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Saturday, November 10, 2012

फिर आये हैं तेरे शहर में हम (10--11--12) बन कर ………चर्चा मंच

दोस्तों

शास्त्री जी के प्रेमभरे आग्रह पर चर्चामंच पर एक विश्राम के बाद पुन: हाजिर हूँ उम्मीद है आप सबका प्रेम पहले की तरह ही मिलेगा । पूरे एक साल से ना जाने कितनी बार शास्त्री जी ने मुझे कहा मगर मैं एक तो कृष्ण लीला लिखने मे मसरूफ़ थी साथ ही कुछ गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ थीं जिन्हें पूरा करने मे लगी थी । अब जाकर फ़्री हुई तो शास्त्री जी के आग्रह को ना नहीं कह सकी और एक बार फिर आपके समक्ष उपस्थित हूँ ………अब जब तक हमारे कान्हा हमें आज्ञा देंगे तब तक यहाँ हाजिर हूँ तो तब तक आप सब मेरे द्वारा की गयी चर्चा का आनन्द लीजिये ……तो चलते हैं आज के लिंक्स की तरफ़

1

दीये बेचने वाली का बेटा

हकीकत से मिला गया
आँख में आँसू ला गया

2

नीलोत्पल ::

प्रेम का रूप

3

सुचिंतित दृष्टि और सुगठित गद्य कृति-पुनर्वाचन : नामवर सिंह

अपनी पहचान खुद हैं

4

बिना हारे, स्त्री जीत नहीं सकती!

ऐसा क्या !!!!!!!!!!!

5

एक सदी बाद बना '10.11.12' का संयोग,होगी सुख-समृद्धि की बारिश!

वाह वाह ! अब और क्या चाहिये

6

काफ़िला

अनवरत चलता रहा
सफ़र यूँ ही कटता रहा

7

अशोक लव की लघुकथा ' सामने वाला कमरा '

स्मृ्तियों की खिडकी खडका गया 
और जुबां पर ताला लगा गया

8

कल ग़ज़लों के चराग़ रौशन हुए थे आज गीतों की दीपमाला सजा रहे हैं आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी, आदरणीय सौरभ पांडेय जी, गौतम राजरिशी और रविकांत पांडेय

कल गज़लों के चराग रौशन हुये थे
आज गीतों की दीपमाला सजा रहे हैं
देखिये कैसे समवेत स्वर में सभी गा रहे हैं 

9

बरिस्ता ... खिड़की ...कंजी आँखें....

यादो के कँवल खिला गया
अहसासों के गुल महका गया

10

विशाल श्रीवास्तव की कविताएँ

जीवन के यथार्थ से नज़र मिला गयीं 
हकीकतों का अहसास करा गयीं 

11

बेअसर हो रहीं हैं जीवन-रक्षक दवाएं

बच के रहना रे बाबा !!!!!!!

12

"उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जानिये इस बारे में भी

13

शब्दों के चाक पर - १९

शब्दों के चाक पर
भावों की प्रस्तुति 

14

पीला गुलाब - 8 & 9.

एक कहानी सुना गया

15

Untitled

बिना शीर्षक हूँ
इसीलिये अनन्त हूँ

16

एक बालक का बाल-विवाह पर व्यंग्य

उसकी हिम्मत दिखा गया
सबको आईना दिखा गया

17

“लहरों से जूझ रहे” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फिर तेरी याद के परचम लहरा गयी
खामोशी में भी कुछ कहे बिना गुनगुना गयी

18

त्योहार की अन्तिम-वेला में जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ

 अगली सुबह फिर खडी हो उठती हैं

 मूक स्वर में भी मुखर हो उठती हैं

19

“ माँ कहती थी ” की पुस्तक समीक्षा:-जिसे कहने में आज भी तुम्हारे अधर कांपते हैं !

