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Saturday, October 30, 2021

'मन: स्थिति'(चर्चा अंक4232)

सादर अभिवादन। 
आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


 शीर्षक व काव्यांश आ. कुसुम कोठारी जी की रचना 'मन: स्थिति' से -


दाग अपने सब छुपाते धूल दूजों पर  उड़ाते ।
दिख रहा जो स्वर्ण जैसा पात खोटा ही लिए है।।
रह रहे मन मार कर भी कुछ यहाँ संसार में तो।
धीर कितनें जो यहाँ विष पान करके भी जिए है।।


आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

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दोहे "पंच पर्व नजदीक" 

पंच पर्व नजदीक है, सजे हुए बाजार।
महँगाई के सामने, जनता है लाचार।।
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लाभ कमाती तेल मेंभारत की सरकार।
झेल रही जनता बहुतमहँगाई की मार।।
इस से बड़ी खुशखबरी और क्या हो सकती है कि भैया आर्यन जेल से छूटने वाले हैं.
सुना है कि श्री राम जब चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो पहली बार दीपोत्सव का आयोजन हुआ था.
अब 26 दिन या 27 दिन बाद भैया जी की घर वापसी होगी तो एक नए दीपोत्सव का आयोजन किया जाना तो बनता है. मेरा तो सुझाव है कि इस बार दीपावली हम आर्यन भैया की रिहाई के दिन ही मना लें न कि अमावस्या होने का इंतज़ार करें. वैसे भी पेट्रोल-डीज़ल के नित बढ़ते दामों की वजह से हमारे बजट को तो रोज़ ही अमावसी रात के अँधेरे का सामना करना पड़ता है.
आज जीने के लिये लो चेल कितने ही सिए हैं।
मान कर सुरभोग विष के घूँट कितनों ने पिए हैं।।
दाग अपने सब छुपाते धूल दूजों पर  उड़ाते ।
दिख रहा जो स्वर्ण जैसा पात खोटा ही लिए है।।

इन्द्रनील सा नभ नीरव है

लो अवसान हुआ दिनकर का,

इंगुर छाया पश्चिम में ज्यों  

हो श्रृंगार सांध्य बाला का !

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अनुसूचित

अनुसूचित जान कर भी बचपन में 
 क्यों पहले न  किया परहेज मुझ से  
मन को बड़ा संताप हुआ
 क्यों छला मुझे |
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दक्षिणा
मैं घटना की मूक साक्षी बनी
पेमेंट और दक्षिणा में उलझी रही,
आते जाते गडमड करते विचारों को
आज के परिपेक्ष्य में सुलझाती रही।
नहीं कोई चर्चा करता
दीवारों के उस पार उनकी
नहीं जान पाता पीड़ा
दीवारों के पार उनकी
वे सोए रहते हैं
खोए रहते हैं 
दबे रहते हैं
बंद कमरों में ही
  कमला बड़बड़ाती  हुई घर में घुसी और तेजी से काम करने में जुट गयी लेकिन उसका बड़बड़ाना  बंद नहीं था। 
"अरे कमला क्या हुआ ? क्यों गुस्सा में हो?"
"कुछ नहीं दीदी, मैं तो छिपकली और गिरगिट से परेशान हूँ। "
"ये कहाँ से आ गए ?"
" ये तो मेरे घर में हमेशा से थे, मैं अपने कमरे में बात करूँ तो ननद हर वक्त कान लगाए रहती है और घर से वह कहीं चली जाए तो ससुर का रंग दूसरा होता है और उसके होने पर दूसरा।"
"सही है न, काम निकलना चाहिए। "
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एक भावुक लड़का लल्लू उर्फ लालचंद हजारे जुर्म की दुनिया का बड़ा नाम बनने की इच्छा से धारावी के कुख्यात और पेशेवर अपराधी एंथोनी फ्रांकोज़ा और दुर्दांत कातिल अब्बास अली के साथ काम करने का फैसला लेता है । अपराध की दुनिया में अपना सिक्का जमा चुके इन दोनो मवालियो की सरपरस्ती में वो अपने लिए भी एक सम्मानजनक स्थान बनाने का सपना देखता है। उसे इस अपराध के दलदल में फँसने से बचाने की हरसंभव कोशिश करता है एक कर्त्तव्यपरायण इंस्पेक्टर  यशवंत अष्टकेर -जो अपने बेटे के हत्यारे की तलाश में है। लेकिन वह लल्लू उर्फ लालचंद हजारे को अपने फैसले से डिगा नहीं पाता । उसे बुराई से अच्छाई की तरफ मोड़ने का यशवंत अष्टेकर का प्रयास सफल नहीं हो पाता। 

6 comments:

  1. उत्तम चयन के साथ बढ़िया चर्चा प्रस्तुति!
    मेरी पोस्ट का लिंक लगाने के लिए
    आपका बहुत-बहुत आभार अनिता सैनी जी!

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  2. सुप्रभात
    धन्यवाद अनीता जी आज के चर्चामंच में मेरी रचना शामिक करने के लिए |

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  3. बेहतरीन मनभावन
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार
    दीपावली की शुभकामनाएं

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  4. कहानी, लघु कथा, काव्य रास और व्यंग्य हर रंग बिखरा है आज की प्रस्तुति में, एक छोटी सी पत्रिका की तरह सजाया है आपने अनीता जी चर्चा मंच को, बधाई व आभार !

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  5. मेरी रचना का काव्यांश शीर्षक के रूप में चुनने के लिए हृदय से आभार।
    चर्चा बहुत शानदार रही।
    सभी लिंक बहुत सुंदर पठनीय।
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

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  6. मेरी रचना को चर्चा मंच पर लेकर सब तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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