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Friday, February 28, 2020

धर्म -मज़हब का मरम (चर्चाअंक -3625 )

सादर प्रणाम 
हार्दिक अभिवादन 
पिछले शुक्रवारीय अंक में ' एक कोना ' के ज़रिये आदरणीया अनु दीदी जी ने ' चर्चामंच ' पर एक सराहनीय प्रयोग किया था। जिसमें एक सुखद संदेश निहित था। किंतु उसे पढ़कर मेरे मन में एक शब्द को लेकर कई प्रश्नों ने जन्म ले लिया। वो शब्द जो देश ही नही विश्व भर के मन मस्तिष्क और जुबां पर छाया हुआ है। वो एक शब्द जिसके पीछे आज लोग मरने मारने पर उतर आए हैं। वो एक शब्द जिस पर आज राजनीति चल रही है। वो एक शब्द जो आज लोगों के लिए संविधान से भी ऊँचा हो चला है और जिसको आधार बनाकर आज वोट माँगे और दिए जाते हैं। वो एक शब्द है ' धर्म ' जिसकी चर्चा आज बड़े ही नही बच्चे भी करते हैं। ये मात्र एक शब्द नही बल्कि हवा है जो समाज की विचारधारा को दिशा दे रही है। अब हमारे मन में एक प्रश्न है कि ये धर्म है क्या? क्या हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई यही धर्म है? किंतु यह तो मात्र संप्रदाय हैं। तो क्या धर्म इन संप्रदायों को कहेंगे? क्या श्रीमद्भागवत गीता में भगवान वासुदेव इसी धर्म की रक्षा हेतु बारंबार अवतार लेते की बात कर रहे थे? क्या इसी धर्म की स्थापना हेतु महाभारत हुई? क्या भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के संदेशों में इसी धर्म का बखान है? यदि नही, तो इस धर्म अर्थात् संप्रदाय के पीछे इतना शोर क्यों? क्यों हमे इन धर्मों में इन संप्रदायों में बँटे रहने की आवश्यकता है? जब मुहम्मद पैगम्बर और भगवान गुरु नानक देव जी ने यह कह दिया कि ईश्वर एक हैं तो हम क्यों इतने संप्रदायों में बँट कर उस एक ईश्वर की आराधना करते हैं? क्या हम एक रहकर अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार भक्ति,साधना नही कर सकते? क्या हम एक होकर अपने अपने पर्व आदि नही मना सकते?
कहते हैं कि ' धर्म ' वो जो धारण करने योग्य हो। तो क्या यहाँ भिन्न संप्रदायों के रंग को धारण करने की बात कही गयी है? यदि नही, तो धारण क्या करें? 
कहते हैं कि 'परोपकार' परम धर्म है। और परोपकार ही तो मानवता का परिचय है। अर्थात् क्या मानवता परम धर्म है? यदि हाँ, तो हम क्यों इस परम धर्म को उन संप्रदायों के पीछे त्यागते जा रहे हैं जो केवल मानवता का हनन करती हैं?क्यों हम उस धर्म को धारण किए बैठे हैं जिसमें से अब स्वार्थ,ईर्षा अहंकार आदि की दुर्गंध आती है? ऐसा क्या है इन संप्रदायों में जिसके आगे परम धर्म 'मनुष्यता ' को झुकना पड़ रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढना आज समय की माँग भी है और हमारा कर्म भी। तो चलिए इन्ही प्रश्नों को अपने अंतर में समेटते हुए बढ़ते हैं आज के लिंकों की ओर।
-आँचल 
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प्रेम और सौहार्द्र है, होली का आधार।
बैर-भाव को भूलकर, कर लो सबसे प्यार।।
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अर्द्ध-यामिनी~ 
जलते घरोंदों में 
इंसानी शव। 
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देखो 'जी'!
लाशों की शुरुआत
'संज्ञा' से होकर
 'विशेषण' पर खतम होती है।
मतलब
  'नागरिकता'  मिलती है
पहले को ही।
फिर तो ,
गिनती शुरू होती है!
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आज तुमसे कुछ कहना चाह रही हूँ ,समय मिले तब पढना ।
 अपने शरीर की संभाल करना बहुत जरूरी है ,तुम स्वस्थ्य रहोगी तभी तो अपने बच्चों व परिवार का ध्यान रख सकोगी । अपने खाने-पीने का ध्यान रखो । अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है जीवन में ,बच्चों को पढा-लिखा कर बहुत आगे भेजना है । 
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प्रकाश के लिए सूरज बनाना तो नहीं है, न ही कहीं से लाना है,आत्मा है, हमने रोक हुआ है उसका मार्ग. देह स्थूल है, मन भी स्थूल है, देह प्रकृति है, मन भी प्रकृति का अंग है, जो पल-पल बदल रही है,
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उस  धुँए में कुछ पक रहा था
 शायद कुछ सपने..!
 कुछ रोटी के कुछ खीर के,
या शायद दाल मास 
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मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
पूछ पवन संदेश बहे।
प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
भानु-तपिश जो देख रहे,
जनमानस की हृदय वेदना,
अहं झूलती सृजन कहे।
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मौन रहकर सोचता मन,
आग यह कैसी लगी है।
राख सपने भी हुए है,
हर तरफ उठता धुआँ है।
ढूँढ़ते अब राख में हम ,
सुलगे हुए स्वप्न सिंदूरी
शब्द जालों में उलझती,
बनी नहीं कविता पूरी।।
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तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।
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कबीर !  
तू आज फिर से  
बहुत याद आ रहा
है !
और
साहिर ! तूने क्या अपनी नज़्म -
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कोई
पूछे अगर
क्या
गिन रहे हैं
शर्माना नहीं है