 और वो सब सच होता गया 

20

सवाल 

सवाल है तो जवाब भी होगा

21

रूठी हूँ

कभी तो मनाओगे 

मेरे ख्याल से शगुन के 21 लिंक्स काफ़ी होंगे आज के लिये :)

अब आज की पहली चर्चा को यहीं विराम देती हूँ ………फिर मिलेंगे अगले हफ़्ते इसी जगह इसी दिन तब तक के लिये आप सबको दीपावली और भाई दूज की हार्दिक शुभकामनायें । दीपोत्सव आप सबकी ज़िन्दगी में उजाला भर दे ………:)

35 comments:

  1. वन्दना जी!
    आपकी दूसरी पारी की पहली चर्चा बहुत सार्थक रही!
    --
    आजकी चर्चा की विशेषता यह है कि इसमें आपने मात्र लिंक ही नहीं दिये हैं अपितु लिंकों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ भी दी हैं। जिससे यह पता लगता है कि आपने लिंकों का चयन पोस्टों को पढ़कर किया है।
    --
    आपका आभार।

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  2. एक महत्वपूर्ण पोस्ट भाई साहब सभी के लिए .लोग दवा पूरी खाएं नियम निष्ठ हो ,ज़रूरी है ,अपना वैद्य खुद न बने .


    11
    बेअसर हो रहीं हैं जीवन-रक्षक दवाएं
    बच के रहना रे बाबा !!!!!!!
    .चर्चा मंच की श्री वृद्धि पर आपका स्वागत .बधाई .बढ़िया चर्चा सजाई टिपण्णी सहित हर पोस्ट पर .

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  3. चर्चा मंच पर आपको पुनः पा कर बहुत अच्छा लग रहा है |इस हेतु बधाई |
    अच्छी किंक्स |
    आशा

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  4. पूरा पाकर
    पूरा खोना
    अपनाकर
    अपना खोना
    बिन आंसू हँसकर रोती हूँ
    हाँ ,कुछ ऐसे ही जीती हूँ।
    कैसे तुमको
    ये समझाऊँ
    कब तुमको
    सब बतलाऊँ
    समय किनारे चुप बैठी हूँ
    हाँ , खुद अपने से रूठी हूँ
    -भावना पाण्डेय

    अति सुन्दर.गीत माधुरी लिए है रचना .

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  5. गीत गीत माधुरी लिए है रचना .पूरा एक रचना संसार है अतीत ,व्यतीत और अ -व्यतीत है कवि की रचनाओं में ,हर अंश रचना का अपनी रवायत ,प्रवाह भाव ,अनुभाव लिए है ,.
    .पूरा एक रचना संसार है अतीत ,व्यतीत और अ -व्यतीत है कवि की रचनाओं में ,हर अंश रचना का अपनी रवायत ,प्रवाह भाव ,अनुभाव लिए है ,.बेहद सशक्त रचना और उसका संसार है .भावों का तराना है .2
    नीलोत्पल ::
    प्रेम का रूप

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  6. शुक्रवार, 9 नवम्बर 2012

    सवाल
    किसने कतरें पर उन परिंदों के
    उड़ते थे जो दूर आसमान ?
    लहूलुहान दिखती है धरती
    किसने दिया ये क़त्ल का फरमान ?

    है कौन यहाँ इतना बेरहम
    जिसको है खून की प्यास ?
    क्यों मिट गया उसके अंदर
    दूसरों के दर्द का अहसास ?

    तड़पती जानों को देख
    कौन यहाँ मज़ा ले रहा है ?
    बेगुनाहों को सज़ा ए मौत
    कौन यहाँ दे रहा है ?

    क्रूरता सहन की सीमा से पार हुई
    पर सब खड़े क्यों मौन ?
    खून से सनी तलवार जिसकी
    पूछते है सब, वो है कौन ?

    दहशत गर्दी पे बेहतरीन आलेख है यह रचना .बधाई चर्चाका.
    रा को जिन्होंने आपको पढ़वाया .

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  7. समीक्षक ,समीक्षा ,समीक्षित कृति ,कृति कारा का काव्य व्यक्तित्व ,समीक्षक की प्रवाह मय भाषा किसी नज्म सी किसे ज्यादा खूब सूरत कहूं .अलफ़ाज़ नहीं हैं ,कैसे बयाँ करू।बेहद खूब सूरत अंदाज़ रहे समीक्षा के .

