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Monday, December 09, 2019

"नारी-सम्मान पर डाका ? "(चर्चा अंक-3544)

सादर अभिवादन।
                  नाम है सोशल मीडिया जिसका हिंदी में अर्थ सामाजिक संचार माध्यम ही हो सकता है लेकिन अब यह सोशल नहीं एंटी सोशल मीडिया बन चुका है। धीरे-धीरे इसमें दर्ज़ होने वाली घटनाओं,चर्चाओं, शोध और विश्लेषणों के अलावा साहित्यिक विमर्श का स्तर अपने तय मानकों से परे होता जा रहा है। पिछले 10 सालों में सोशल मीडिया का चरित्र शाब्दिक-हिंसा और अश्लील गाली-गलौच, सूचनाओं के अधकचरेपन,चरित्र-हनन और एकपक्षीय अर्धसत्य के सिलेबस से समृद्ध हो चुका है। राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया पर ट्रोल-आर्मी नियुक्त की है जो बड़ी तनख़्वाह पाती है। इसे माँ-बहन-बेटी संबंधी अश्लील शब्दावली में सारी हदें पार करते हुए विरोधी आवाज़ को दबाने के अधिकार प्राप्त हैं। इसमें कार्यरत युवा विरोधी को मैदान छोड़कर जाने को विवश कर देते अपनी बद-दिमाग़ी और घोर आपत्तिजनक गालियों से भले ही सामने कोई महिला ही क्यों न हो। 
                        इन्हें 1000 रुपये प्रति दिन, आने-जाने का किराया, खाना-पीना, कई मोबाइल फोन, कई सिम उपलब्ध कराये जाते हैं ताकि वे अलग-अलग सोशल मीडिया ग्रुप्स में भेज सकें और अपना ज़्यादा-ज़्यादा से भत्ता तैयार कर सकें। बेरोज़गारी का इतना वीभत्स उपयोग घटिया राजनीति अपने फ़ाएदे के लिए कितने ढीठपन से कर रही है यह अब सार्वजनिक हो चुका है क्योंकि इन धूर्त ट्रोल्स को देश के निर्लज्ज, धूर्त और घटिया मानसिकता के नेता बेहयाई से गालियाँ पढ़ने के लिये फॉलो करते हैं। 
                    उन युवाओं को थोड़ी शर्म उस दिन ज़रूर आयेगी जब ग़लत तरीक़ों से कमाया गया धन उनकी औलादों पर असर करेगा और उन्हें असहनीय शाब्दिक हिंसा का सामना ख़ुद भी करना होगा। सोशल मीडिया पर मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने साथ दायित्त्वबोध का भी आत्मनियंत्रित भान अपेक्षित रखती है।  

-रवीन्द्र सिंह यादव 
*****
आइए पढ़ते हैं मेरी पसंदीदा रचनाएँ -
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*****
खुदने दो कब्र चारों तरफ
 अपने दूर देश की खबर में मरे को जिंदा कर देने
 का बहुत कुछ छुपा होता है
हो सकता है 
आवारा 
नजर 
आ रहे हों 
पर 
सच मानिये 
हैं नहीं

*****

नारी-सम्मान पर डाका ?

रखो जिस्मों को ढक के एहतिआतन,
सड़क पर भूखे कुत्ते  घूमते हैं !
संभल के  घर से तुम बाहर  निकलना
यहाँ हर तरफ दरिन्दे घूमते  हैँ !

*****

 

 कविता "जीवन कलश"

*****
*****

"संकल्प" 

My Photo

जानती तो है तू !

दोधारी तलवार है 

तेरी जिन्दगी…

अबला है तो…

रोती क्यों हैं ?

सबला है तो

बेलौस क्यों है ?

 *****

सीधी बात है  बदल जाओ ,  मगर  बदलो  नहीं 
दायरा जो आपका है उससे  परे निकलो नहीं !
दाने दाने पे लिखा है खाने  वालों का ही नाम 
दाने में तो दान भी है , स्वाद से बहलो नहीं
*****

दूर मुझसे न रहो तुम यूँ बेखबर बन कर
क़रीब आओ चलो साथ हमसफ़र बन कर
जहाँ भी देखता हूँ, बस तुम्हारा चेहरा है
बसी हो आँख में तुम ही मेरी नज़र बन कर

