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Sunday, September 19, 2010

रविवासरीय चर्चा (१९.०९.२०१०

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार, एक बार फिर रविवासरीय चर्चा के साथ हाज़िर हूं।

आज चर्चा एक लाइन में।

कान                    VK Shrotryia

से सुनना चाहता हूँ
वह सब
जो लोग सुनाना चाहते हैं

परिवर्तन                               Manish

अब नाली में स्वच्छ जल की धार बह रही है।

"गप शप "                शोभना चौरे

एक अरसे बाद दोनों सहेलियों में हुई …!

०७. टप-टप टपके टीन : संजीव 'सलिल'

डुकरो काँपें, 'सलिल' जोड़ कर राम भजे

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण (Mumbai experience of BEST Bus)           Vivek Rastogi

सुबह व्यायाम नहीं हो पाता है तो यही सही, घर से बस स्टॉप तक पैदल और फ़िर बस में खड़े खड़े सफ़र,वाह क्या व्यायाम है।

नैनों के समंदर में डूब गया हूँ

डा.राजेंद्र तेला "निरंतर"

दिल जिस से बहलता है,

वो ही काम कर रहा हूँ

समय का हैमलेट होना      Rajiv

आप तो अपनी आदतों के शिकार हैं,

कड़क ब्लॉगर बनाम विनम्र ब्लॉगर...खुशदीप      खुशदीप सहगल

कड़क महाराज तरक्की की सीढ़ी पाते हैं...विनम्र महाशय अंदर ही अंदर अपने भाग्य को लेकर कुढ़ते रहते हैं..

दिल की लगी            JHAROKHA

या खुदा होंठ थरथरा के ही रह जाते हैं।

गर्भ के कारण नौकरी से हटाई गई एयर होस्टेस को बहाल करने का आदेश                         शिक्षामित्र

दो मातृत्व अवकाश की हकदार थीं लेकिन उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की गई।

"अतीत के झरोखे से" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।

मै भी दर्शन कर आया रामलला और अयोध्या के .      धीरू सिंह

अयोध्यावासी चिंतित थे

भीख देने से पहले भी कभी कोई इतना सोचता है ? शरद कोकास

कि कविता बन जाए या कि उसके फटे हुए झोले में डाल दिये जाएं कुछ उपदेश!!

कही आपकी श्रद्धा किसी की मुसीबत ना बन जाये - - - - - - - mangopeople    anshumala

उनका क्या जो बीमार हो जिनकी परीक्षाये हो जिनसे दस दस दिन तक रोज सुबह शाम ये शोर ना बर्दाश्त होता हो जो चैन से सोना चाह रहे हो|

आखिर मर ही गया बुधना        arun c roy

ए़क बुधना के ही हाथों ।

पायदान सीढ़ी का संगीता स्वरुप

सफलता की  सीढ़ी को फलांघता  हुआ

सच्ची एक कलम चाहिए ! अनुपमा पाठक

लिख सके अपने समाज की व्यथा...

लाइट ले यार!!                            चला बिहारी ब्लॉगर बनने

अहंकार का अंधकार में मोबाइल

ह्रदय की पीर....          रोली पाठक

बहते अंखियों के नीर

पुरुष तुम अब भी कहाँ बदले हो? वन्दना

अपनी पुरुषवादी प्रवृत्ति से

लिखने, न लिखने के बीच Rangnath Singh

पढ़ना बाधित हुआ

भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है!                       कविता रावत

ऐसा कोई आदमी नहीं जो दुःख व रोग से अछूता रह पाता है

विकल भानु रश्मियाँ जलधि को पुकारती ....        'अदा'

अनादि काल से गगन मही को ताकता रहा

समय बदल तो गया है ....       वाणी गीत

विद्यालायों से बच्चे अक्सर आ जाते हैं राशि वसूलने

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस- कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं      मनोज कुमार

इतना ही काफी है या और लिखेंगे

साहित्यकार-२ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला      मनोज कुमार

वे बड़े साहित्‍यकार अवश्‍य थे,‍ किंतु उससे भी बड़े मनुष्‍य थे।

कटी पतंग से इश्किया तक प्रवीण पाण्डेय

पता नहीं कि कौन सा सच आपके हृदय की धड़कन है?

बसंत के वे दिन    अनिल कान्त

एक निखरा, उजला, गुनगुनी धूप का दिन याद हो आया ।
बस। फिर मिलेंगे।

11 comments:

  1. शब्द संभारे बोलिए,शब्द के हाथ न पाँव ।
    एक शब्द औषधि करे,एक शब्द करे घाव।।

    तुलसी मीठे वचन से,सुख उपजत चहुँ ओर।
    वसीकरण एक मंत्र है,तज दे वचन कठोर॥

    तुलसी इह संसार में,भांति-भांति के लोग।
    सबसों हिल-मिल चालिए,नदी-नाव संजोग॥
    --
    ठीक है न ....
    --
    चर्चा मंच को पुनर्जीवन देने के लिए आपका आभारी हूँ!

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  2. सूर्यकांत त्रिपाठी पर लेख बहुत ज्ञान वर्धक है |बधाई
    अच्छी लिंक्स के लिए भी बहुत बहुत बधाई
    आशा

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  3. सार्थक चर्चा ...अच्छे लिंक्स का चयन ....

    चर्चा मंच निरंतर प्रगति करे ..यही कामना है ...गलत बात का विरोध करना मुझे गलत नहीं लगता ...

    मेरी रचना को आपने आज कि चर्चा में शामिल किया ...इसके लिए आभार ..

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  4. हमेशा की तरह सार्थक चर्चा………………काफ़ी अच्छे लिंक्स्।

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  5. बहुत सारी रचनाएँ पढ़ ली हैं.... कई पढ़ने हैं!
    सुन्दर चर्चा !
    शुभकामनाएं.....

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  6. बढ़िया चर्चा.. अच्छे लिंक्स मिले आभार मनोज सर..

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  7. मनोज जी

    चर्चा मे इतने अच्छे लिंक उचलब्ध कराने के लिये आभार........

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  8. बेहतरीन लिंक्स......बेहतरीन चर्चा ............

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

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  9. बढ़िया चर्चा...अच्छा रविवार बीता आपके लिंक पढ़ कर.
    शुक्रिया.

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  10. मनोज जी.. अब अगर हम बोलें कि हम आपके पदचिह्नों पर चल रहे हैं त कोनो अतिसयोक्ति नहीं मानिएगा.. जहाँ जहाँ हम जाते हैं, आपका चरनों का निसान ओहाँ पहिलहीं से मौजूद रहता है..अऊर आपका चर्चा देखकर लगता है कि आपका मेहनत सलाम करने जोग्य है... हमरे तरफ से बधाई!! और धन्यवाद!!

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