वाह ... बेहतरीन लिंक्‍स उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

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  24. भोग परमसुख स्वर्ग लोक के,
    पुण्यक्षीण मृत्युलोक फिर आते.
    वैदिक कर्मकांड का ले आश्रय
    कामासक्त जन्म मृत्यु को पाते.बोध और समबुद्धि को जागृत करती काव्य कथा का बढ़िया प्रस्तुतीकरण .आपकी गेस्ट पोस्ट पर टिपण्णी के लिए धन्यवाद .

    ReplyDelete
  25. फैमलि वाइफ और लेफ्टिए

    लेफ्टियों का काम होता है भाषा बिगाड़ना .प्रतीकों की ऐसी की तैसी करना .

    हमारे यहाँ एक शब्द प्रयोग था रखैल जो सिर्फ एक के लिए होती थी .सभ्य समाज में अब यह प्रयोग भी वर्जित है .जिन्हें आप फैमलि वाइफ कह रहें हैं ये तो

    फिर ग्राम वधुएँ हो गईं .

    हथोड़ा और हसिया (दरातीं )हमारे यहाँ श्रम के पार्टीक हुआ करते थे इन्होनें उन्हें हिंसा का प्रतीक बना दिया .ये माओवादी उसी की उपज हैं .

    ये लोग भाषा के माध्यम से पूरी समाज व्यवस्था को गिराना चाहतें हैं .

    एक किस्सा याद आ रहा है .हम तब हरियाणा में एम।एस। सी .करके दाखिल ही हुए थे -यहाँ आके 1967 में व्याख्याता बन गए .एक साथी थे ,तू तड़ाक से

    बोलते थे .ब्रिज(बृज मंडल ) मंडल से थे .कहीं से सीख आये थे एक वाहियात लफ्ज़ "गंडमरा ",क्लास में छात्र छात्राओं को कहते -ओ !गंडमरे खड़ा हो जा ,हमने भतेरा समझाया भाई साहब यह गाली है इसका यहाँ इस्तेमाल न करो .नहीं माने बोले "तुमका का मालूम है ".

    बच्चों ने अपने घर जाके बताया .बात प्राचार्य तक पहुंची .इन साहब को बुलाया गया .प्राचार्य महोदय दया धर्म वाले निहायत शरीफ आदमी इधर उधर की बात खत्म करके बोले और डिपार्टमेंट में सब ठीक -प्रिंसिपल साहब ने बड़े संकोच से बोला -भाई साहब, आपके विभाग के कोई प्रवक्ता बच्चों को गंडमरा कहके बोलतें है .

    ये साहब झट से बोले - कौन गंडमरा कहता है .

    हम सुमन साहब से पूछना चाहतें हैं वह आँखिन देखि कह रहें हैं या सुनी सुनाई .क्या नए समाज के संगठन ने नया सूत्रपात किया है .क्यों भाई हरियाणा

    को बदनाम करते हो? होंगें कुछ ऐसे परिवार जिनमें फैमलि वाइफ का चलन होगा आपने देखे होंगें ?.खापियों को पता चल गया तो आपको छोड़ेंगे नहीं अमरीका तक भी .

    उस ब्रिजवासी की फूंक निकाल दी थी .

    ReplyDelete
  26. फैमलि वाइफ और लेफ्टिए

    लेफ्टियों का काम होता है भाषा बिगाड़ना .प्रतीकों की ऐसी की तैसी करना .

    हमारे यहाँ एक शब्द प्रयोग था रखैल जो सिर्फ एक के लिए होती थी .सभ्य समाज में अब यह प्रयोग भी वर्जित है .जिन्हें आप फैमलि वाइफ कह रहें हैं ये तो

    फिर ग्राम वधुएँ हो गईं .

    हथोड़ा और हसिया (दरातीं )हमारे यहाँ श्रम के "पार्टीक" हुआ करते थे ये लेफ्टिए प्रतीक को ऐसे ही बोलतें हैं . इन्होनें उन्हें हिंसा का प्रतीक बना दिया .ये माओवादी उसी की उपज हैं .

    ये लोग भाषा के माध्यम से पूरी समाज व्यवस्था को गिराना चाहतें हैं .