*****

वही सदा मुक्त है 
जो भी सुना है
जो भी अनसुना रह गया है
जो भी जाना है
जो भी अजाना रह गया है
जो भी कहा है
*****
मरुस्थल चीत्कार उठा
प्रसव वेदना से कराह उठा
धूल-धूसरित रेतीली मरूभूमि में
नागफनी का पौधा
ढीठ बन उग उठा

कैसा आया विकट जमाना,
भूल गए नारी सम्माना।
हैवानियत ने हदें तोड़ी,
संवेदना रहे दम तोड़ी।
*****

"पुलिस बनी न्यायधीश" 

*****
आज का सफ़र बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले सोमवार।
--
रवीन्द्र सिंह यादव 
--

11 comments:

  1. " सोशल मीडिया पर मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने साथ दायित्त्वबोध का भी आत्मनियंत्रित भान अपेक्षित रखती है। ....."

    जी आपने अपनी सशक्त भूमिका के माध्यम से सोशल मीडिया के दुरुपयोग और ऐसा करवाने वाले पर्दे के पीछे छिपे खिलाड़ियों पर बखूबी प्रकाश डाला है ,जो एक गंभीर चिंता और चिंतन का विषय बना हुआ है ; क्योंकि सोशल मीडिया का विस्तार प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अधिक व्यापक हो गया है , इस कारण इस पर निगहबानी जरूरी है।
    सुनियोजित तरीके से कितनी चतुराई से धर्म और राजनीति से जुड़े लोग विभिन्न सूत्रों के माध्यम से जिस तरह से इसका दुरुपयोग कर रहे हैं । उससे सर्वाधिक भ्रमित युवा वर्ग ही है। वह आधुनिक चकाचौंध के दलदल में फंसा हुआ है।
    पवित्र पुस्तकों के माध्यम से बचपन से ही मनुष्य को जिस कर्तव्य बोध की शिक्षा दी जाती है। आज का युवा उससे वंचित है। वह अपने दायित्व को नहीं समझ पा रहा है।

    " जबकि उत्तरदायित्व का ज्ञान ही हमारे संकुचित विचारों का सुधारक होता है । जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ प्रदर्शक बन जाता है। "

    इस अर्थयुग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ ही प्रिंट मीडिया भी अपने उत्तरदायित्व को भूलता जा रहा है ।वह भिक्षुक बना धन पशुओं के समक्ष खड़ा है अथवा ऐसे ही लोगों ने मीडिया का नकाब पहन रखा है। तो बड़ा सवाल है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायित्व बोध युवा वर्ग को कौन करवाएगा , जो सोशल मीडिया के गिरफ्त में है ?
    इस यक्ष प्रश्न का जवाब आधुनिक सभ्य समाज के झंडाबरदारों को तलाशना होगा ।

    आज की सुंदर प्रस्तुति में मंच पर मेरी रचना को स्थान देने के लिए रविंद्र जी आपका बहुत-बहुत आभार एवं सभी को प्रणाम।


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  2. बहुत उम्दा प्रस्तुति
    उम्दा रचनाएं

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति. भूमिका में ट्रोल्स की करतूतों का ज़िक्र करने और विस्तार से उल्लेख करके आपने बहुत बड़े ज्वलंत मुद्दे को प्रकाशित किया है. अब ऑनलाइन अख़बारों और फ़ेसबुक पर भी ट्रोल्स अपनी घिनौनी सोच के साथ मोर्चा संभाल रहे हैं जिसके एवज़ में शायद उनकी रोज़ी-रोटी चलती है.

    आज की प्रस्तुति में रचनाओं का चयन बहुत सराहनीय है. सभी रचनाकारों को बधाई.
    मेरी रचनाओं को चर्चा मंच में शामिल करने के लिये सादर आभार.