कह देना है
 मुँह पर
ही
लाशें
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"घोर अनर्थ!"
"महापाप!"
"तुम जाहिलों की वज़ह से ही हमारे रेल मंत्रालय को लगातार घाटा हो रहा है।"
"वो ज़माना ही ठीक था जब तुम जैसे मैले-कुचैले लोग पैदल ही चला करते थे।"
"सरकार ने क्या ढील दी तुम लोग तो सर पर ही लघुशंका करने पर उतारू हो गये हो!"
"अरे, जिनको हमने सदियों तक अपने कुएँ के अगल-बगल भटकने नहीं दिया और आज हमें इस ख़ोखले लोकतंत्र की वज़ह से तुम लोगों के साथ गले में गला डालकर यात्रा करना पड़ रहा है।"
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आज के लिए बस इतना ही 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति के संग 
तब तक आप सब अपना बहुत खयाल रखिए और अपने वतन में सब मंगल हो एसी कामना करिए।
पुनः प्रणाम 
जय हिंद 
--

16 comments:

  1. धर्म को जानने के लिए बड़ी-बड़ी पोथियों को क्या पढ़ना और लम्बे निबंध लिखने की भी आवश्यकता नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने दो वाक्य इसे उसी तरह से बता दिया है, जिसप्रकार संत कबीर ने ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाले को सच्चा पंडित बताया था-

    ”परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।
    पर पीड़ा सम नहिं अघमाई ।।”

    सुंदर भूमिका एवं प्रस्तुति ,आँचल जी।
    सभी को सादर प्रणाम।

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  2. बेहतरीन चर्चा अंक आँचल जी द्वारा। सरस,सामायिक एवं पठनीय रचनाओं का सुंदर संकलन। सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    सांप्रदायिक नफ़रत और धर्मान्धता के जलते देश में अमन-चैन ख़तरे में पड़ चुका है जिससे कुछ कट्टरवादी धर्म और राजनीति के ठेकेदार और उनके अंध-समर्थक अति प्रसन्न हैं जो एक बिडंबना है। आपकी विस्तृत एवं विचारोत्तेजक भूमिका लू के थपेड़ों में ठंडी फुहार जैसी है।

