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Wednesday, September 29, 2010

"मेघों ने अंबर ढक डाला....."(चर्चा मंच अंक - 292)

आज के चर्चा मंच में प्रस्तुत हैं
मेरे द्वारा कुछ तराशे हुए 
कुछ हीरेरूपी ब्लॉग!
मगर इसके लिए
आपको लिंक तो खोलने ही होंगे!
मेघों ने अंबर ढक डाला
मेघ अभी तक गगन में, खेल रहे हैं खेल।
वर्षा के सन्ताप को, लोग रहे हैं झेल।।
अब से मौसम संबंधी भविष्‍यवाणियों की कॉपियां मौसम विभाग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजी जाएंगी
कितना ही आगे बढ़े, मौसम का विज्ञान।
लेकिन बन सकता नही, वो जग का भगवान।।
Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

कार्टून:- अरे ! ये किसका फ़ोन आया ? -

कॉल करो दिल खोलकर, काहे रहो उदास।
बहुत पुराना फोन है, पापा जी के पास।।
मित्रो !
पंजीकरण चालू है,
कृपया जल्द से जल्द इसका लाभ लेवें
ताकि प्रतिभाओं को जल्द ही परिणाम मिले

अलबेला जी लाए हैं, हितकारी प्रस्ताव।
ब्लॉगिंग के भवसिन्धु से, पार करो निज नाव।।
पोलीथीन से निपटने का मिल गया तरीका।
पर्यावरण सुधार में, अपना दो सहयोग। 
पॉलीथीन हटाय कर, जग को करो निरोग।।
तू क़त्ल करने को चला मेरे सुख़नवर को 
सरेआम बाजार में, बिकता है ईमान।
हत्या करने को चला, शायर की धनवान।।
"शब्द " और " काव्य "
काव्य हमेशा ही रहा, शब्दों से धनवान।
शब्दों से होती सदा, मानुष की पहचान।।
अपने देश के बच्चे
विद्या पढ़ने का जिन्हें, नही मिला अधिकार।
कूड़ा-करकट बीनते, भावी राजकुमार।।
बारिशरस से लबालब बारिशरानी से खुली बातचीत :
दैनिक हिन्‍दी मिलाप हैदराबाद में आज
- 
बरखारानी की मनमानी, कहती यही कहानी!
जल जीवन का सम्बल है,
सूना
सब कुछ बिन पानी!
गधा सम्मेलन के लिये ताऊ का सोंटा (Taau's Baton) रवाना

सम्मेलन का लोगो "आपसी भाईचारा बढावो"

सम्मेलन में जा रहा, ताऊ लेकर माल।
गधा हाँकने के लिए, सोंटा रहा संभाल।।
ये सोचने की आपको, दरकार भी नहीं .....


श्री कृष्ण
इससे पहले कि आप मेरी रचना पढ़ें सोचा ...ये चित्रकला दिखा दूँ आपलोगों को ...मेरे बेटे मयंक ने बनाया है बताइयेगा आप क्या सोचते हैं...

माता रचती शायरी, बेटा चित्र बनाय।
प्रतिभा दोनों की बहुत, पाठकगण को भाय।।
अब भी नहीं बदली नत्था की जिन्दगी
नत्थाओं की आड़ में, करते निज कल्याण।
ऐसे अभिनेताओं को, मारो विष के बाण।।
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है
पागल है क्या चन्द्रमा, जो तम हरता जाय।
अँधियारी सी रात में, उजला रूप दिखाय।।
आ पहुँची है फैसले की घड़ी!
धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

"मख़मली परिवेश को क्या हो गया है" 

और अन्त में-
खेल-खेल में मेरी एक कविता बच्चों को समर्पित..

खेल-खेल में दे रही, गाकर जो उपदेश।
शिक्षा से वो भर रही, भारत का परिवेश।।

16 comments:

  1. bahut acchi charcha...aapki mehnat karne ki aadat se hamein bahut kuch seekhna chahiye..
    hriday se aabhaar..!

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  2. अच्छी चर्चा और बच्चों को सीख देती कविता के लिए बधाई |
    आशा

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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  4. शास्त्री जी ,
    बहुत अच्छी चर्चा , ..कुछ लिंक्स पर जाना अभी बचा है ...अच्छे लिंक्स मिले ..अच्छी चर्चा के लिए आभार

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  5. काफ़ी अच्छे लिंक्स लगाये हैं…………………चर्चा तो है ही बढिया………………आपका अन्दाज़ तो है ही निराला।

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  6. बहुत अच्छी चर्चा.

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  7. सुन्दर चर्चा...आभार !!!

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  8. मेघ,मौसम,बारिश,कार्टून और फ़िर पंजीकरण
    हल करवाया चर्चांमंच पर समीकरण
    सीखा देश के बच्चों ने खेल-खेल में पोलीथीन हटाना
    शब्द,काव्य के साथ हिन्दी मिलाप और
    गधे सम्मेलन के बारे मेंहमने भी जाना
    बाकी अभी पढ़ नहीं पाई कर देना माफ़
    पर चाचाजी तुसी हो ग्रेट--हैट्स ऑफ़...

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  9. bahut hi achhi charch rahi aapki...
    bahut achhe links mile....

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  10. आज का यह एपिसोड भी बढ़िया है ।

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  11. दोहों से सुसज्जित चर्चा के क्या कहने सर...

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  12. वाह वाह..........

    आनन्द आ गया ......

    धन्यवाद !

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  13. I am visiting here first time and it's really great for me to found this blog, I am so glad to found this here.
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