Followers


Search This Blog

Thursday, October 25, 2012

रावण तो जिन्दा है हमारे ही भीतर ( चर्चा - 1043 )

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है 
इधर चर्चा लगा रहा हूँ उधर चारों तरफ दशहरे की धूम है । बुराई के प्रतीक रावण के पुतले जलाए जा रहे हैं ये बात और है कि रावण जिन्दा है हमारे ही भीतर और हम खुश हैं बाहर के रावण को जलाकर । भीतर के रावण कि चिंता किसी को नहीं ।
निकलते हैं ब्लॉगस की सैर पर 
जो मेरा मन कहे
My Photo
Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटो
My Photo
मेरा फोटो
रविकर की कुण्डलियाँ
*******
आज के लिए बस इतना ही 
धन्यवाद 
******


40 comments:

  1. यह मानकर चलता हूँ कि कोई याद आयी पंक्ति या विचार छूट न जाये और एक भी पल व्यर्थ न जाये, मोबाइल इन दोनों स्थितियों में उत्पादकता बनाये

    रखता है। आईक्लाउड के माध्यम से प्रयासों में सततता भी बनी रहती है।

    कंप्यूटर की विकास यात्रा के कई पड़ाव आपने तय करवा दिए कहाँ एक पूरा कमरा घेर लेता था पहली पीढ़ी का यह उत्पाद और कहाँ अब ओवर कोट की

    जेब में घुसने को उतावला है .

    हर पल को निचोड़ रहें हैं आप और सहयोगी बन रही है आपकी जिजीविषा महत्व कांक्षा ,हाँ कोई पल रीता न रह जाए इस ललक को बनाये रखने में आज

    प्रोद्योगिकी आदमी से लिविंग टुगेदर सा सम्बन्ध बनाए है

    .जहां दोनों का सह -वर्धन है ..प्रोद्योगिकी आदमी की नस नस से वाकिफ हो रही है .और आदमी प्रोद्योगिकी की .

    आपकी यह विकास यात्रा प्रोद्योगिकी के साथ चले .शुभकामनाएं .बधाई .


    लैपटॉप या टेबलेट

    ReplyDelete
  2. संसद से सड़क तक रावण बहुत हो गए हैं .सबसे आसान काम है इस दौर में सीता का अपहरण .इतने राम कहाँ से लायें .सीता वज्र पहनकर आयें .

    रावण आदमी नहीं रक्तबीज है

    ReplyDelete
  3. अच्छी लिंक्स |दशहरे के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं |
    आशा

    ReplyDelete
  4. संसद से सड़क तक रावण बहुत हो गए हैं .इतने राम कहाँ से लायें .

    कोई हमें बताये !कुछ तो राह दिखाए .


    अरुण भाई !


    अच्छों को अच्छे मिलें ,

    मिलें नीच को नीच ,

    पानी से पानी मिले ,

    मिले कीच से कीच .आप अच्छा (अपना आपा )तो जग अच्छा .

    जाहे नसीब हमें पंगत में बिठाया .

    जग जग जियो !शुक्रिया .नेहा और स्नेहा !

    ReplyDelete
  5. संसद से सड़क तक रावण बहुत हो गए हैं .इतने राम कहाँ से लायें .

    कोई हमें बताये !कुछ तो राह दिखाए .


    अरुण भाई !


    अच्छों को अच्छे मिलें ,

    मिलें नीच को नीच ,

    पानी से पानी मिले ,

    मिले कीच से कीच .आप अच्छा (अपना आपा )तो जग अच्छा .

    जहे नसीब हमें पंगत में बिठाया .

    जुग जुग जियो !शुक्रिया .नेहा और स्नेहा !

    की सैर पर




    ReplyDelete
  6. बहुत सुन्दर चर्चा!
    आओ अपने भीतर के रावण को मारें!

    ReplyDelete

  7. मुँह देखे की दोस्ती , अक्सर जाए छूट |
    मुँह-फट मुख-शठ की भला, कैसे रहे अटूट |
    कैसे रहे अटूट, द्वेष स्वारथ छल शंका |
    डालें झटपट फूट, बजाएं खुद का डंका |
    दोस्त नियामत एक, होय ईश्वर के लेखे |
    मिले जगत पर आय, खुशी होती मुंह देखे ||
    नीति और बोध कथा सी सीख देती कुंडली .