    19
    “ माँ कहती थी ” की पुस्तक समीक्षा:-जिसे कहने में आज भी तुम्हारे अधर कांपते हैं

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  8. चर्चा कारा का काव्य सलीका और करीना साफ़ झलकता है पोस्ट पर शामिल सेतुओं पर की गई टिप्पणियों से ,रीझ गया मन इस अंदाज़ पर .बधाई चर्चाकारा .

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  9. त्योहार और स्त्रियाँ

    त्योहार लाते हैं
    रेशम-गोटे की कढ़ी हुई साड़ियाँ
    और बक्से में रखे आभूषण
    स्त्रियों की देह पर

    त्योहार जगाते हैं रात भर
    कथा-कीर्तन के साथ उपवास कराते हैं
    दिन भर काम करनेवाली स्त्रियों से

    त्योहार कपड़े लाते हैं बच्चों को
    मिठाइयाँ भी
    और लाते हैं पुरुषों के लिए असीम प्रार्थनाएँ
    स्त्रियों के रोम-रोम से

    त्योहार की अन्तिम-वेला में
    जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
    पोर-पोर में उल्लास लिए
    बिस्तर पर जा गिरती हैं-

    जैसे गिरती हैं
    अगले त्योहार की थकान में

    सत्य कथा सा प्रबंध काव्य है यह रचना .एक पूरा बाँध लिए अथाह जल राशि का ,औरत की हदबंदी का ,स्वनिर्मित सुख का ,सीमा का ,परितोष और समर्पण का .बधाई .

    ReplyDelete
  10. त्योहार और स्त्रियाँ

    त्योहार लाते हैं
    रेशम-गोटे की कढ़ी हुई साड़ियाँ
    और बक्से में रखे आभूषण
    स्त्रियों की देह पर

    त्योहार जगाते हैं रात भर
    कथा-कीर्तन के साथ उपवास कराते हैं
    दिन भर काम करनेवाली स्त्रियों से

    त्योहार कपड़े लाते हैं बच्चों को
    मिठाइयाँ भी
    और लाते हैं पुरुषों के लिए असीम प्रार्थनाएँ
    स्त्रियों के रोम-रोम से

    त्योहार की अन्तिम-वेला में
    जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
    पोर-पोर में उल्लास लिए
    बिस्तर पर जा गिरती हैं-

    जैसे गिरती हैं
    अगले त्योहार की थकान में

    सत्य कथा सा प्रबंध काव्य है यह रचना .एक पूरा बाँध लिए अथाह जल राशि का ,औरत की हदबंदी का ,स्वनिर्मित सुख का ,सीमा का ,परितोष और समर्पण का .बधाई .

    18
    त्योहार की अन्तिम-वेला में जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
    अगली सुबह फिर खडी हो उठती हैं
    मूक स्वर में भी मुखर हो उठती हैं

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  11. काम तो हमारे हैं, नाम तो तुम्हारा है
    पाँव तो हमारे हैं, रास्ता तुम्हारा है

    जेब बस तुम्हारी है ,माल सब हमारा है ,

    तंत्रप्रजा को बस आम जन का सहारा है .

    क्या बात है शास्त्री जी इस रचना के विविध आयाम हैं .

    17
    “लहरों से जूझ रहे” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
    फिर तेरी याद के परचम लहरा गयी
    खामोशी में भी कुछ कहे बिना गुनगुना गयी

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  12. दिख रहे हैं दोबदन, किन्तु एक है सुमन
    "रूप" तो हमारा है, प्राण तो तुम्हारा है

    दिख रहे हैं दोबदन, किन्तु एक है सुमन
    "रूप" तो हमारा है, प्राण तो तुम्हारा है

    अखिलेश भाई और उनके नेता (पिता जी )पे भी सटीक बैठतीं हैं ये पंक्तियाँ .बधाई बढ़िया संबोधन उद्बोधन के लिए .चर्चा मंच पर थोड़ी

    देर में पहुँच रहा हूँ .अब कनेक्टिविटी नार्मल हुई है .तीन दिन नए नए जुगाड़ करके .


