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Wednesday, September 11, 2013

हम बेटी के बाप, हमेशा रहते चिंतित- : चर्चा मंच 1365-


क्षिति को शिला जीत उकसाए । कामातुर अँधा हो जाए ।"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव"अंक - 35
एक भाव-तीन विधा
कुण्डलियाँ 
क्षिति जल पावक नभ हवा, घटिया कच्चा माल ।
निर्माना पारम्परिक, दिया शोध बिन ढाल ।

दिया शोध बिन ढाल,  प्रदूषित-जल, छल-"काया" ।
रविकर पावक बाल, दंभ ने गाल बजाया ।

हवा होय अनुरक्ति, गगन पर थूके हर पल ।
निर्माता आलस्य, भस्म बन जाए "क्षिति" जल ॥

सवैया छंद

निरमान करे जल से क्षिति सान समीर अकाश सुखावत है |
पर पुष्ट नहीं हुइ पावत जू तब पावक पिंड पकावत है |
जब काम बढे प्रभु नाम बढे, तब ठेकप काम करावत है |
परदूषित पंचक तत्व मिले,  बन मानव दानव आवत है ||

''निर्माता''

सरिता भाटिया 


क्यूँ कर बहार आए

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’




कुछ गर्द उड़ी कुछ सीलन थी

smt. Ajit Gupta 

एक क्लिक में जानें आप के वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल कौन कौन कर रहा है !

Faiyaz Ahmad 


श्रीमदभगवद गीता अध्याय तीन : श्लोक १६

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आजादी पर आत्मचिन्तन ... 2

केवल राम :

श्री गणेश सहस्रनाम स्तोत्र

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SANDEEP PANWAR 

 


जो खुद को खुदा समझते  हैं 

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 samandar 





"हिन्दी वाले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अंग्रेजी भाषा के हम तो, खाने लगे निवाले हैं
खान-पान-परिधान विदेशी, फिर भी हिन्दी वाले हैं

अपनी गठरी कभी न खोली, उनके थाल खँगाल रहे
अपनी माता को दुत्कारा, उनकी माता पाल रहे

कुछ काले अंग्रेज, देश के बने हुए रखवाले हैं
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 

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शिक्षित बन नवगीत रच दो

यूँ फ़लक को चूमने कीऔर हवा में घूमने कीआरजू है नव उमंग कीकोशिशें हैं नव तरंग की...
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु 
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गणपति बाप्पा मोरिया, हरो हमारी पीर
Hasya Kavi Albela Khatri

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या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोये। 
ज्यों ज्यों बुड़े श्याम रंग त्यों त्यों उज्जल होये।आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma 
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पुरानी पाती और लाल ख्वाब

अमृतरस पर डॉ. नूतन डिमरी गैरोला

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अल्हड़पन -

उन्नयन (UNNAYANA)

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अपनीं कारगुजारियों और नाकामियों को 
छुपानें की नाकाम कोशिश !!

शंखनाद पर पूरण खण्डेलवाल 

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गणेश चतुर्थी भाग 2.

ॐ ..प्रीतम साक्षात्कार ..ॐ

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मार्मिक पल... 
जब वरिष्ठ पत्रकार शोक सभा में रो पड़े....

चौथाखंभा पर ARUN SATHI

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"स्वप्न सलोने"
काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"स्वप्न सलोने"
 मन के नभ पर श्यामघटाएँ, अक्सर ही छा जाती हैं।
तन्द्रिल आँखों में मधुरिम से, स्वप्न सलोने लाती हैं।।

निन्दिया में आभासी दुनिया, कितनी सच्ची लगती है,
परियों की रसवन्ती बतियाँ, सबसे अच्छी लगती हैं,
जन्नत की मृदुगन्ध हमारे, तन-मन को महकाती है।
तन्द्रिल आँखों में मधुरिम से, स्वप्न सलोने लाती हैं।।
"धरा के रंग"

18 comments:

  1. शुभ प्रभात भाई रविकर जी
    शानदार चर्चा में शानदार पठनीय लिंक्स
    आभार

    सादर

    ReplyDelete
  2. क्या खूब चर्चा की है...

    सादर।

    ReplyDelete
  3. वाह---सुन्दर प्रस्तुति...सुप्रभात..।
    आज की चर्चा बाँचकर आनन्द आ गया।
    आभार रविकर जी।

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  4. रविकर की है चर्चा
    खूब किया है खर्चा
    420 उल्लूक का
    दिखा दिया है पर्चा !
    आभार !

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  5. मन प्रफुलित हुआ आज की रंग बिरंगी चर्चा देखकर ,वाह वाह रविकर sir
    बहुत बहुत आभार मेरी दो दो रचनाओं को स्थन मिला |कृपया मुझे यह वाला कलर बॉक्स मुझे मेल कर दें |
    saru.bhatia66@gmail.com

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  6. सुन्दर सूत्रों का सुन्दर संकलन !!
    गणेशोत्सव की हार्दिक बधाइयों के साथ सादर आभार !!

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति..आभार

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति..आभार

    ReplyDelete
  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..आभार

    ReplyDelete
  10. रविकर जी, बहुत श्रम से सजाई इस चर्चा के लिए बधाई..आभार मुझे इसमें शामिल करने के लिए.

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  11. सुन्दर संयोजन

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  12. सुन्दर सूत्रों का सुन्दर संकलन !!आभार.

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  13. अच्छे संकलन हैं ...बधाई...

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  14. सुन्दर और पठनीय सूत्र..

    ReplyDelete

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