    ReplyDelete
  8. ये एक ही सर महंगाई का खा जायेगा सरकार को .अगले बरस ये रावण लौट के न आयेगा .


    दसहरा पर भला काजल कुमार जी क्यों रहेंगे चुप्प

    ReplyDelete
  9. हम आज भी बच्चों जैसे ही मासूम हैं जो तामसी और स्वार्थान्धता के विचारों के भेष में हमारे बीच घुल-मिलकरए पलने-बढने वाली बुराईयों की ओर ध्यान न देते हुए हर वर्ष पुतलों को प्रतीक बनाकर फिर अगले वर्ष बुराईयों के बोझ तले दूसरे पुतलों को जलाने के लिए एक साथ मिलकर उठ खड़े होते हैंएजबकि वर्षभर इन बुराईयों के प्रति उदासीनता का रवैया अपनाते हुए कभी इस तरह एकजुट कभी नहीं हो पाते हैं!
    नवरात्र और दशहरा की शुभकामनाओं सहित!
    .........कविता रावत

    बहुत ही खूब सूरत चित्रात्मक झांकी प्रस्तुत की है कविता जी ने .भारतीय मानस में पैठी उदासीनता भी उभर आई है .

    शिव शक्तियां जिस देश में रौंदी जाती हैं वहां भैरों जी रुपी भ्रष्टाचार को कौन मार सकता है .
    बच्चों के संग नवरात्र दशहरा

    ReplyDelete
  10. भाई साहब मरे हुए रावण को हम मार के एक रस्म पूरी कर लेतें हैं जनता को भी पता चल जाता है हम भ्रष्टाचार रुपी रावण के साथ नहीं हैं .आपने देखा नहीं मनमोहन सिंह जी ने तो पहले शान्ति के प्रतीक सफ़ेद

    कबूतर भी छोड़ दिए .जैसे अन्तरिक्ष को एक सन्देश भेजा हो मैं शान्ति वादी हं ,प्रधान मंत्री हूँ मेरा कोई कुसूर नहीं तनी हुई डोरी पे चलके ये करतब दिखला पडता है क्या करू सब वोटों का चक्कर है और सोनिया जी

    का अचूक बाण देखा अगले ही क्षण मरा हुआ रावण धू धू जलने लगा पता नहीं वाड्रा की बारी कब आयेगी .

    अहिंसा परमोधर्म :बहुत बढ़िया बोध कथा .मरा हुआ रावण जिन्दों से घबराए रे ,कहीं छिपा न जाए रे .

    रावण और हम

    ReplyDelete
  11. रावण और हम................


    सुबह से ही घर में उधम मच रहा था। बच्चों ने मेला घूमने के लिए सारा घर सर पे उठा रखा था। मैं हैरान परेशान इधर-उधर घूम रहा था। सोच रहा था ‘‘इस महगॉई में ये पर्व त्योहार आखिर आते क्यों है? खैर, जैसे तैसे सबको विदा किया।
    शाम में अकेले-अकेले मैं भी टहलने निकल गया।
    थोड़ी दूर जाने पर मैनें अंधेरे में किसी को छिपते देखा। जब मैं वहॉं गया तो देखा रावण महाराज अपने दस सरों की वजह से छिपने की नाकाम कोशीश कर रहे थे।
    मैने पुछा- ये क्या महाराज! आप यहॉ क्या कर रहे हैं? आपको तो थोड़ी देर के बाद जलना है।
    वो लगभग रोते हुए बोले-भाई अब तो बस करो। सदियों से मुझे जलाते आ रहे हो। आखिर एक गलती की कितनी बार सजा दोगे। वैसे भी आजकल तुम्हारे देश में इतने रावण है कि मेरे कर्म छोटे पड़ जाए। उन्हें पकड़ो और उन्हे जलाओ। मुझे जलाने से तुम्हारा कुछ भला नहीं होगा। पर उन्हे जलाओगे तो तुम्हारे साथ-साथ पुरे देश का कल्याण हो जाएगा। एक सीता हरण का दडं तुमलोग मुझे त्रेता युग से कलियुग तक देते आ रहे हो। क्या ये उचित है? मुझे तो अपनी करनी का फल त्रेता युग में ही मिल गया था। पर तुम लोग हो कि-----।
    आज तो हर घर में, हर मोड़ पर, हर समाज में, हर इंसान में बुराई ही बुराई है। उन्हें खत्म करों और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाओ। पर तुमलोगों से ये तो होगा नही और खामखॉ हर साल मुझे बदनाम करते हुए अपनी कर्मो की सजा मुझे देते हो और खुद पाक-साफ हो जाते हो।
    तभी रामलीला वाले उन्हें ढुढॅंते हुए आए और पकड़कर ले गए खुले मैदान में। राम ने तीर में आग लगाई और चला दिया रावण की ओर। रावण धूॅ-धॅू कर जल उठा। मैदान में ठसाठस भरे हुए लोग खुश हो गए। जैसे रावण के साथ-साथ इस दुनिया की सारी बुराई जलकर राख हो गई हो। लोग वापस अपने-अपने घरों में लौट आए कल से फिर एक नया रावण बनने के लिए।
    Posted by Amit Chandra at 10:59 PM
    Email This
    BlogThis!
    Share to Twitter
    Share to Facebook