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  4. बहुत ही सराहनीय एवं सोशल मीडिया की दुष्परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित करती हुई प्रभावशाली भूमिका एक समय ऐसा था जब हम अपने अंदर के क्रोध को जलन को इर्ष्या को यह किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने जानने वाले लोगों के मध्य तक ही विस्तार कर पाते थे ।लेकिन वर्तमान में सोशल मीडिया ने लोगों को एक ऐसा एक ऐसा टूल दे दिया है कि जहां आप जितनी भी नकारात्मकता हो किसी जाति विशेष के लिए या किसी पर्सनल किसी इंसान के लिए समाज के लिए बस आप उस नकारात्मकता को इतना फैला दो कि अच्छे लोग इसकी चपेट में आ जाएंगे.. आपने बिल्कुल सही कहा लोगों की ऐसी ग्रुप तैयार की गई है जिनमें किसी भी चीज को वायरल करने के लिए दो-तीन मिनट का ही टाइम लगता है थोड़ी ही देर में पूरे इंडिया कहूं या इंटरनेशनल लेवल पर सारी बातें चुटकियों में फैल जाती है जो कुछ विशेष लोग फैलाना चाहते हैं जिनसे कुछ विशेष लोगों को फायदा होता है
    खुद ही देखिए कितनी कम समय में लोगों के बीच नफरत कितनी ज्यादा फैल चुकी है लोग दूसरों को मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं ये सब सोशल मीडिया के बहुत ही घातक प्रभाव है.. ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं कि आजकल लोग मेमेज या पोस्टर्स ,राइट्सअप ज्यादा देखते है और तुरंत सपनी प्रतिक्रिया फे देते है, बिना जांच-पड़ताल किए कि वह कितनी सच है
    एक और बात यहां कहना चाहूंगी अभी हाल फिलहाल में बहुत सारी रेप की घटनाएं हुई है लेकिन लेकिन हम खुद ही देख रहे हैं कि जिन घटनाओं से कुछ लोगों को फायदा हो सकता है उन्हीं घटनाओं को सबके दिलों दिमाग में जबरदस्ती डाला जा रहा है लेकिन कुछ ऐसे भी घटनाएं जिनमें दलित वर्ग के लोग आते हैं ऐसी घटनाओं की जानकारी लोगों को ना के बराबर है क्षमा चाहूंगी मैं यहां कुछ कहना चाह रही हूं प्रियंका रेड्डी को भी जलाया गया उसके बाद उन्नाव गैंगरेप की पीड़िता उसको भी जलाया गया लेकिन यहां पर सिर्फ लोगों को प्रियंका रेड्डी की रेप केस के बारे में ज्यादा जानकारी है उन्नाव पीड़िता के बारे में लोगों को बहुत ही कम पता है इस तरह की असमानता क्यों इन सब चीजों को कौन बना रहा है यह सोशल मीडिया

    समाज में एक ऐसा naritive तैयार किया जा रहा है कि लोग. खुद को भूलते जा रहे हैं उन्हें सिर्फ सोशल मीडिया के द्वारा तैयार किए गए लोग उनके दिमाग ऊपर ऐसे हावी हो गए हैं कि वह उनसे जो चाहे करवाते हैं
    ...... रविंद्र जी धन्यवाद देना चाहूंगी कि थोड़ी सी तसल्ली मिली आज की आपकी भूमिका के द्वारा मैंने अपनी बात को रखा... इस तरह की बातों को हालांकि सभी नहीं उठाते हैं लेकिन आप हमेशा एक सकारात्मकता के साथ अपनी बात रखते हैं और हम उसे पढ़कर अपने विचार रखते हैं तो यह हम सबों के भी लिए बहुत बड़ी बात है
    एवं सभी चयनित लिंक्स बहुत ही अच्छे हैं मुझे भी मान देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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    1. आदरणीय रवींद्र जी प्रणाम, क्या बतकुच्चन लगा रखा है आप सभी ने ! अरे ! हमारी फैंटम पुलिस ने आख़िर ग़रीब सट्टी वाले मज़दूरों को ही उठाकर टपका दिया और क्या ! इसमें कौन-सा बड़ा गुनाह कर दिया। वो मुज़रिम थे या नहीं क्या फ़र्क क्या पड़ता है ! मर तो वैसे भी जाते इस बेरोज़गारी के दौर में ! अब अँधेरी नगरी चौपट राजा वाला न्याय तो हो गया। परन्तु आप चिंता न करें ! कल मैं चिन्मयानन्द, कुलदीप सेंगर आसाराम और उन चार उन्नाव आरोपियों के घर आप सब की तरफ़ से पुष्प लेकर जाऊँगा एवं बताऊँगा की आप सभी परेशान न हों ! सभी फेसबुकिये, ब्लॉगड़ची वाट्सप विश्वविद्यालय के छात्र एवं सत्तापक्ष के ''बिचौलिए शब्दों के धनी विद्वान लेखक" आपके साथ हैं। आपको हमारी शक्तिमान पुलिस हाथ क्या ! चमका भी नहीं सकती। अतः आप सभी अपने-अपने परमकर्तव्य की ओर अग्रसित रहें, नौटंकी वाला चुनाव हर साल लड़ते रहें, इन्हीं की गाढ़ी कमाई खाते रहें, इन्हीं को आँखें दिखाते रहें और समय-समय पर पाकिस्तान-पाकिस्तान चिल्लाते रहें। और वैसे भी, च्यवनप्रास तो आप सभी खा ही रहे होंगे, खाते रहिये ! ठंडी बहुत है और हाँ टीवी देखना न भूले ! आज शाम उसपर एक विशेष कार्यक्रम में बताया जाना है कि लंगड़ा आम कैसे खायें ? और हाँ ब्लॉगों पर रोज़ लिखते रहें क्यूँकि चुनाव आने वाला है अधिक विजिटर होने पर राजनीतिक पार्टियाँ आप ही को चुनाव -प्रचार का ठेका देंगी। यानी कि "आम के आम गुठलियों के दाम" ! भेड़तंत्र आपका भला करें। सादर, बरसाती टर्राता एक मेढक