    एक किस्सा याद आ रहा है .हम तब हरियाणा में एम।एस। सी .करके दाखिल ही हुए थे -यहाँ आके 1967 में व्याख्याता बन गए .एक साथी थे ,तू तड़ाक से

    बोलते थे .ब्रिज(बृज मंडल ) मंडल से थे .कहीं से सीख आये थे एक वाहियात लफ्ज़ "गंडमरा ",क्लास में छात्र छात्राओं को कहते -ओ !गंडमरे खड़ा हो जा ,हमने भतेरा समझाया भाई साहब यह गाली है इसका यहाँ इस्तेमाल न करो .नहीं माने बोले "तुमका का मालूम है ".

    बच्चों ने अपने घर जाके बताया .बात प्राचार्य तक पहुंची .इन साहब को बुलाया गया .प्राचार्य महोदय दया धर्म वाले निहायत शरीफ आदमी इधर उधर की बात खत्म करके बोले और डिपार्टमेंट में सब ठीक -प्रिंसिपल साहब ने बड़े संकोच से बोला -भाई साहब, आपके विभाग के कोई प्रवक्ता बच्चों को गंडमरा कहके बोलतें है .

    ये साहब झट से बोले - कौन गंडमरा कहता है .

    हम सुमन साहब से पूछना चाहतें हैं वह आँखिन देखि कह रहें हैं या सुनी सुनाई .क्या नए समाज के संगठन ने नया सूत्रपात किया है .क्यों भाई हरियाणा

    को बदनाम करते हो? होंगें कुछ ऐसे परिवार जिनमें फैमलि वाइफ का चलन होगा आपने देखे होंगें ?.खापियों को पता चल गया तो आपको छोड़ेंगे नहीं अमरीका तक भी .

    उस ब्रिजवासी की फूंक निकाल दी थी .

    ReplyDelete
  27. बड़े ही सुंदर लिंक्स...
    मेरी रचना को इस चर्चा में जगह देने के लिए धन्यवाद |

    सादर नमन |

    ReplyDelete

  28. आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?
    आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?

    इसका ज़वाब तो भ्रष्टाचार की पटरानी के पास भी नहीं है .यह वाड्रा को आगे करके रंग भूमि से जो खेल खेल रहीं थीं यही इस नाटक की सूत्र धार थीं

    .अपना मंद मति बालक तो इतने पासे एक साथ फैंक ही नहीं सकता .उसमें इतनी अकल ही नहीं है .

    अब पटरानी का किसी और से प्रेम हो तो उसका भी नाम लें मनमोहन का लिया वह तो कोयला खोर निकले .जिसको हाथ नहीं लगाया वह शरीफ है जिसे

    लगाया वह सलमान खुर्शीद निकला है .

    प्रधान मंत्री कह रहें हैं विकास के साथ भ्रष्टाचार बढ़ता है .विकास का क्या यह अर्थ है आप फंड लाते जाएँ ,और खाते जाएँ .ये मुहावरे छोड़िये की विकास

    से



    भ्रष्टाचार बढ़ता है .सरकार भ्रष्टाचारी हो जाए तो भ्रष्टाचार बढ़ता है .इस सच को मान लीजिए .यहाँ तो सारी सरकार ही भ्रष्ट है कोई चारा खा रहा कोई

    कोयला

    कोई विकलांगों की कुर्सी .ऐसे में सरकारी सिलिंडर तो लीक करेगा ही .




    11 OCT 2012



    इनकी चिंता तो देखिये ...

    ReplyDelete
  29. स्त्री से कब पूछा जाता है ,

    वहां तो बीज बस रोंपा जाता है

    बेशक बच्चे का गर्भ में आना एक अति सूक्ष्म घटना है ,आवाहन करना पड़ता है सूक्ष्म शरीर का ,तब बच्चे कोष में आते हैं .जिस्मों की रगड़ से स्थूल काया ही आती है .पता नहीं किस मनोभूमि ने कवि श्रीकांत ने

    कहा था -तुम क्या चाहती हो, पड़ा रहूँ तमाम रात मैं तुम्हारी जांघ की दराज़ में (क्षेपक जोड़ा जा सकता है ,........और तुम सिर्फ बच्चे जानती रहो .................).