    1 comment:

    Virendra Kumar SharmaOctober 24, 2012 7:30 PM
    भाई साहब मरे हुए रावण को हम मार के एक रस्म पूरी कर लेतें हैं जनता को भी पता चल जाता है हम भ्रष्टाचार रुपी रावण के साथ नहीं हैं .आपने देखा नहीं मनमोहन सिंह जी ने तो पहले शान्ति के प्रतीक सफ़ेद

    कबूतर भी छोड़ दिए .जैसे अन्तरिक्ष को एक सन्देश भेजा हो मैं शान्ति वादी हं ,प्रधान मंत्री हूँ मेरा कोई कुसूर नहीं तनी हुई डोरी पे चलके ये करतब दिखला पडता है क्या करू सब वोटों का चक्कर है और सोनिया जी

    का अचूक बाण देखा अगले ही क्षण मरा हुआ रावण धू धू जलने लगा पता नहीं वाड्रा की बारी कब आयेगी .

    अहिंसा परमोधर्म :बहुत बढ़िया बोध कथा .मरा हुआ रावण जिन्दों से घबराए रे ,कहीं छिपा न जाए रे .

    ReplyDelete

  12. ये जन मन ही हमारी विरासत संवर्धित सांस्कृतिक थाती को संभाले है .बढ़िया पोस्ट .


    456 सालों की परम्परा

    ReplyDelete
  13. बहुत सुंदर चर्चा मंच सजा है आज
    रावण बस रहा है जिधर देखो आज
    अपने अंदर के रावण को काम में लायें
    समाज में फैले रावणों को कुछ समझायें
    अब जब रहना है हमको तुमको साथ
    क्यों ना कर लिया जाय समझौता आज !

    ReplyDelete
  14. अंतर मन से अनुभूत सहज उद्भूत रचना .

    दिल के अहसासों का.....

    23 अक्तूबर 2012

    मन की सिहरन...







    कुछ बूँदें बारिश की

    बरस रही हैं आँगन में

    मन में भी कुछ

    गीलापन सा महसूस हो रहा है...


    कुछ भीग गया है शायद

    यादों के कुछ कपडे+ हैं

    तह करके रखे थे

    दिल के किसी कोने में...


    अब इन्तज़ार ही कर सकती हूँ

    कहीं से आये एक लिफ़ाफ़े का

    जो होगा मेरे नाम का

    पर पता नहीं होगा उस पर...


    शायद कुछ धूप मिल जाये उसमें

    लफ़्ज़ों में लिपटी हुई

    जो हौले से सहला जाये

    मन के गीलेपन को...

    ReplyDelete
  15. और ताजगी का ये आलम एक पूरा विशालकाय हिमनद (ग्लेशियर )समा जाता है झील में .झील की ताजगी किसी और के पास नहीं फिर भी मेरे भारत में

    झील मृत हैं .

