चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Wednesday, February 05, 2014

"रेखाचित्र और स्मृतियाँ" (चर्चा मंच-1514)

मित्रों!
स्लो कनक्शन है।
चर्चा लगाने की रस्म ही पूरी कर रहा हूँ बस।
मेरी पसंद के लिंक देखिए।
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मधुमास दोहावली 
शुक्ल पंचमी माघ से ,शुरू शरद का अंत 
पवन बसंती है चली, आया नवल बसंत । 
ले आया मधुमास है, चंचल मस्त फुहार 
पीली चादर ओढ़ के, धरा करे शृंगार ...
गुज़ारिश पर सरिता भाटिया 
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""बगुला भगत" 

बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।

अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।...
नन्हे सुमन
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शीर्षकहीन 
* आम आदमी पार्टी * 
*आप ने साल भर में ही में रंग अपना जमाया है * 
*समझते ही नहीं थे जो समझ में उनकी आया है....
"मेरी पुस्तक - प्रकाशित रचनाएँ : प्रेम फ़र्रुखाबादी"
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गज़ल 

हे वसन्त ! तू अपने जैसा मधुमय कर दे। 
जितना रसमय है तू, मुझको भी रसमय कर दे...
अंजुमन पर डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन'
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शीर्षकहीन 

*वन्दे चरण * 
*हे माता सरस्वती * 
*करूँ वन्दन * 
* माँ सरस्वती जयंती पर सभी को शुभकामनाएं!*
अंतर्मन की लहरें पर सारिका मुकेश 
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दोहावली - -  
अपने समाज देश के, करो व्याधि पहचान । 
रोग वाहक आप सभी, चिकित्सक भी महान ...
आपका ब्लॉग
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भराव शून्यता का 


बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती को नमन करते हुए 
यह रचना सुश्री रश्मि प्रभा जी को समर्पित --

जब न हो संघर्ष जीवन में 
और न ही हो कोई विषमता 

तो वक़्त के साथ 
कुछ उदास सा 
हो जाता है मन 
सहज सरल सा 
जीवन भी ले आता है 
कुछ खालीपन .
गीत.......मेरी अनुभूतियाँ
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गज़ल 

हे वसन्त ! तू अपने जैसा मधुमय कर दे।
जितना रसमय है तू, मुझको भी रसमय कर दे॥१॥
प्रतिपल, प्रतिक्षण बहती है रसधार तुझमें।
मुझ पर भी तू प्यार की बौछार कर दे॥२॥
अंजुमन
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एक ख़त चलते-चलाते ज़िन्दगी के नाम .. 
एक ख़त चलते-चलाते ज़िन्दगी के नाम लिख दूँ ! 
लिखा है आधा-अधूरा बहुत बाकी रह गया पर ,
 तू अगर चाहे बता सारे सुबह औ'शाम लिख दूँ ....
शिप्रा की लहरें
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धरा पर बसंत ऋतु आई.... 
 
-मुरझाई सी अमराई में 
है गुनगुन भौरों की आहट 
खि‍ले बौर अमि‍या में 
मंजरी की सुगंध छाई 
धूप ने पकड़ा प्रकृति‍ का धानी आंचल 
देख सुहानी रूत फूली सरसों,....
रूप-अरूप
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15 comments:

  1. सुप्रभात
    वसंतमय चर्चा |
    आशा

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  2. बहुत मेहनत से सजी है बासंती चर्चा । उल्लूक का "हर शुभचिंतक अपने अंदाज से पहचान बनाता है " को भी जगह मिली है । आभार ।

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  3. सुन्दर चर्चा -
    आभार गुरूजी
    धनबाद आ गया हूँ-
    सादर

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  4. अच्छी चर्चा ... आभार मुझे शामिल करने के लिए .

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  5. अत्यन्त रोचक व पठनीय सूत्र

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  6. रूपचन्द्र जी, मेरे आलेख को चर्चामँच में जगह देने के लिए बहुत धन्यवाद :)

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  7. सुन्दर वासन्ती चर्चा -आभार !

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  8. सुंदर चर्चा...मेरी रचना शामि‍ल करने के लि‍ए आभार..

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  9. मधुमास दोहावली में खुलकर मधु रिसा है।

    मधुमास दोहावली
    शुक्ल पंचमी माघ से ,शुरू शरद का अंत
    पवन बसंती है चली, आया नवल बसंत ।
    ले आया मधुमास है, चंचल मस्त फुहार
    पीली चादर ओढ़ के, धरा करे शृंगार ...
    गुज़ारिश पर सरिता भाटिया

    ReplyDelete
  10. मधुमास दोहावली में खुलकर मधु रिसा है।

    मधुमास दोहावली
    शुक्ल पंचमी माघ से ,शुरू शरद का अंत
    पवन बसंती है चली, आया नवल बसंत ।
    ले आया मधुमास है, चंचल मस्त फुहार
    पीली चादर ओढ़ के, धरा करे शृंगार ...
    गुज़ारिश पर सरिता भाटिया 

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  11. कोई भी कुत्ता
    विस्फोटक का पता
    सूंघ कर ही
    लगाता है
    इसी लिये हर
    शुभचिंतक
    चिंता को दूर
    करने के लिये
    खबरों को
    सूंघता हुआ
    पाया जाता है

    बिम्ब प्रधान सुन्दर रचना सशक्त अर्थ अन्विति भाव के साथ

    सुन्दर मनोहर

    हर शुभचिंतक
    अपने अंदाज से पहचान बनाता है
    My Photo
    सुशील जोशी
    उल्लूक टाईम्स--

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  12. सगरे कुल का यह घाती

    प्रजातंत्र का प्रतिघाती है।


    बगुला भगत बना है कैसा?
    लगता एक तपस्वी जैसा।।

    अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
    एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।

    धवल दूध सा उजला तन है।
    जिसमें बसता काला मन है।।

    मीनों के कुल का घाती है।
    नेता जी का यह नाती है।।


    सगरे कुल का यह घाती है।

    ReplyDelete

  13. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रेरक दोहावली।

    भ्रष्‍टाचार बने यहां, कलंक अपने माथ ।
    कलंक धोना आपको, देना मत तुम साथ ।।

    हल्ला भ्रष्‍टाचार का, करते हैं सब कोय ।
    जो बदलें निज आचरण, हल्ला काहे होय ।।

    घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग ।
    रक्तबीज के रक्त ये, मिटे कहां मन लोभ ।।

    रूकता ना बलत्कार क्यों, कठोर विधान होय ।
    चरित्र भय से होय ना, गढ़े इसे सब कोय ।।

    जन्म भये शिशु गर्भ से, कच्ची मिट्टी जान ।
    बन जाओ कुम्हार तुम, कुंभ गढ़ो तब शान ।।

    लिखना पढना क्यो करे, समझो तुम सब बात ।
    देश धर्म का मान हो, गांव परिवार साथ ।।

    पुत्र सदा लाठी बने, कहते हैं मां बाप ।
    उनकी इच्छा पूर्ण कर, जो हो उनके आप ।।


    बहुत सुन्दर और सार्थक प्रेरक दोहावली।

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