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Friday, October 22, 2021

'शून्य का अर्थ'(चर्चा अंक-4225)

 सादर अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

 शीर्षक व काव्यांश आ.अनीता जी की रचना 'शून्य का अर्थ' से -

अमूर्त को मूर्त किया 

शब्द का रूप दिया 

उपजे थे चेतना से 

कोई नहीं जिससे परे 

अंतत: शून्य को ही 

 कलम पन्ने पर उतारती 

लाख प्रयत्न करें पर 

जिसे हम पढ़ नहीं पाते 

क्या इसीलिए लोग कविता के 

अपने-अपने अर्थ लगाते !


आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

गीत "जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं" 

जब हम गर्मी में की छुट्टी में, रोज नुमाइश जाते थे
इस मेले को दूर-दूर से, लोग देखने आते थे
सर्कस की वो हँसी-ठिठोली, भूल नहीं पाये अब तक
जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

घुटनों पर नोटबुक कलम हाथ में 

मानो कोरा काग़ज़ आमंत्रण दे 

दिल से होते 

कुछ बंध उतरे 

मन व हाथों में यह कैसा नाता है 

अंतर्जगत को जो पन्ने पर उकेर आता है 

--

शान्तम् सुखाय: सबसूं प्यारो लागै, म्हाने म्हारो गांव ( राजस्थानी कविता ) 

टाबर खेळ लुकमींचणी
घर री बाखळ मांय, 
मोर-मोरनी छतरी ताणै 
बड़-पीपल री छांव, 
सबसूं प्यारो लागै 
म्हाने म्हारो गांव। 
--

मन की वीणा - कुसुम कोठारी। : कह बतियाँ 

अपने मन की कह दूँ कुछ तो
कुछ सुनलूँ तुमसे भी घर की
साजन जब से परदेश गये
परछाई सी रहती डर की
कुछ न सुहाता है उन के बिन
विरह प्रेम की बस हूक जले।।
--
रात रात भर जग कर चन्दा
ढूँढ रहा है किसे गगन में ?
थक कर बेबस सो जाता है
दर्द दबा कर अपने मन में |
--

आजु प्रणय की रात

रंगमहल बीच झलर लगाऊँगी
झिलमिल तकिया मैं सेज सजाऊँगी
फूलन की बरसात, पिया तुम आ जाना

माँग मा मोरे सजी मोतियन लड़ियाँ 
छम छम बाजे पिया पैर पैजनियाँ 
मेहंदी रची मोरे हाथ, पिया तुम आ जाना

 साथियों से हाथ छुड़ाकर 

 बस चंद कदमों के फासले मे 

 ऐसी पडी नजर शैतान की 

 मूर्छित पडी दरिंदगी का शिकार हो कर 

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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं
वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
लोगों की भीड़ थी पार्क में 
जैसे कालीन बिछी ज़मीं पे 
एक ठेला चलाता हुआ दिखा 
जो भर-भर लाशें एक-एक 
“अच्छा! चलो चल कर देखते हैं।“ समुद्र की मछली ने उत्सुकता से कहा।
“हाँ-हाँ चलो, मैं वहीं ज़िंदा रह पाऊंगी, लेकिन क्या तुम मुझे वहां तक ले चलोगी?“
“हाँ ज़रूर, लेकिन तुम क्यों नहीं तैर पा रही?”
नदी की मछली ने समुद्र की मछली को थामते हुए उत्तर दिया,
“क्योंकि नदी की धारा के साथ बहते-बहते मुझमें अब विपरीत धारा में तैरने की शक्ति नहीं बची।“ 
--

 पाँच साल बाद…, वही डॉक्टर.., वही बैंगलुरू का इंदिरा नगर 

और वही वह …, बुखार और दर्द साथ लिए ।

 ऑन लाइन वीडियो कान्फ्रेंसिंग से बात बनती न देख फाइनली क्लीनिक की शरण लेनी पड़ी । तीन-चार घंटे में कभी ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर..ढेर सारे टेस्ट और चार-पाँच सीटिंगस् 

का फैसला ।

पुरानी जगह को देख पुराना डर उसके सामने  मुँह खोले खड़ा था जिस से डर कर  उसने वैसे ही आँखें बंद कर रखी थी जैसे कबूतर बिल्ली को देख कर कर लेता है । 

--

आज का सफ़र यहीं तक 
कल फिर मिलेंगे 

8 comments:

  1. सुंदर चर्चा

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  2. बहुत बहुत आभार आपका मेरी इस रचना को इस चर्चा अंक मे शामिल करने के लिए 🙏

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  3. शीर्षक पंक्तियां गहन भाव पूर्ण।
    सुंदर सार्थक चर्चा,सभी लिंक बेहतरीन।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

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  4. बहुत बहुत आभार अनीता जी, 'शून्य का अर्थ' को चर्चा मंच के शीर्षक में स्थान देने के लिए, अन्य सभी रचनाकारों को बधाई और शुभकामनाएँ !

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  5. बेहतरीन संकलन । सभी सूत्र अति उत्तम । संकलन मेरे सृजन को सम्मिलित करने के लिए आभार अनीता जी!

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  6. सुंदर सार्थक रचनाओं का संकलन । कई उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ीं, उनके मध्य मेरे गीत को स्थान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार अनीता जी ।मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  7. बहुत शानदार चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीया अनीता सैनी जी।

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  8. Behad sundar sankalan rachanaon ka, meri rachana ko yahan shamil karne ke liye behad shukriya
    Abhar

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