    उद्वेलित होता है मन इस रचना को पढ़के :


    झील सी
    होती हैं स्त्रियाँ
    लबालब भरी हुई
    संवेदनाओं से
    चारों ओर के किनारों से
    बंधक सी बनी हुई
    सिहरन तो होती है
    भावनाओं की लहरों में
    जब मंद समीर
    करता है स्पर्श
    पर नहीं आता कोई
    ज्वार - भाटा
    हर तूफान को
    समां लेती हैं
    अपनी ही गहराई में
    झील सी होती हैं स्त्रियाँ

    किनारे तोड़
    बहना नहीं जानतीं
    स्थिर सी गति से
    उतरती जाती हैं
    अपने आप में
    ऊपर से शांत
    अंदर से उदद्वेलित
    झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

    झील का विस्तार
    नहीं दिखा पाता
    गहराई उसकी
    इसीलिए
    नहीं उतर पाता
    हर कोई इसमें
    कुशल तैराक ही
    तैर सकता है
    गहन , शांत ,
    गंभीर झील में
    झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

    .

    ReplyDelete
  16. बहुत खूब दोस्त !जाके पैर न फटी बिवाई ,वो क्या जाने पीर पराई .


    आंकड़े और गरीबी

    ReplyDelete

  17. SORT

    अविनाश वाचस्पति मुन्नाभाई
    सहज हास्य के जरिए समाज की विसंगतियों पर तीखे कटाक्ष करने के लिए लोकप्रिय कुशल साधक जसपाल भट्टी की आँच आज एक हादसे में तिरोहित हो गई । हिंदी ब्लाॅगरों, व्यंग्यकारों और नुक्कड़ समूह की विनम्र श्रद्धांजलि ।

    चर्चा मंच और इसके सभी चिठ्ठाकारों और चिठ्ठों की भावपूर्ण श्रृद्धांजलि .

    ReplyDelete
  18. बहुत खुबसूरत चर्चा-
    तरह तरह के रावण |
    शुभकामनायें आदरणीय ||

    ReplyDelete
  19. टिप्पण-कर्ता का करूँ, अभिनन्दन आभार |
    चर्चा का होता नहीं, बिन टिप्पण उद्धार |
    बिन टिप्पण उद्धार, रार भी हो जाती है |
    लेकिन यह तकरार, सदा मुंह की खाती है |
    मिले पाठकों प्यार, आप ही कर्ता धर्ता |
    यह चर्चा संसार, बुलाता टिप्पण कर्ता ||

    ReplyDelete
  20. दशहरा तो समाप्त हो गया पर आज का चर्चा मंच दशहरा को ही समर्पित लग रहा है | बहुत उम्दा लिंक्स लगाया है आपने | बहुत खूब | आभार |

    ReplyDelete
  21. आदरणीय भ्राताश्री दिलबाग जी बेहद सुन्दर लिंक्स लाये हैं आप आज की चर्चा में। मेरे नए ब्लॉग को इतना सम्मान और आदर देने हेतु आपका अनेक-2 धन्यवाद।

    ReplyDelete
  22. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स

    ReplyDelete
  23. बहुत बढ़िया रोचक सूत्रों से सजी चर्चा हेतु दिलबाग जी आपको बधाई

    ReplyDelete
  24. बहुत ही सुन्दर सूत्र..

    ReplyDelete
  25. बढ़िया चर्चा ......सुन्दर लिंक्स...
    शुक्रिया दिलबाग जी...

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  26. बढ़िया लिंक्स सुन्दर चर्चा,,,,
    मेरी रचना को शामिल करने के लिये आभार,,,,

    ReplyDelete
  27. बहुत सुन्दर लिंक्स ।

    ReplyDelete
  28. अच्छाई, राम की-
    बुराई, रावण की-
    सीख लेने की बनाई गई रीत
    अच्छाई की बुराई पर जीत
    विजय की खुशी मनाने का प्रतीक,
    विजयादशमी.

    बढ़िया है अभियक्ति धीरेन्द्र भाई साहब .आभार .

    मात्र पर्व नहीं, प्रतीक है विजयदशमी

    ReplyDelete
  29. अच्छा बिम्ब है जागी आँखों के ख़्वाब सा .