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।

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  6. गंभीर चिन्तनपरक भूमिका के साथ सुन्दर सूत्रों से सजा चर्चा मंच।। आभार मेरी रचना को प्रस्तुति में स्थान देने के लिए । पथिक जी , अनीता जी और अनु जी ने भी भूमिका में उठाए ज्वलन्त विषय पर अपने विचार साझा किये । नकारात्मता यह पहलू वास्तव में चिन्ताजनक है ।

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  7. आदरणीय  रवींद्र जी प्रणाम, क्या बतकुच्चन लगा रखा है आप सभी ने ! अरे ! हमारी फैंटम पुलिस ने आख़िर ग़रीब सट्टी वाले मज़दूरों को ही उठाकर टपका दिया और क्या ! इसमें कौन-सा बड़ा  गुनाह  कर दिया। वो मुज़रिम थे या नहीं क्या फ़र्क क्या पड़ता है ! मर तो वैसे भी जाते इस बेरोज़गारी के दौर में ! अब अँधेरी नगरी चौपट राजा वाला न्याय तो हो गया। परन्तु आप चिंता न करें ! कल  मैं चिन्मयानन्द, कुलदीप सेंगर आसाराम और  उन चार उन्नाव आरोपियों के घर आप सब की तरफ़ से पुष्प लेकर जाऊँगा एवं बताऊँगा की आप सभी परेशान न हों ! सभी फेसबुकिये, ब्लॉगड़ची  वाट्सप विश्वविद्यालय के छात्र एवं सत्तापक्ष  के ''बिचौलिए शब्दों के धनी विद्वान लेखक" आपके साथ हैं। आपको हमारी शक्तिमान पुलिस हाथ क्या ! चमका भी नहीं सकती। अतः आप सभी अपने-अपने परमकर्तव्य की ओर अग्रसित रहें, नौटंकी वाला चुनाव हर साल लड़ते रहें, इन्हीं की गाढ़ी कमाई खाते रहें, इन्हीं को आँखें दिखाते रहें और समय-समय पर पाकिस्तान-पाकिस्तान चिल्लाते रहें। और वैसे भी, च्यवनप्रास तो आप सभी खा ही रहे होंगे, खाते रहिये ! ठंडी बहुत है और हाँ टीवी देखना न भूले ! आज शाम उसपर एक विशेष कार्यक्रम में बताया जाना है कि लंगड़ा आम कैसे खायें ? और हाँ ब्लॉगों पर रोज़ लिखते रहें क्यूँकि चुनाव आने वाला है अधिक विजिटर होने पर राजनीतिक पार्टियाँ आप ही को चुनाव -प्रचार का ठेका देंगी। यानी कि "आम के आम गुठलियों के दाम" ! भेड़तंत्र आपका भला करें। सादर, बरसाती टर्राता एक मेढक   

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  8. लाजवाब। आभार रवींद्र जी। बहस जारी रहे।

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  9. सोशल मीडिया का ये कला सच जानकर स्तब्ध हूँ आदरणीय भाई रवीन्द्रजी |काश इसके लिए कोई आचार संहिता होती | मुझे तो लगता कोई आचार संहिता होगी भी तो वो भी व्यापर बन गयी है | भावपूर्ण सार्थक लिंक बहुत मनभावन हैं |सभी रचनाकार बधाई के पात्र हैं |आपको सस्नेह शुभकामनायें उम्दा प्रस्तुतिकरण के लिए |

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  10. सुन्दर और सार्थक चर्चा।
    आभार आपका अनीता सैनी जी।

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