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Saturday, September 03, 2016

"बचपन की गलियाँ" (चर्चा अंक-2454)

मित्रों 
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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बचपन की गलियाँ 

कल ज़िंदगी मेरे पास आई 
चुपके से मुस्कुराई 
हौले से मेरे बाल सहलाये
धीरे से गालों पर चपत लगाई 
और फिर मेरी उंगली पकड़ 
मुझे उठा ले गयी 
दूर बहुत दूर 
बचपन की उन 
भूली बिसरी गलियों में... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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मंजिल मिले न मिले... 

विजय कुमार सुखवानी 

न मिली छांव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले 
वीरान ही मिले सफ़र में जो भी शहर मिले 
मंजिल मिले न मिले, मुझे काई परवाह नहीं 
मुझे तलाश है मंज़िल की, मंज़िल को ख़बर मिले... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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लोग जाने शहर में....किस तरह जी रहे हैं,
इन हवाओं में शामिल ज़हर तक पी रहे हैं |
गाँव जब से उठे हैं....शहर की चाल लेकर,
तब से चादर ग़मों की....शहरिये सी रहे हैं |  

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कौआ को कर दे दुखी, श्वेत बतख का रंग | 
हरा रहा तोता हरा, वहीँ बतख को जंग | 
वहीँ बतख को जंग, किन्तु तोता यूँ कहता | 
रंग-विरंगा मोर, नाचता हरदम रहता... 
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 रात दिन जीवन मुझे खलता रहा | 
प्यार और विश्वास भी छलता रहा | 
क्या बुझाएगी हवा उस दीप को 
जो सदा तूफान में जलता रहा... 
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राजनीति का दाढ़ी-युग बैंक का 
कोई कर्मचारी नहीं चाहता कि 
उसे किसी ग्राहक की शक्ल दिखाई दे | 
वे तो चाहते हैं कि लोग ए.टी.एम.से पैसा निकालें, 
ईबैन्किंग ... 
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समय के साथ कदमताल करता संघ  

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ प्रतिवर्ष दशहरे पर पथ संचलन (परेड) निकालता है। संचलन में हजारों स्वयंसेवक एक साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते जाते हैं। संचलन में सब कदम मिलाकर चल सकें, इसके लिए संघ स्थान (जहाँ शाखा लगती है) पर स्वयंसेवकों को 'कदमताल' का अभ्यास कराया जाता है। स्वयंसेवकों के लिए इस कदमताल का संदेश है कि हमें सबके साथ चलना है और सबको साथ लेकर चलना है। संघ की गणवेश में बदलाव का मूल भाव भी 'सबको साथ लाने के लिए समयानुकूल परिर्वतन' है। हालांकि, विरोधियों ने इसमें भी संघ निंदा का प्रसंग खोज लिया। आलोचक कह रहे हैं कि संघ ने 90 साल बाद 'चोला' बदल लिया। संघ के ज्यादातर आलोचक विटामिन 'ए' की कमी से होने वाले रोग 'रतौंधी' का शिकार हैं... 
अपना पंचू
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जी लेती हूँ 

 चिप्स, कुरकुरे, पीज्जा, वर्गर के लिय माँ से जिद करते हैं तो मैं माँ से यादों में चिपक जाती हूँ दाल पीसती खाना बनाती माँ की पीठ पर लटकना फिर चुपचाप खटाई चीनी हथेली पर रख किसी कोने में छिप कर चाटना। वैसे दूसरी मंजिल का जीना इस सब कामों के लिये सुरक्षित था। कतारे, इमली, खट्टी-मीठी गोलियाँ यह छिपकर खाना हमारा मुख्य खाना होता। छुट्टियों में तो पेटों में जैसे भूत बैठ जाते जो भी घर में होता नहीं बचता डिब्बे के डिब्बे साफ होते। सारा दिन
धमा-चैकड़ी, बड़ा सा आंगन धूप हो या बारिश गरमी हो या सर्दी हम बच्चों के शोर से गुलजार रहता। जितनी महिलाएँ थी सब सब बच्चों की माँ थी कोई भी डांट जाता चिल्ला जाता खाने को पकड़ा जाता किसी भी का पल्ला खींच जो चाहते मांग लेते, याद आती है वो कई कई माँए और देखती हॅंू आज की माॅं बच्चे के मन पसंद खाने को भी लिये  उनके पीछे दौड़ती रहती हैं ।  
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3 comments:

  1. सुन्दर शनिवारीय चर्चा ।

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  2. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  3. बहुत सुन्दर सार्थक सूत्र शास्त्री जी ! आज की चर्चा में मेरी रचना 'बचपन की गलियाँ' को शामिल करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार !

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