Followers

Saturday, May 08, 2021

'एक शाम अकेली-सी'(चर्चा अंक-4059)

सादर अभिवादन। 

शनिवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आज भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीया कल्पना मनोरमा जी की रचना से वाक्यांश- 

सांझ का लाल मुखमंडल देखकर लग रहा था कि सूरज अस्ताचल की ओर मुखातिब हो चला था। पश्चिम की ओर क्षितिज पर लग रहा था, किसी स्त्री ने चूल्हे में ढेर सारी लकड़ियाँ एक साथ जला दी थीं जिनमें मानो वह भुट्टे भून रही थी और आग की रेशमी गुनगुनाहट के साथ आकाश से लेकर धरती तक सुनहरी लालिमा पसरती जा रही थी। आकाशमार्गी सभी जीवों का मुख पश्चिम की ओर था। लग रहा था कि वे सभी सूरज के प्रेमी हों। जहाँ पश्चिम दिशा गुलज़ार होती जा रही थी वहीँ पूरब की ओर सन्नाटा पसरता जा रहा था। संध्यारानी ने अपने स्लेटी आँचल को कंधे से गिराकर खोल दिया था और लहरा-लहराकर रात्रि के स्वागत के लिए बेचैन हो रही थी। हवा वृक्षों की फुनगियों से उलझ-उलझ कर बहनापा दिखा रही थी। मेरे माथे पर पड़ी लटें उड़कर उसे थपक रही थींअभी मन साँझ की मनोरम झांकी में निमग्न ही था कि इतने में हवा के एक कोमल झोंके पर सवार होकर मेरा छुटपन का मन छलाँगें मारता हुआ महानगर से दूर उत्तर प्रदेश की औरैया तहसील में बसा एक हरे-भरे कमल पत्ते-से गाँव अटा जा पहुँचा। वहाँ ये समय मक्की की आख़िरी खेप आने का होता था। बरसात, कांस को बूढा कर विदा हो चुकी होती थीबम्बा और कूलों पर फूल-फूलकर लम्बी घास सहर्ष मौसम के बदलाव को स्वीकार कर चुकी होती थी। लेकिन खेतों की मिट्टी में वर्षा की नमी वैसे ही बची रहती थी जैसे बचत खोर स्त्री के मुट्ठी में पैसे। जिसके साथ मिलकर पवन मौसम में ठंडक घोलने लगती थी। बरसात के दिनों में चूने से पुती दीवारों पर जमी काही धूप लगने से चटकने लगती थी। दिन सुनहरे और रातें ओस से भरीं होने लगती थीं। दिनभर गुनगुनाहट में घर की चीज़-सामान सुखाये जाते और रात में चंद्रमा की झरती चाँदनी में प्रकृति का मन ओसीले मोतियों से भर जाता था।  गाँव में इन दिनों की शामों में कुछ लोग भोजन करते और कुछ भुट्टे भुनवाकर खाते थे और चौपालों में बैठकर मनमानी बतकही का रस लिया करते थे।

आइए पढ़ते हैं आज की कुछ चुनिंदा रचनाएँ -

--गीत "बूढ़ा पीपल जिन्दा है"

अभी गाँव के देवालय में, बूढ़ा पीपल जिन्दा है।
करतूतों को देख हमारी, होता वो शरमिन्दा है।।
--
बाबू-अफसर-नेता करतेखुलेआम रिश्वतखोरी,
जिनका खाते मालउन्हीं से करते हैं सीनाजोरी,
मक्कारी के जालों मेंउलझा मासूम परिन्दा है।
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।

--

एक शाम अकेली-सी

अभी दीवाली के दिन आये नहीं थे और हवा में ठंडक आ गयी थी लेकिन लोगों को कहते सुना था कि ये बदलाव प्रकृति के समृद्ध होने का सूचक ही कहा जाएगा । मतलब कोविड-19 महामारी जो दुनिया जहान को तहसनहस करने पर तुली है वह प्रकृति पर महरबान है? मेरा मन मानने को राज़ी नहीं था लेकिन उससे क्या होता है? क्या सच में कुछ अच्छा हो रहा था हमारे इर्दगिर्द जिसे हम देख नहीं पा रहे थे। वैसे अभी तो ये आते हुए सितम्बर की शामें थीं और बहती हुई सर्दीली हवा में झुरझुरी उठाने वाली खुनक दौड़ पड़ी थी मैंने अपने उम्र के प्रथम पड़ाव में लोगों को खूब कहते सुना था कि मौसम में अचानक बदलाव आना चिंताजनक होता है।
--
रुई के फ़ाहे की तरह
पोंछ देगा लहू में डूबे
दर्द के धब्बों को
चिताएं जल रही हैं
संघर्ष ज़ारी है धब्बे पोंछने का
नीरो की बांसुरी
छेड़ रही है राजनीतिक राग
और चल रही है-
--