    अब तो लोग सुरक्षा कवच धारण कर कुरुक्षेत्र के मैदान में कूद जातें हैं ,बच्चों का झंझट ही नहीं है .

    निरोध एक फायदे अनेक ......


    ,............रोपा जाता है ,रोपना शब्द है .

    31sVirendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.com/ शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?र 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?

    ReplyDelete
  30. स्त्री से कब पूछा जाता है ,

    वहां तो बीज बस रोंपा जाता है

    बेशक बच्चे का गर्भ में आना एक अति सूक्ष्म घटना है ,आवाहन करना पड़ता है सूक्ष्म शरीर का ,तब बच्चे कोष में आते हैं .जिस्मों की रगड़ से स्थूल काया ही आती है .पता नहीं किस मनोभूमि ने कवि श्रीकांत ने

    कहा था -तुम क्या चाहती हो, पड़ा रहूँ तमाम रात मैं तुम्हारी जांघ की दराज़ में (क्षेपक जोड़ा जा सकता है ,........और तुम सिर्फ बच्चे जानती रहो .................).

    अब तो लोग सुरक्षा कवच धारण कर कुरुक्षेत्र के मैदान में कूद जातें हैं ,बच्चों का झंझट ही नहीं है .

    निरोध एक फायदे अनेक ......


    ,............रोपा जाता है ,रोपना शब्द है .

    31sVirendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.com/ शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?र 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?

    15
    बच्चे तो बस हो जाते हैं ...............
    वन्दना
    ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

    ReplyDelete
  31. कबीरा खड़ा सराय में, चाहे सबकी खैर ,

    न काहू से दोस्ती ,न काहू से वैर .
    रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ,

    टूटे से फिर न जुड़े ,जुड़े गांठ पड़ जाय .
    एक बात और भी स्पष्ट करना ज़ुरूरी।।।।।।(ज़रूरी )...... है कि संभव है कि इन दोहों में शिल्प को ले कर कुछ उन्नीस जैसा हो इसलिये हम इन दोहों से संकेत प्राप्त करने भर का प्रयास करें।

    बहुत बढ़िया चर्चा चल रही है .चर्चा क्या व्यापक विमर्श हो रहा है .हमें आप से बस एक शिकायत है दोहों के मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ न करें हमें कितने ही दोहे कंठस्थ है हमारे दौर में अन्त्याक्षरी के लिए कवि आबंटित होते थे -जैसे प्राचीन ,संत ,सूफी ,मध्य-कालीन,आधुनिक आदि .

    हीरा "जनम" अमोल था का आपने "जन्म" कर दिया

    कई का तो आपने स्वरूप ही बदल दिया .हमने शुरुआत उनके शुद्ध रूप से ही की है .

    बहर सूरत आपने हमें 1961-1963 का दौर याद दिला दिया .इस दौर में वीर रस और हास्य /श्रृंगार के कवि एक ही मच पे शिरकत करते थे .कविता कविता होती थी चुटकला या देह मटकन लटकन नहीं .देव राज दिनेश जैसे वीर रस के कवि जब मंच से गर्जन करते थे एक जोश पैदा होता था .काका हाथरसी की तो दाढ़ी भी कविता पाठ करती थी .चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता भी .नीरज जी तो मुद्राओं से भी मार देते थे और जय पाल सिंह जी तरंग के हाथों का कम्पन तो अभी भी याद है .संतोषा नन्दजी प्रेम वर्षन करते थे .गोपाल सिंह नेपाली का गीत -मेरी दुल्हन सी रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा हम सस्वर गाते थे .कामायनी और "आंसू" भी .

    समीक्षा और विमर्श रोचक ज्ञानवर्धक .आभार .बधाई .

    31sVirendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.com/ शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?र 2012 आखिर इतना मज़बूत सिलिंडर लीक हुआ कैसे ?

