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Tuesday, January 18, 2022

"दीप तुम कब तक जलोगे ?" (चर्चा अंक 4313)

सादर अभिवादन

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

शीर्षक और भूमिका 

आदरणीया अभिलाषा चौहान जी की रचना से

--

दीप तुम कब तक जलोगे?

स्वयं को ही छल रहे हो?

बस अकेले चल रहे हो..

अभिलाषा जी की लिखी बहुत ही सुन्दर पंक्तियां 

सच, आखिरी लौ के साथ दीप भी हिम्मत हार ही जाती है

अकेले चलते-चलते वो भी थक ही जाती है

लेकिन इस वक़्त हिम्मत बढ़ाते एक शब्द या यूं कहें प्यार से डाले गए तेल की कुछ बूंदें उसे फिर से प्रज्वलित कर देती है...

आईए, दीपक को बुझाने वाली हवा नहीं

उसे प्रज्वलित करने वाली तेल की बूंद बने

चलते हैं आज कि कुछ खास रचनाओं की ओर....

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 दोहे 

"अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमल-धवल होता नहीं सबका चित्त-चरित्र।
जाँच-परख के बाद ही, यहाँ बनाना मित्र।।।
--
रखना नहीं घनिष्ठता, उन लोगों के संग।

जो अपने बनकर करें, गोपनीयता भंग।।
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दीप तुम कब तक जलोगे ?

यामिनी को भेद लोगे,भ्रांत ये अवधारणा है

तुम विवश क्लांत हो कितने,यही सदा विचारणा है

आँधियों से जूझते हो,हारते थकते नहीं हो

पंथ से परिचित भले हो,आकलन करते नहीं हो।

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शब्दांजलि


मधु और दीप को परिभाषित करने के लिए मधुदीप जी से जुड़े लोगों के अनुभव को सुनने- पढ़ने से आसान हो जाएगा। मधुदीप जी के स्वभाव में माधुर्य था तो उनका लघुकथा के प्रति समर्पण, लघुकथा के लिए किया कार्य सदैव दीपक रहेगा व सूर्य ही रहेगा। -----------------------------मत चूको चौहान

अगर कुर्सी पे आंच आए बदलना दल ज़रूरी है
बहाना दलितों-पिछड़ों के हितों का भी ज़रूरी है
शरम को छोड़ जा पहुँचो किसी मंडी में तुम फ़ौरन

मिले जो भाव ऊंचा फिर तो बिक जाना ज़रूरी है
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जीवन का स्पंदन

आज एक बङा-सा लाल गुलाब खिला
सजीले गुलाब की रंगत का क्या कहना 
प्रभात का सूरज पहने नारंगी झबला 
एक-एक पंखुरी का हौले से खिलना
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तुम्हारा आना

तुम्हारा आना

नयनों का लजाना

बातों का बिसराना

याद आ गयीं

वो बिसरी सी बातें

मीठी सी मुलाकातें

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परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है ...

दो बूँद गिरा दे जो अभी उसके पास है,.
बादल से कहो आज मेरी छत उदास है.
 
तबका न कोई चैनो-अमन से है रह रहा,
सुनते हैं मगर देश में अपने विकास है.
 
ज़ख्मी है बदन साँस भी मद्धम सी चल रही,
टूटेगा मेरा होंसला उनको क़यास है.
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जब से हुई है तुमसे मुलाकात शाम की

जब से हुई है तुमसे मुलाकात शाम की,
पढ़ता हूँ अब मैं गज़लें फ़क़त तेरे नाम की ।
शोहरत को दी न मैनें तवज़्ज़ो भी आज तक ,
चाही फ़क़त ज़रा सी मुहब्बत कलाम की ।
नफ़रत से हो रहे हैं ज़रर रिश्तों में भी अब,
उल्फ़त की रह गयी है ये तस्वीर नाम की ।
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बिना चाशनी बनाये हरे चने की बर्फी

दोस्तो, बर्फी तो आपने कई तरह की बनाई और खाई होगी लेकिन क्या आपने हरे चने (Green chickpea) की बर्फी बनाई या खाई है? हरे चने को होले या छोलिया भी कहा जाता है। हरे चने की बर्फी खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगती है। यह बनाना तो बहुत ही आसान है क्योंकि यह हम बिना चाशनी के बनायेंगे।--------------------------आज का सफर यही तक, अब आज्ञा देआप का दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा

11 comments:

  1. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति|
    मेरे ब्लॉग की पोस्ट का
    लिंक सम्मिलित करने के लिए
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी!

    ReplyDelete
  2. असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    श्रमसाध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

    ReplyDelete
  3. बेहद सुंदर चर्चा कामनी सिन्हा जी।
    लिंक शामिल करने हेतु बहुत बहुत आभार ।

    सादर ।

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  4. सुन्दर लिंक्स से सजा आज का चर्चामंच |

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  5. सुप्रभात, पठनीय रचनाओं की सूचना देते लिंक्स से सजा चर्चा मंच!

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  6. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, कामिनी दी।

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  7. हार्दिक आभार कामिनी जी, इस दिलचस्प चर्चा का हिस्सा बनाने के लिए.
    सुबह-सुबह पढ़ने के खूब मज़े लिए !
    सभी का दिन अच्छा बीते !
    लिखने को कुछ नया सूझे .
    नमस्ते.

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  8. सर्वप्रथम मेरी रचना को शीर्ष बिंदु बनाने के लिए आपका हृदय से आभार सखी।
    बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।सादर

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  9. बहुत सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज की चर्चा ! मेरी रचना को आज की चर्चा में स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी ! सप्रेम वन्दे !

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  10. बहुत खूबसूरत चर्चा संकलन

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  11. बेहतरीन रचना संकलन

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