    17
    “लहरों से जूझ रहे” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
    फिर तेरी याद के परचम लहरा गयी
    खामोशी में भी कुछ कहे बिना गुनगुना गयी

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  13. एक बालक का बाल-विवाह पर व्यंग्य
    11/08/2012 08:44:00 PM RATAN SINGH SHEKHAWAT 9 COMMENTS
    हमारे देश बाल-विवाह रूपी बुराई आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है| आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में यदा कदा बाल विवाह होने के उदाहरण देखने या अख़बारों में पढ़ने को मिल ही जाते है| कुछ वर्ष पहले स्वतंत्रता दिवस के मौके पर गांव प्रवास के दौरान गांव की सरकारी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने का मौका मिला| समारोह में एक बच्चे ने राजस्थानी भाषा में बाल विवाह पर व्यंग्य करती एक शानदार मनोरंजक वार्ता सुनाई| अपनी वार्ता में उस छात्र ने अपने आपको बाल विवाहित बताते हुए वार्ता सुनाई| प्रस्तुत है वही व्यंग्य वार्ता –

    “मेरे दादाजी गांव के प्रतिष्ठित व धनी व्यक्ति होने के साथ ही गांव के मुखिया (प्रधान,सरपंच) भी थे| जब वे गांव के प्रधान थे तब मैं चार पांच वर्ष का बच्चा था| मेरे दादाजी की प्रतिष्ठा के चलते आप-पास के गांवों के कई लोग हमारे परिवार से रिश्ता जोड़ना चाहते थे| चूँकि घर में मेरे से सभी बड़े शादीसुदा थे अत: मेरे परिवार से रिश्ता जोड़ने वाला हर कोई मेरे साथ अपनी बेटी का विवाह करना चाहता था|

    एक दिन पड़ौस के गांव के प्रधान अपनी बेटी का मेरे लिए रिश्ता लेकर दादाजी के पास आये और मेरी सगाई का दस्तूर कर विवाह की तारीख तय कर दी गई| मैं भी ये सोचकर बहुत खुश था कि दूसरों की बारात में जाने के लिए तो जिद करनी पड़ती है पर अपनी बारात में जाने से तो कोई रोक ही नहीं सकता और जब दूसरों की बारात में इतना मजा आता है तो अपनी की तो बात निराली होगी| खैर.......

    आखिर वह तारीख भी आ गई और मुझे दूल्हा बनाकर बारात सहित पड़ौस के गांव ले जाया गया| उस गांव के बाहर पहुँचते ही मेरी बारात रुकी| लड़की वाले मेरे लिए घोड़ी लेकर आये जिस पर बैठाकर मुझे बारात के आगे आगे गांव में घुमाया जाने लगा| मुझे देखने के लिए गांव की औरतें अपनी छतों पर चढ़ी हुई थे उनमें से मुझे देखकर एक बोली कि- “अरे! घोड़ी पर तो अकेला विनायक ही बैठा है दूल्हा कहाँ है? हमारे यहाँ किसी की भी शादी में एक बच्चे को विनायक बनाया जाता है और उसे घोड़ी पर दुल्हे की गोद मैं बिठाया जाता है| अत: मुझ बच्चे को दूल्हा बना देख औरतें हसंते हुए ऐसी बातें कर मनोरंजन कर रही थी|

    शादी के साल भर बाद मैं एक बच्चे का बाप बन गया, मेरी पत्नी बच्चे व मुझे नहला धुला कर खेत में काम करने चली जाती और मैं बच्चे के साथ खेलता रहता और खेलते खेलते हम दोनों को नींद आ जाती और हम एक साथ ही सो जाते| जब बच्चा उठकर रोने लगता तो मेरी पत्नी आकर उसे दूध पिलाकर वापस खेत में काम करने चली जाती| पर एक दिन तो हद ही हो गई मैं और मेरा बच्चा एक साथ सो रहे थे मेरी पत्नी आई और बच्चे की जगह मुझे बच्चा समझकर दूध पिलाकर चली गई|

