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Tuesday, September 07, 2021

'गौरय्या का गाँव'(चर्चा अंक- 4180)

सादर अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आदरणीया कामिनी दी कहीं व्यस्त हैं आज फिर मुझे ही पढ़िए -

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ

--

उच्चारण: गीत "गौरय्या का गाँव" 

नहीं रहा अब समय सलोना,
बिखर गया ताना-बाना,
आगत का स्वागत-अभिनन्दन,
आज हो गया बेगाना,
कंकड़-काँटे चुभते अब तो,
पनिहारी के पाँव में।
दम घुटता है आज चमन की,
 ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।
--

और, और, थोड़ा और --

रोज़ सोचते हैं 
कल बदल लेंगे, 
रोज़ थोड़ा और निकल आता है।  
इस और और के चक्कर में,
इंसान का सारा 
जीवन ही निकल जाता है।  
खोजती रही मैं ..
अपने पादचिह्न
कभी आग पर चलते हुए
तो कभी पानी पर चलते हुए
खोजती रही मैं ..
अपनी प्रतिच्छाया
कभी रात के घुप्प अँधेरे में
--

सारे जग की खुशी तुम्हारे घर आकर मुस्कायेगी |

जीवन की बगिया के माली ,

एक गुलाब लगाओ |

महके सारी धरती जिससे ,

ऐसा फूल खिलाओ |

सारे जग की गंध तुम्हारी गली गली महकाएगी |

--

श्वास रहित है तन पिंजर

अमर लतिका स्नेह लिपटी
छिटक दूर क्यों कर जाए।
बिना मूल मैं तरु पसरी
जान कहाँ फिर बच पाए।
वह बच्चा
जो बीन रहा है
हर बिकाऊ वस्तु
कचरे के ढेर से
उसे नहीं डर 
न कोविड का
न किसी और संक्रमण का
वह तो
पैदायशी ग्रस्त है
ग़रीबी के वायरस से
 
पढ़ाकर भविष्य संवारूँगी
शिक्षक बनकर बदल दूँगी
सरकारी विद्यालय की छवि,
खूब सिखलाऊँगी बच्चों को
बनाऊँगी एक-एक को रवि।
कच्चे स्वप्नों में भरकर पक्के रंग
सुंदर कल और आज बनाऊँगी 
बदले दुनिया वो आवाज़ बनाऊँगी।
--
शिक्षक दिवस पर अपनी पहली फ़ुल-टाइम विद्यार्थी आपा की याद को एक बार फिर ताज़ा करते हुए -आपा - मिशन 50 प्रतिशत –
लखनऊ विश्वविद्यालय में मध्यकालीन एवं आधुनिक भारतीय इतिहास में एम० ए० करना मेरे लिए एक सुखद अनुभव था.
इतिहास पढना मुझे बेहद अच्छा लग रहा था.
हमारे विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नागर मुझे हमेशा बढ़ावा देते थे.
प्रोफ़ेसर नागर के प्रोत्साहन ने ही मुझ में अपने ही साथियों को पढ़ाने की हिम्मत दिलाई थी. पांच-छह साथियों को तो मैं अब बाकायदा पढाने भी लगा था.
हमारे क्लास में एक बुजुर्गवार मोहतरमा थीं.
--
हाथी और चींटी की तुलना फिर भी हो जाए पर भगवान और इंसान की तुलना का तो सोचना ही बेमानी और नादानी है ! दिव्य शक्तियों के सामर्थ्य के आंकलन में हमारी कल्पना भी भोथरी हो जाती है ! गति के परिपेक्ष्य में ही देखा जाए तो अभी तक दुनिया में सबसे तेज रफ़्तार प्रकाश की, लगभग एक सेकेण्ड में तीन लाख किमी., ज्ञात है ! हमारे लिए तो वही अद्भुत और सपने में भी अप्राप्य गति है ! मानव यंत्रों की अधिकतम चाल अभी तक सिर्फ सोलह किमी प्रति सेकंड तक ही पहुंच पाई है ! अपनी आकाशगंगा के नजदीकी ग्रहों तक पहुंचने में ही हमें महीनों लग जाते हैं ! यदि मानव अपने सबसे करीबी तारे अल्फा सेंटौरी तक ही जाना चाहे तो अब तक की रफ्तार से वह वहां 6000 साल में पहुंच पाएगा ! 
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
आगामी अंक में 

 

8 comments:

  1. सुंदर तथा शानदार सूत्रों से सजा अंक, बहुत शुभकामनाएँ आपको अनिता जी। सभी रचनाकारों को बधाई।

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  2. आपकी कर्मठता को नमन अनीता जी ! इस हफ्ते मैने भी अपनी प्रस्तुति का दायित्व आपको सौंप रखा है । बहुत सुन्दर और श्रमसाध्य प्रस्तुति ।

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  3. बढ़िया प्रस्तुति । गौरैया का गाँव और शरद सिंह जी की कविता - निर्लज्जता बेहद अच्छी है ।

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  4. सम्मिलित कर मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद ! स्नेह बना रहे

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  5. अरे! अभी नजर पड़ी औचित्य पर । वाकई! आपने तो फिर से औचित्य खोजने के लिए मजबूर कर दिया । जी! तहे दिल से शुक्रिया । बहुत अच्छा लगा यहाँ आकर ।

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  6. श्रम साध्य ख़ोज।
    बहुत सुंदर लिंक, सभी रचनाकारों को पढ़ना आनंदित करने वाला रहा,सभी लिंक बेहतरीन, रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरे सृजन को इस वेणी में गूँथने के लिए हृदय से आभार प्रिय अनिता आपकी प्रतिबद्धता को नमन।
    सस्नेह सादर।

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  7. बहुत सुन्दर सराहनीय प्रस्तुति

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  8. बहुत ही शानदार प्रस्तुति!आज एक बार फिर यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा सभी अंक बहुत ही खूबसूरत है!

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