 हमें 
ज़र नहीं आतीं
पेड़ों की अस्थियां 
और उन पर रेंगते 
समय की पीठ पर
हमारे कुचक्र।
--
हर कोई बीत जाए
ये मुम़किन नहीं
उनका देह नहीं तो
नाम ज़िंदा रहेगा
--
मुझे यक़ीन है कि कल वो
ज़रूर कुछ ख़ास ख़बर
ले के आएगा, बर्फ़
का दरिया है
एक दिन
पिघल
जाएगा। 
--
झूठ की कश्ती पर बैठा वो मुसाफ़िर
जाने कहाँ जाने को तैयार है
झूठा रास्ता है जिसका 
उसकी मंजिले भी बेकार है
डोर भी थाम रखी है उसने
काटों से भरी है
--
खुशियों से भरी महफिल 
हंसते दिन  हँसती राते 
शामों की रंगीन झलक दिखला जाना
बीते हुवे लमहों ज़रा लौट के आजाना।।

माना गम की धूप है छाई.....
जीवन में रिक्तता भर आई
अम्बर से आशाओं की बारिष कर जाना
बीते हुवे लम्हो जीवन रंगीन बना जाना।।
--
आज यूँही यादों के सफर में निकल गयी 
जब हाथ पड़ा पुराने एल्बम पर 
एक से दूजा तीजा मन खो गया 
उन दिनों की यादें जैसे बचपन लौट आया 
वो स्कूल के दिन और उन दिनों की आशाएं
--
वो नन्हा सा
बौना सा
दो पत्तियों वाला पौधा
जिसे मैंने नाजों से पाला पोसा
बड़ा बन गया
आज मुझे धीरे से मां कह गया ।।
--
मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
खुशियों का है टोटका !
खाद,पानी,धूप का होना, 
और प्यार से यदि सींचा
मेहनत का फूल खिलेगा!
--

नृत्य संगीत से सजा है जीवन गीत
कभी कहीं तो गीत गाता ही है
जिसमें रुझान नहीं संगीत के प्रति
उसका जीवन  है रूखा नीरस सा। 
नृत्य से आत्मसंतुष्टि मिलाती है
 नियमित हो जाता है व्यायाम
तन मन  में  आजाती है स्फूर्ति
मन महक उठता है फूलों की सुगंध सा।  
--

प्रात: से संध्या तक वह इसी प्रकार हाथ फैलाए खड़ी रहती। उसके पश्चात् मन-ही-मन भगवान को प्रणाम करती और अपनी लाठी के सहारे झोंपड़ी का पथ ग्रहण करती। उसकी झोंपड़ी नगर से बाहर थी। रास्ते में भी याचना करती जाती किन्तु राहगीरों में अधिक संख्या श्वेत वस्त्रों वालों की होती, जो पैसे देने की अपेक्षा झिड़कियां दिया करते हैं। तब भी अन्धी निराश न होती और उसकी याचना बराबर जारी रहती। झोंपड़ी तक पहुंचते-पहुंचते उसे दो-चार पैसे और मिल जाते।
---
आज बस  यहीं तक 
फिर मिलेंगे
 बुधवारीय प्रस्तुति में 

@अनीता सैनी  

12 comments:

  1. हमेशा की तरह बहुत बढ़िया।👌

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।हमारी रचना को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार।

    ReplyDelete
  3. सु-प्रभात
    आभार सहित धन्यवाद अनीता जी |

    ReplyDelete
  4. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी 🙏

    ReplyDelete
  5. जिस प्रकार का वातावरण चल रहा है उसमें स्वयं को सकारात्मक बनाए रखना बेहद जरूरी है । अनिता जी के इस प्रयास से निश्चित ही खुशी का अनुभव हो रहा है । बहुत धन्यवाद के साथ ...... शुभ दिन!

    ReplyDelete
  6. वाह अनीता जी, सभी रचनायें एक से बढ़कर एक हैं...और कल्पना जी की रचना से की गई शुरुआत तो बहत ही गजब की रही...बहुत खूब

    ReplyDelete
  7. वाह ! इतनी सुंदर भूमिका कि पढ़ते पढ़ते ही मन गाँव पहुँच गया और प्रकृति की सुंदरता में खो गया. पठनीय सूत्रों से सजी सुंदर चर्चा !

    ReplyDelete
  8. सुंदर भूमिका के साथ साथ शानदार प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं एवम बधाई प्रिय अनीता जी,मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार ।सादर शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह ।

    ReplyDelete
  9. आशा के मोती पिरोए,हरी-भरी वंदनवार बाँधी,
    आज की चर्चा आपने समवेत वंदना बना दी.

    मोगरे को भी जगह दी.धन्यवाद,अनीता जी.
    अभिनन्दन आपका और रचनाकारों का.

    ReplyDelete
  10. मेरी रचना को इस मंच के लायक समझने के लिए, स्नेह और सम्मान देने के लिए बहुत-बहुत आभार आपका।

    ReplyDelete
  11. सुंदर भुमिका के साथ बेहतरीन रचनाओं का संकलन प्रिय अनीता, सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं सादर नमस्कार

    ReplyDelete
  12. अनीता सैनी जी, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया जो अपने मेरी रचना को अपने संकलन में शामिल किया, और बहुत ही खूबसूरत रचनाओं का सम्मेलन है, धन्यवाद
    आभार!

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।