    एक दिन तो मेरे साथ और भी बहुत बुरा हुआ| हुआ यूँ कि एक रोज मेरी पत्नी मुझे शहर में फिल्म दिखाने ले गई| टिकट लेकर वह मुझ सहित सिनेमा हाल की कुर्सी पर जा बैठी पर थोड़ी देर बाद मुझे अचानक पेशाब लगा और मैं पेशाब करने के लिए सिनेमा हाल से बाहर आ गया| बाहर तो आ गया पर वापस अंदर जाने लगा तो चौकीदार ने वापस सिनेमा हाल में घुसने के लिए यह कह कर मना कर दिया कि अकेले बच्चों का सिनेमा हाल में प्रवेश निषेध है| मेरे लाख समझाने के बाद भी उस चौकीदार ने मुझ पर भरोसा नहीं किया कि मैं शादीशुदा हूँ और मेरी पत्नी सिनेमा हाल में बैठी है| और मैं पूरी फिल्म खत्म होने तक बाहर बैठा अपनी पत्नी का इन्तजार करता रहा|”

    नोट- यह वार्ता आज से कोई सात वर्ष पहले सुनी थी हो सकता है कुछ बातें छुट गयी हो पर मैंने उस बच्चे द्वारा राजस्थानी भाषा में प्रस्तुत की गई यह व्यंग्य वार्ता हिंदी में प्रस्तुत करने की कोशिश मात्र की है|



    हास्य व्यंग्य परिहास और तंज की कमान सब एक जगह ,आ गए ,शेखावत साहब रत्न सिंह हमारे छा गए .

    16
    एक बालक का बाल-विवाह पर व्यंग्य
    उसकी हिम्मत दिखा गया
    सबको आईना दिखा गया



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  14. इंद्रधनुष का सातवा रंग
    जुड़ के आज आया है
    नया नया सा चर्चा में
    एक और रंग लाया है !

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  15. वन्दना जी,
    आपको यहाँ देख कर बहुत अच्छा लग रहा है .
    आपकी चुनी हुई रचनायें बड़े शौक से, इत्मीनान से पढ़ रही हूँ .आभार !

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  16. वंदना जी चर्चामंच पर पुनः आपका स्वागत और हार्दिक बधाई, सुन्दर लिंक्स सजाये हैं।

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  17. आपका हार्दिक स्वागत है वंदना जी शगुन में बहुत सुन्दर सूत्रों से सजाया चर्चा मंच बहुत बहुत बधाई व् दिवाली की शुभ कामनाएं

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  18. इस व्यापक पोस्ट के दो मुखर बिंदु हैं :
    (1)बकौल आपके औरत को दिल का दौरा नहीं पड़ता .महज़ मिथ है यह यथार्थ यह है औरत का दिल और धमनियां ज्यादा कमनीय और नाज़ुक हैं उसके दिल को भी सौ खतरे बने रहतें हैं जिनकी
    अनदेखी की जाती है .
    (2)दूसरा बिंदु प्रेम के सूक्ष्म शरीर प्रेम से ही ताल्लुक रखता है .यौन सुख की नव्ज़ भी इसी प्रेम से जुड़ी है .शेष तो प्रजनन अंगों का परस्पर संघर्षण हैं .मशीनीकरण है सेक्स का .बधाई इतनी विस्तृत
    सूचना के लिए और ब्लॉग की नस पकड़ने के लिए .

    4
    बिना हारे, स्त्री जीत नहीं सकती!
    ऐसा क्या !!!!!!!!!!!

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  19. बाल मन की कोमलता और एक अच्छे शिक्षक के द्वंद्व का रेखांकन करती सशक्त लघु कथा

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    अशोक लव की लघुकथा ' सामने वाला कमरा '
    स्मृ्तियों की खिडकी खडका गया
    और जुबां पर ताला लगा गया

