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Friday, January 21, 2022

'कैसे भेंट करूँ? '(चर्चा अंक-4316)

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय  प्रस्तुति में आपका स्वागत है

शीर्षक व काव्यांश आ.अमृता तन्मय जी की रचना 'कैसे भेंट करूँ? ' से-

तुम ही कहो !
तुम्हें देने के लिए
बिन कुछ भेंट लिए
कैसे मैं चली आती ?
लाज के मारे ही
कहीं ये धड़कन 
धक् से रूक न जाती !
यूँ निष्प्राण हो कर भला
जो सर्वस्व देना है तुम्हें
कहो कैसे दे पाती ?

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

 --

नवगीत "खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन" 

ये हमारे लिए मुफ्त उपहार हैं
कर रहे देश-दुनिया पे उपकार हैं
ये बचाते धरा को हमारे लिए
रोग और शोक का होता इनसे शमन! 
खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन!!
गुलाब नहीं मिला 
तो पंँखरियाँ ही लाई हूँ !
बाँसुरी नहीं मिली
तो झंँखड़ियाँ ही लाई हूँ !
कैसे भेंट करूँ ?

ज़रूरी है कि मेरी कविताओं में 

खोजी जाय वह गृहिणी,

जो दिन-रात तिरस्कृत होकर भी 

लगी रहती है काम में,

--

चुनाव से पहले अपने क्षेत्र की जनता से नेताजी के दो मासूम से सवाल

उम्रे दराज़ मांग के लाए थे चार दिन

दो तो ठगी में कट गए बाक़ी में क्या करें?

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कहाँ गये तुम सूरज दादा ?

दाँत हमारे किटकिट बजते ।
रोज नहाने से हम डरते ।
खेलकूद सब छोड़-छाड़ हम,
ओढ़ रजाई ठंड से लड़ते ।
--
हर इक राह सुगम हो जाए

दुःख में  सिकुड़ गया अंतर्मन 

शोक लहर जिससे बहती है, 

पाला पड़ा हुआ धरती  पर 

सूर्य किरण झट हर लेती है  !

--

ज़िंदगी अभिनय नहीं

आँखों में चश्मा काला
धूप हल्की बोलते हैं।
हाथ खीसे में दबाए
शान में बस डोलते हैं।
मेहनत करती नाम रोशन
सत्यता यह जान लो
ज़िंदगी अभिनय..........
सर सूखे, पंछी उड़े, औरे सरन समाहिं।
दीन मीन बिनु पंख के, कहु रहीम कँह जाहिं।
दलबदल की राजनीति पर मैं यह दोहा चस्पा करता हूँ। तालाब का पानी सूखने पर उसके किनारे के हरे-भरे वृक्षों पर किलोलें करने वाले पंछी दूसरे तालाबों के किनारों पर चले जाते हैं, लेकिन उस सूखते तालाब की मछलियाँ तड़प-तड़प कर उसी तालाब में जान दे देती हैं पर तालाब नहीं छोड़तीं। पंख मछली के पास तैरने के लिए होते हैं। पंख पक्षियों के पास उड़ने के लिए होते हैं। मेरा और आस्था-बदल दलबदलुओं का यही फासला है। वे हरियाली की तलाश में कहीं भी जा सकते हैं। मुझे इसी तालाब में जान देनी है।

              मेरी सहायिका सुबह आठ बजे आती है तो मैं गेट का ताला उससे पहले खोल देती हूँ। आज किसी ने गेट खटखटाया तो मैंने कहा - "खुला है।"

 फिर खटखटाया तो मैं गेट की तरफ गई, एक इंसान खड़ा था , कुछ पहचानी शक्ल लगी , इससे पहले कि पहचान पाती वह बोला - "आँटी पहले मैं यहीं आपके पड़ोस में रहता था, मेरे पिताजी नहीं रहे, कुछ पैसों से मदद कर दीजिए।"  

--

सुबह नाश्ते इत्यादि का कार्यक्रम निपटा जब नील द्वीप पहुंचे तो पूरी दोपहर हो चुकी थी ! नील द्वीप का नाम बदल कर अब शहीद टापू कर दिया गया है। पोर्टब्लेयर से कोई 35-40 किमी दूर यह 13.7 Sq. किमी का एक छोटा सा खूबसूरत टापू है ! एक बात जो बहुत सुखद और आश्चर्य भरी लगी कि हैवलॉक के सारे गांवों के नाम श्री कृष्ण जी के नामों पर है तो नील के तटों के नाम रामायण के किरदारों पर आधारित हैं, जैसे सीतापुर, भरतपुर व लक्ष्मणपुर ! नील द्वीप के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक सुभाष मेला है, जिसका आयोजन दिसंबर के अंत और जनवरी महीने की शुरुआत में किया जाता है ! यह त्योहार नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती का प्रतीक है। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

9 comments:

  1. श्रम से की गई सुन्दर चर्चा प्रस्तुति|
    आपका बहुत-बहुत धन्यवाद अनीता सैनी 'दीप्ति' जी!

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  2. बहुत ही सुंदर आज की चर्चा प्रस्तुति आदरणीया अनीता जी

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  3. सुप्रभात, सभी रचनाकारों और पाठकों को शुभकामनाएँ! पठनीय रचनाओं की खबर देता है आज का चर्चा मंच!

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  4. सुंदर अंक.स्थान देने हेतु आभार।

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  5. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति।आज के संकलन में मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार अनीता जी।

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  6. बहुत शानदार श्रमसाध्य चर्चा, सुंदर शीर्षक।
    विविध सूत्रों को संयोजित कर पढ़वाने के लिए हृदय से आभार अनिता जी।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    सादर सस्नेह।

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  7. बहुत ही सुन्दर एवं पठनीय सूत्रों का संकलन । कहना तो पड़ेगा ही कि अति सुन्दर भेंट पाठकों के लिए । हार्दिक आभार ।

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  8. उत्कृष्ट लिंको से सजी श्रमसाध्य एवं लाजवाब चर्चा प्रस्तुति...
    मेरी रचना को स्थान देने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार प्रिय अनीता जी!
    सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  9. बहुत बढ़ियां सराहनीय चर्चा प्रस्तुति

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