    पल पल झपकती
    पुतलियों के मध्य
    पनपता एक दृश्य
    श्वेत श्याम सा
    तैरता खारे पानी में
    होता बेकल
    उबरने को
    होने को रंगीन
    हर पल
    जाने क्या क्या समाये रखती हैं
    खुद में ये ठिठकी निगाहें।

    ReplyDelete
  30. अच्छा बिम्ब है जागी आँखों के ख़्वाब सा .

    पल पल झपकती
    पुतलियों के मध्य
    पनपता एक दृश्य
    श्वेत श्याम सा
    तैरता खारे पानी में
    होता बेकल
    उबरने को
    होने को रंगीन
    हर पल
    जाने क्या क्या समाये रखती हैं
    खुद में ये ठिठकी निगाहें।
    ठिठकी निगाहें


    ReplyDelete

  31. जहां बिछी हों
    कनक-रश्मियाँ
    जहां खिली हों
    कागज की कलियाँ
    गुंजन करते हों
    जहाँ पर ...
    भमरें संग
    बहुरंगी तितलियाँ
    उनसे नज़र बचाता चल

    कृत्रिमता पर कटाक्ष .

    मोती पाना है गर तो ?
    साहिल को ठुकराता चल
    गम ना कर तूं
    गहराई से ....
    सागर में उतराता चल

    ऐ दिल गुनगुनाता चल
    गीत ख़ुशी के गाता चल ...

    जिसने जख्म दिए हैं तुमको
    उनको भी सहलाता चल ..
    धीरे-धीरे दुखी ह्रदय को
    खुद से ही बहलाता चल
    चलना अकेली है
    नियति निशा की
    उसको भी समझाता चल ...

    गीत में अविरल आगे बढ़ते जाने का आवाहन भी है दर्शन भी है :सफर आखिर अकेला है ,दुनिया का मेला है ,

    गीत ख़ुशी के गाता चल

    ReplyDelete
  32. बढ़िया लिंक्स सुन्दर चर्चा,,,,

    ReplyDelete
  33. Bahut bahut badhai ............ sabhi ko

    ReplyDelete




  34. अब इसको पढ़ें कैसे ?कहानी ब्लॉग पोस्ट पर भी उपलब्ध कराओ .तब तक के लिए बधाई .समीक्षा पढने के बाद .


    राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई है रश्मि जी कहानी

    ReplyDelete
  35. मार्क्सवाद को भारतीय संदर्भों में व्याख्यायित करने वाले हिंदी के मूर्ध्न्य लेखक रामविलास शर्मा का लेखन साहित्य तक सामित नही है, बल्कि उससे इतिहास, भाषाविज्ञान, समाजशास्त्र आदि अनेक अकादमिक क्षेत्र भी समृद्ध हैं। साहित्य के इस पुरोधा ने हिंदी साहित्य के करोड़ों हिंदी पाठकों को साहित्य की राग वेदना को समझने और इतिहास के घटनाक्रम को द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने में सक्षम बनाया है, इसलिए भी उनका युगांतकारी महत्व है। अपने विपुल लेखन के माध्यम से वे यह बता गए हैं कि कोई भी चीज द्वंद्व से परे नही है, हर चीज सापेक्ष है और हर संवृत्ति (Phenomena) गतिमान है। साहित्यिक आस्वाद की दृष्टि से उन्होंने इंद्रियबोध, भाव और विचार के पारस्परिक तादाम्य का विश्लेषण करना भी सिखाया।

    रामविलाश शर्मा के संपूर्ण कृतित्व पर अगर अचूक दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट होगा कि प्रचलित अर्थों में वे मात्र साहित्यिक समालोचक न थे। वे साहित्य, कला एवं ज्ञान विज्ञान के विभिन्न अनुशासन के क्षेत्र में बौद्धिक हस्तक्षेप करने वाले अग्रणी कृतिकार, विद्वान और चिंतक थे। हालांकि, उनका साहित्यिक जीवन कविता लिखने के क्रम में हुआ था। झांसी में इंटरमीडिएट कक्षा के जब वे क्षात्र थे, तभी अंग्रेजी राज्य के विरूद्ध ‘हम गोरे हैं’ शीर्षक कविता लिखी थी। जब वे लखनउ विश्वविद्यालय से बी.ए (आनर्स) कर रहे थे,