    अशोक लव की लघुकथा ' सामने वाला कमरा '
    शैवाल कक्षा में खिड़की के पास बैठता था.मैं निराला की कविता पढ़ा रहा था.वह बहुत देर से खिड़की से बाहर देखे जा रहा था. विद्यार्थियों का ध्यान इधर-उधर हो तो मुझसे पढ़ाया नहीं जाता.उसकी ओर तीन-चार बार देख चुका था.उसे तो मानो किसी की चिंता ही नहीं थी.वह कक्षा में हमेशा प्रथम आता था.पर इस प्रकार की अनुशासंहीनता तो असहनीय थी.
    उसके पास जाकर खड़ा हो गया. उसे कुछ पता न चला.
    ' कहाँ खोए हुए हो ?'-उसे कंधे से पकड़कर झकझोरते हुए कहा.
    'सर ,वह .....' -वह घबरा गया. फिर एकदम खड़ा हो गया.
    पूरी कक्षा हँस पडी.
    ' बैठ जाओ ,कविता पढ़ा रहा हूँ. ध्यान नहीं दोगे तो समझ नहीं पाओगे .' -उसे बिठाते हुए कहा.
    वह रो पड़ा.
    घंटी बज गई. पीरियड समाप्त हुआ. स्टाफ़-रुम जाकर भी उसका चेहरा आँखों के सामने आता रहा.एक विद्यार्थी को उसे बुलाने भेजा.
    ' बैठो शैवाल !' वह आया तो उसे साथ वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कहा.वह झिझकते हुए बैठ गया.
    ' तुम कक्षा में रो क्यों पड़े थे ? मैंने तो कुछ भी नहीं कहा था ?'
    ' सर,आज माता जी की मृत्यु हुए पूरे दो वर्ष हो गए हैं. साथ वाले अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई थी. मैं अस्पताल के उसी कमरे की ओर देख रहा था.'
    मैं अवाक् उसका मुख देखता रह गया. यदि कक्षा में उसे सज़ा दे देता तो?

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  20. वाह शास्त्री जी उत्तराखंड का पूरा इतिहास और वर्तमान उतार दिया समूचा इस पोस्ट में .शुक्रिया .

    12
    "उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
    जानिये इस बारे में भी

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  21. बहुत बढ़िया अंदाज में शुरू की आपने अपनी दूसरी पारी । आशा है आपकी यह पारी बहुत लम्बे अंतराल चले । आपका हार्दिक स्वागत ।
    बहुत उम्दा लिनक्स उपलब्ध कराये आपने । आभार ।

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  22. 12
    "उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
    जानिये इस बारे में भी

    15
    Untitled
    बिना शीर्षक हूँ
    इसीलिये अनन्त हूँ

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  23. बहुत बढ़िया लिंक्स के साथ चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार

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  24. अरे वाह
    वन्दना जी शुक्रिया
    ये आप ही हैं जो अपनी माटी की रचनाओं को चर्चा में लाती हैं.
    आदर सहित,

    'अपनी माटी' सम्पादन मंडल

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  25. सही मायने में अच्छी रचनाओं को चर्चा में लाने हेतु चर्चामंच के सूत्रधार और सभी मेहनती साथियों को कैसे शुक्रिया अदा करें.सच में आपने अभी ब्लॉग्गिंग को आगे बढाने के लिए जो रास्ता अपनाया गया है.उसके लिए बहुत सारी शुभकामनाएं
    आदर सहित,

    'अपनी माटी' सम्पादन मंडल

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    Replies
    1. यही तो हमारा काम है मानिक जी अच्छी रचनाओं को चर्चा में लाना ………हार्दिक आभार

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  26. "उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    पैदा हुआ मेरा राज्य
    पर अब पता लग रहा है
    दो बूँद जिंदगी की
    किसी ने उसको नहीं पिलायी
    क्योंकी पोलियोग्रस्त को संभालना
    आसान हो जाता है
    बिना प्रतिरोध !

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  27. बहुत सुंदर चर्चा !

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  28. वंदना जी,,,चर्चामंच में आपका सुन्दर लिंकों के साथ स्वागत है,,,,,

    दीपावली की हार्दिक बहुत२ शुभकामनाए,,,,

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  29. चर्चा मंच मे शामिल करने ए लिए , बहुत आभार ॥

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  30. बढिया चर्चा, शुभकामनाए मंच पर नई पारी के लिए

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  31. पुनः स्वागत है, सुन्दर सजाये सूत्र..

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  32. शुक्रिया वंदना जी....चर्चा मंच पर हमारी पोस्ट के लिए.....दूसरी पारी की शरुआत अच्छी रही.....दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

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