    मेरी रचना को आज के चर्चा अंक में शामिल करने हेतु बहुत-बहुत आभार।

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  3. समझेगा इंसान कब, बस इतनी सी बात।
    रक्त सभी का लाल है, एक मनुज की जात।।
    --
    धन्यवाद आँचल पाण्डेय जी।
    सुप्रभात सभी पाठकों को।

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    1. रक्त सभी का लाल है, किन्तु गुण में भेद
      कोई है दाता, कोई याचक, यहीं है भारी खेद।
      यहीं है भारी खेद, न समझे मनुज ज्ञान यह गुह
      तन और बसन अलग दिखे, गहे एक ही रूह।😀🙏

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  4. व्यथित मन से लिखी गई चिन्तनपरक भूमिका के साथ सराहनीय प्रस्तुति ।

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  5. आंचल ! तुमने अपने आलेख में बड़े ही ज्वलंत प्रश्न उठाए हैं.
    हमारा अज्ञान, हमारी पूर्व-निश्चित धारणाएं और हमारी स्वार्थपरता, हमको धर्मांध बनाती हैं.
    बिना पढ़ा-लिखा कबीर धरम का मरम जानता था लेकिन हम में से लाखों-करोड़ों उस से आज भी अनजान हैं.

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  6. प्रिय आँचल ,बहुत ही खूबसूरती के साथ अपने मन के विचारों कै प्रस्तुत किया है आपने । साम्प्रदायिक नफरत ,हिंसा ,तोडफ़ोड़ आखिर कब तक ? कब समझेगा मानव कि वास्तव में धर्म है क्या ? हिंसा ,मारकाट ये तो धर्म नहीं ...। सद्भावना का झरना कब बहेगा ? ईश्वर सबको ऐसी समझ प्रदान करे । मेरी रचना को स्थान देने हेतु हृदयतल से आभार ।

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  7. धर्म पर सुंदर विचार और लिंक के साथ बढ़िया चर्चा

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  8. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  9. चिन्तनपरक भूमिका के साथ सराहनीय प्रस्तुति प्रिय आँचल ,तुमने सही कहा ये" धर्म " नहीं हैं ,सम्प्रदाय हैं और ये हिंसा सम्प्रदायिक भी ना होकर गन्दी राजनीति का घिनौना रूप हैं।" मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना " इस बात को आज की युवापीढ़ी अच्छे से समझ चुकी हैं। तुम्हे भी और सभी रचनाकारों को भी हार्दिक शुभकामनाएं।

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  10. विचारणीय भूमिका के साथ धर्म जैसे ज्वलंत मुद्दे पर उठाए गए तुम्हारे प्रश्न वाकई में सोचने को मजबूर करते हैं.. धर्म के नाम धार्मिक ठेकेदार बने लोग कितनी आसानी से इंसानों की भावनाओं के साथ खेल खेलते हैं.. और उनके जाल में फस कर शांति से रहने वाले लोग एक दूसरे की बस्तियां उजाड़ डालते हैं.. काश कि तुम्हारी तरह के ही विचार आज की युवा पीढ़ी के अंदर भी होते तो शायद इतना कुछ झेलना नहीं पड़ता...!
    अपनी उन्नत विचारों से हमेशा हम सबों के मार्ग को सरल बनाना इतनी शानदार भूमिका और सभी चयनित रचनाओं और मेरी रचना को भी शामिल करने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  11. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आँचल जी।

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  12. बहुत ही ज्वलंत मुद्दे पर विचारणीय भूमिका के साथ
    शानदार चर्चा प्रस्तुति....
    सभी शानदार एवं उत्कृष्ट रचनाओं के साथ मेरी रचना को स्थान देने के लिए तहेदिल से शुक्रिया
    धन्यवाद एवं आभार।

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  13. समयानुसार इस तरह की चर्चा प्रबुद्ध वर्ग को करते रहनी चाह‍िए , अनु जी आपका प्रयास बहुत ही उम्दा रहा।

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