    । इसके अलावा उन्होंने अगिया बैताल और निरंजन के उपनाम से वे राजनीतिक व्यंग कविताएं लिख रहे थे।यहां उल्लेखनीय है कि साहित्यिक सृजन के इस प्रारंभिक दौर में रामविलाश जी का

    प्रतिक्रिया :

    राम विलास पासवान जी हिंदी के प्रबल हिमायती थे .उनका मत था शब्द निर्मिती हिंदी के शब्दों से प्रत्यय लगाके की जाए जैसे इतिहास में इक जोड़ इतिहासिक ,विज्ञान में विज्ञानिक (साइंटिस्ट के लिए )अब हिंदी वाले वैज्ञानिक कार्य और साइंटिस्ट के लिए एक ही शब्द प्रयोग वैज्ञानिक में रमें हैं .हमने उन्हीं से विज्ञानी लिखना सीखा और अगले ही पल इसका प्रयोग जन प्रिय विज्ञान में शुरू कर दिया था .
    )
    आपने एक विस्तृत आलेख श्रम करके उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर मुहैया करवाया है आभार .बधाई।

    (मूर्धन्य ,युगान्तर -कारी ,तादात्मय , छात्र ,लखनऊ ,व्यंग्य .............)

    (बंधुवर आजकल वर्तनी की अशुद्धि /चूक की और संकेत कर दो तो लोग गाली गलौंच ,अप -भाषा पे उतर आतें हैं क्या आप भी हमसे नाराज़ हैं आना जाना छोड़ दिया .हम मेहनत करके अच्छी रचनाएं सभी पूरी पढ़तें हैं सिर्फ बढ़िया ,बढ़िया ,नाइस ,नाइस ,सुन्दर प्रस्तुति नहीं करते .नाराज़ हो तो मान जाओ .श्याम पैयां परूँ ,तोसे विनती करूं .)

    रूठे सुजन मनाइए ,जो रूठे सौ बार ,

    रहिमन फिर फिर पाइए टूटे मुक्ताहार .

    प्रेम सरोवर जी याद दिलवा रहे है रामविलास शर्मा जी की


    ReplyDelete
  36. रूठे सुजन मनाइए ,जो रूठे सौ बार ,

    रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार .

    ReplyDelete

  37. धर्म पताका फहराने , पापी को सबक सिखाने ,
    चली राम की सेना रावण का दंभ मिटाने !
    हर हर हर हर महादेव !

    रावण के अनाचारों से डरकर वसुधा है डोली ,
    दुष्ट ने ऋषियों के प्राणों से खेली खून की होली ,
    सत्यमेव जयते की ज्योति त्रिलोकों में जगाने !
    चली राम की सेना ........................
    हर हर हर हर महादेव !

    तीन लोक में रावण के आतंक का बजता डंका ,
    कैसे मिटेगा भय रावण का देवों को आशंका ?
    मायावी की माया से सबको मुक्ति दिलवाने !
    चली राम की सेना ........................
    हर हर हर हर महादेव !

    जिस रावण ने छल से हर ली पंचवटी से सीता ,
    शीश कटे उस रावण का , करें राम ये कर्म पुनीता ,
    पतिव्रता नारी को खोया सम्मान दिलाने !
    चली राम की सेना ......
    हर हर हर हर महादेव !

    एकोअहम के दर्प में जिसने त्राहि त्राहि मचाई ,
    उस रावण का बनकर काल आज चले रघुराई ,
    निशिचरहीन करूंगा धरती अपना वचन निभाने !
    चली राम की सेना .....................
    हर हर हर हर महादेव !

    शिखा कौशिक 'नूतन'

    सस्वर पाठ इस रचना का बालिका स्वर में मन को मुग्ध कर गया .गति और आवेग दोनों लिए है यह रचना कथ्य के अनुरूप .बधाई .कंठ कोकिला बालिका को भी कवियित्री को भी .

    ReplyDelete
  38. हां महज़ एक रस्म अदायगी है .पिष्ट पेशन है .मन को भ्रमित करना है रावण मारा गया .


    पुतले का दहन बस मनोरंजन भर

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।