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    दोहा छंद वाली समस्या पूर्ति - शंका समाधान
    NAVIN C. CHATURVEDI
    ठाले बैठे

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  32. आम आदमी मैंगो पिपल बन गया है और अपने रोटी, कपड़ा और मकान की फ़िकर में ही दिन-रात घुला जा रहे हैं।

    मैंगो पीपल से आप क्या कहना चाहतें हैं -जो आम की तरह चूसा निचौड़ा जा रहा है ?बनाना रिपब्लिक और पीपल्स रिपब्लिक तो सुना है .तंज़ नहीं कर रहा हूँ जानना चाहता हूँ .
    दूसरे शब्दों में कहे ...(कहें )....तो अपने मूल को ही नष्ट कर रहे हैं हम।


    भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक, वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, खाद्य सुरक्षा विधेयक, खान और खनिज (विकास और विनियमन) विधेयक, प्रतिस्पर्धा (संशोधन) विधेयक, और बीमा क़ानून विधेयक – ही वे विधेयक हैं, जिन पर एक दिन में निर्णय लिया गया। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति देने के बाद कैबिनेट ने बीमा क्षेत्र में भी विदेशी निवेश की मंज़ूरी दे दी है। चिंता जताने वाले यह चिंता जता रहे हैं कि विदेशी कंपनियां लोगों के निवेश पर रिटर्न की गारंटी नहीं देंगी। उनकी नीतियाँ भारत की तमाम बचत को अपनी तरफ़ खींच लेंगी। इससे भारत के बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए पूंजी की कमी हो जाएगी और आम निवेशक के लिए असुरक्षा बढ़ जाएगी। संभवतः कवि की मां की यही चिंता का कारण है।

    बेहतरीन अंश है यह समीक्षा का .

    फ़िल्म एक काल्पनिक दुनिया है और कवि की कविता में मां वास्तविक संसार में रहती है। उसके इस संसार में भादो ही भादो है, लेकिन इस भादो को भी सूखा का ग्रहण लग गया है, सावन तो फ़िल्मी परदों पर ही बरस रहा है, या यूं कहें कि कुछ खास लोगों की दुनियां में उसकी रिमजिम।।।।।।।।(रिमझिम ).......... फुहार की नज़रे इनायत है।

    ये शब्द है क्या भादों या भादौं या भादो ?कृपया बतलाएं .


    ‘सुरुज देव’ की आराधना करती मां भादों के बरसने का इंतज़ार ही करती रह गई है, उन किसानों की तरह जो सरकार

    सूरज देव या सुरुज देव ?कोई स्थानीय प्रयोग ?

    अरूण जी की कविताएं अकसर हाशिए पर पड़े लोगों की न सिर्फ़ सुधि लेती है बल्कि उनके सरोकारों को हमारे सामने लाती हैं। इनकी कविताओं में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी रहती है। वे जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत कर देते हैं। प्रस्तुत कविता भी इसी की एक कड़ी है और इस कविता के ज़रिए अरुण जी ने एक बार फिर अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों को समेट बाज़ारवादी आहटों और मनुष्य विरोधी ताकतों के विरुद्ध एक आवाज़ उठाई है। आसन्न संकटों की भयावहता से हमें परिचित कराती यह कविता बताती है कि इंडिया और भारत की खाई इन आर्थिक सुधारों के नाम पर, जहां यह उम्मीद की गई थी कि समय के साथ समृद्ध वर्ग और शोषित-वंचितों के बीच की खाई कम होगी, वहीं दो दशकों का हमारा अनुभव यही कहता है कि इन प्रयोगों और नीतियों के द्वारा कितनी चौड़ी और गहरी कर दी गई है। समय के बदलते इस दौर में आज एक अलग तरह की भूख पैदा हो गई है। समृद्ध वर्ग के लोग निम्‍नवर्ग के लोगों का शोषण कर अपनी क्षुधा तृप्त करते हैं। इसलिए इनकी स्थिति सुधरती नहीं। विकास के जयघोष के पीछे इन्‍हें आश्‍वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। इनकी किस्‍मत की फटी चादर का आज कोई रफुगर नहीं। किसानों के इस देश में किसानों की दुर्दशा किसी भी छिपी नहीं है।

    बेहतरीन दो टूक खरी खरी कही है .बढ़िया समीक्षा भाई साहब .

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  33. हमारे कार्टून को शामिल करने का अत्यंत आभार ! सुन्दर लिंक्स ! रोचक चर्चा !

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  34. अति रोचक संकलन।

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  35. सुंदर व बहुमूल्य रचनाओं के बीच में नाना जी जैसे कर्मयोगी के जीवन पर मेरी रचना शामिल करने के लिये धन्यवाद.

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